अहसास

-शबनम शर्मा

दफ़्तर में नया-नया काम, नए लोग और तो और जगह भी नई। कल ही मिस्टर मित्तल ने अपना पद भार संभाला था। सबसे परिचय हुआ व काम शुरू किया। रामस्वरूप इस कार्यालय का पुराना कर्मचारी था। अपने काम में सदैव लगा रहने वाला ये व्यक्ति कभी-कभी बदसलूकी पर उतर आता तो किसी को कुछ न समझता। एक दिन फ़ाइल लेकर अंदर गया तो किसी बात पर साहब से कहा-सुनी हो गई और उसने आदतन उन्हें खरी-खोटी सुना दी। हालांकि इस हादसे के बाद उसे दुःख हुआ व उसने साहब से माफ़ी भी मांग ली परन्तु एक गांठ-सी उसके मन में पड़ गई।

दिन बीते, महीने बीते पर वो खुलकर कभी भी अपनी कोई बात या समस्या बॉस से न कह पाया। अचानक उसका तबादला दूर-दराज़ किसी स्थान पर हो गया और इधर उसकी बीवी आपातकलीन स्थिति में। रामस्वरूप को समझ नहीं आ रहा था कि करे तो क्या करे। वो बहुत परेशान था। साहब को किसी ने उसकी स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने उसे तत्काल बुला भेजा। अन्दर आकर उसने साहब की ओर ताका तक नहीं। जड़वत्-सा खड़ा रहा सोचता हुआ कि साहब से किस मुंह से मदद मांगे।

इतने में साहब ने कहा, ‘रामस्वरूप, तुमने मुझे अपनी समस्या क्यूं नहीं बताई, पता है यहां हम सब एक परिवार के सदस्य हैं, मैं यहां पिता की सीट पर हूं और तुम मेरी औलाद, जाओ रजिस्टर में 2 महीने की छुट्टी भर कर लाओ, जब तक तुम्हारी बीवी ठीक नहीं होती, तुम उसके साथ रहो, मैं तुम्हारे अगले स्टेशन वाले बॉस को फ़ोन पर बता देता हूं। जाओ।’ साहब के इस व्यवहार ने रामस्वरूप को अहसास करा दिया कि सब एक से नहीं होते।

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