बच्चों का संतुलित विकास

                   सरिता सैनी

                 सहायक साईंसदान

               (मानव विकास विभाग)

बच्चों का उज्ज्वल भविष्य हर माता-पिता का सपना होता है पर इस सपने को साकार करने के लिए यह अनिवार्य है कि माता-पिता बच्चों को ऐसा वातावरण दें, जिसमें उसका संपूर्ण विकास संभव हो।

बच्चे का संतुलित विकास उसके जीवन में सफलता की सीढ़ी का पहला चरण है। बच्चे के संतुलित विकास से अभिप्राय यह है कि बच्चा न केवल शारीरिक रूप से फलफूल रहा हो बल्कि साथ-साथ उसका मानसिक विकास, संवेगात्मक विकास, सामाजिक विकास तथा भाषा का विकास होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जन्म के उपरान्त बच्चे की सम्भाल तथा देखभाल का पहला दायित्व माता-पिता और तत्पश्चात् अध्यापकों का होता है। क्योंकि बच्चे के जीवन के पहले कुछ वर्षों में ही बच्चे के व्यक्तित्व की नींव रखी जाती है, इसलिए माता-पिता तथा अध्यापकों का फ़र्ज़ है कि बच्चे की संपूर्ण देखभाल करके उसे तंदुरुस्त, निरोग और योग्य पुरुष बनाने में सहायक करें।

बच्चे में हो रहा सम्पूर्ण विकास बच्चे के व्यक्तित्व को प्रतिभाशाली बनाता है तथा उसके मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होने का संकेत भी देता है। ऐसे बच्चे एवं उनके माता-पिता दोनों ही बधाई के पात्र होते हैं। इसलिए जन्म से ही बच्चे की परवरिश का दायित्व माता-पिता को सहर्ष स्वीकार कर पूरी निष्ठा से निभाना चाहिए। बच्चे की देखभाल में उसकी शारीरिक साफ सफ़ाई, भोजन, कपड़े, आराम, कसरत, खेल-खिलौने, टीकाकरण आदि का अपना अपना महत्त्व है। शिशुकाल में बच्चे की आयु अनुसार पूरी की गई ये ज़रूरतें बच्चे के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए लाभदायक सिद्ध होती हैं। कमज़ोर और बीमार बच्चा मानसिक तौर पर भी पिछड़ जाता है। उसके सोचने व समझने की शक्ति तंदुरुस्त बच्चों की अपेक्षा कम होती है तथा वह अत्यधिक संवेदनशील होता है ।

माता-पिता का फ़र्ज़ है कि बच्चे को उसकी आयु के अनुकूल संतुलित भोजन दें, बच्चे की रहने की जगह को साफ़-सुथरा रखें और उसकी नींद व आराम का सही प्रबंध करें। बढ़ती उम्र के साथ बच्चे को खाने-पीने, शौच संबंधी और शारीरिक सफ़ाई संबंधी अच्छी आदतों का विकास करने के लिए भी प्रेरित करें।

मानवविकास के एक साईन्सदान “एरिकसन” का मत है कि जन्म के उपरान्त शुरू के कुछ वर्ष बच्चे में इस जगत् के प्रति विश्वास के रिश्तेे को बनाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। एक बार बना यह विश्वास का रिश्ता आजीवन का होता है।

यदि माता-पिता का पूर्ण स्नेह व देखभाल बच्चे को मिलती है तो बच्चे के मन में एक अटूट विश्वास का बंधन बनना शुरू होता है। उसे यह महसूस होता है कि वह इस दुनिया में अकेला व असहाय नहीं है तथा माता-पिता हर समय उसकी ज़रूरतों को पूरा करने व समझने के लिए तैयार हैंं। धीरे-धीरे वह समाज में भी इसी विश्वास के साथ अपना रिश्ता जोड़ता है तथा सामाजिक प्राणी कहलाता है। यदि यह रिश्ता कमज़ोर रह जाता है तो बच्चे में कई तरह की व्यावहारिक समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। देखने में आया है कि ऐसे बच्चे अकसर चिड़चिड़ेे, असुरक्षा व अविश्वास की भावना से ग्रस्त होते हैं तथा अपने सामाजिक दायित्वों को निभाने में असफल रहते हैं। वे अपनी जिज्ञासाओं को दबा लेते हैं तथा माता-पिता से बात करने या पूछने में झिझक महसूस करते हैं, जिससे उनकी भावनाएं दब जाती हैं और ज्ञान भी सीमित रह जाता है। बच्चे के मन में कई जिज्ञासाएं होती हैं तथा माता-पिता का यह कर्त्तव्य है कि वे बच्चे को सवाल पूछने के लिए प्रोत्साहित करें और उसके प्रत्येक प्रश्न का उपयुक्त उत्तर दें। इससे बच्चे के ज्ञान में वृद्वि होती है तथा उसकी भाषा तथा मानसिक क्षमताओं का विकास होता है।

बच्चों के संतुलित विकास के लिए घर के वातावरण का सुखद होना भी अति आवश्यक है। घर में लड़ाई-झगड़ा और क्लेश बढ़ते बच्चे के कोमल मन पर बहुत बुरा असर डालते हैं और उसमें बड़ों के प्रति भय उत्पन्न हो जाता है।

माता-पिता को जीवन की व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय बच्चों के साथ अवश्य बिताना चाहिए, जिससे वे बच्चे को शिक्षाप्रद कहानियां, क़िस्से, कविताएं या घटनाएं सुनाएं। इससे उनका बच्चों के साथ सामीप्य बढ़ता है तथा बच्चों के ज्ञान में वृद्वि होती है। बच्चों की आयु के अनुसार खिलौने व खेलकूद भी ज़रूरी हैं। ये न केवल शारीरिक कसरत का एक तरीक़ा है बल्कि बच्चों को मिलजुल कर काम करने, अनुशासन में रहने, नए-नए शब्दों को सीखने में सहायक सिद्ध होते हैं। जो समय माता-पिता बच्चों के लिए निकालें उसमें वे अपनी व्यावसायिक झल्लाहट या उलझनों को भूल जाएं। बहुत लम्बा समय बिताने की अपेक्षा जितना समय भी हो सके उसे प्रेम व एकाग्रता से बच्चों के साथ बिताएं। इससे माता-पिता को भी बच्चों की आशाओं, समस्याओं और विचारों की जानकारी मिलती है और बच्चों के सही मार्गदर्शन का मौक़ा मिलता है।

बच्चों के संतुलित विकास में विद्यालय और अध्यापकों की भूमिका भी माता-पिता से कम महत्वपूर्ण नहीं है। अनुशासन की शिक्षा, मिलजुल कर रहना, भेदभाव हटाना और बच्चों के ज्ञान में वृद्वि करना अध्यायकों का ही दायित्व है। बच्चों को किताबी ज्ञान के अलावा अपने आप कुछ लिखकर अथवा करके कक्षा में प्रस्तुत करने का मौक़ा देने से बच्चे का मनोबल बढ़ता है तथा उसका मानसिक विकास भी होता है।

माता-पिता व अध्यापकों की ओर से मिला यह सहयोग सराहनीय होगा तथा बढ़ते बच्चों के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देगा। ऐसे बच्चे व माता-पिता सदैव प्रशंसा पाते हैं तथा जीवन में सफलता उनके क़दम चूमती है।

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