रिश्ते क्यों टूटते हैं?

-तारीफ हुसैन तारीफ

आज का युग बहुत ही गतिशील और परिवर्तनशील है। ज़माना बदलता जा रहा है, चीज़ें बदलती जा रही हैं, लोग बदलते जा रहे हैं, रिश्ते टूटते जा रहे हैं। सांझे परिवार टूटकर बिखर रहे हैं क्योंकि हमारे रिश्तों में स्वार्थ अपना स्थान बनाता जा रहा है और जिस रिश्ते का आधार स्वार्थ होता है वो रिश्ता कभी सफल नहीं हो सकता।

हम हमेशा रिश्ते टूटने पर दोष दूसरों का निकालते हैं अपनी कमियों को नहीं देखते। हम अपने मित्रों रिश्तेदारों से आशा करते हैं कि वे मुश्किलों में हमारी मदद करें। लेकिन हमारा भी कर्त्तव्य बनता है कि जब वे मुश्किलों में हों तो हमें भी उनकी मदद करनी चाहिए। कभी कोई रिश्तेदार मजबूरी वश हमारी मदद नहीं कर पाता तो हम उससे निराश हो जाते हैं, उससे अपने रिश्ते भी ख़त्म कर देते हैं। उसकी मजबूरी जानने की भी कोशिश नहीं करते। हर इंसान हालातों से बंधा होता है। कई बार वो चाहते हुए भी हमारी मदद नहीं कर पाता। मगर हम उसकी मजबूरी को नहीं समझते। केवल अपनी परेशानी को देखते हैं और उसे स्वार्थी, संगदिल, बेवफ़ा जाने क्या-क्या कह देते हैं। यह बात सही नहीं है। मशहूर शायर मिर्ज़ा गालिब ने कहा हैः-

“कुछ तो मजबूरियां रहीं होंगी, वरना यूं तो कोई बेवफ़ा नहीं होता”

याद रखिए जो आशाएं हम अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से रखते हैं, वही आशाएं हमारे दोस्त और रिश्तेदार भी हमसे रखते हैं, जिस रिश्ते में ज़्यादा शिकवे-शिकायतें होती है, वह रिश्ता जल्दी ही ख़त्म हो जाता है। हर रिश्ते की कोई सीमा होती है। हमें उस सीमा में रहकर ही अपने रिश्ते निभाने चाहिए। हद से ज़्यादा आशाएं इंसान को निराश करती हैं। अपनी ही नहीं  दूसरों की भी परेशानियों को समझिए आपके रिश्तों में कभी दरार नहीं आएगी। मैं तो यही कहूंगा,

गिले-शिकवों को छोड़िए, दिलों को दिलों से जोड़िए,

न जाने किसकी हाए लग जाए, मत किसी का दिल तोड़िए

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