साहित्‍य के सृजनहार

लेखकगण, कवि सीधा भगवान से मुकाबिल हो जाते हैं जब उन‍को अपनी कल्‍पना शक्‍ति पर ग़रूर होने लगता है। लेखक को लगता है कि जब वो दुनिया का तसव्‍वुर करता है तो बेहद खूबसूरत दुनिया की तस्‍वीर ज़ेहन में उभरती है। लेकिन यह संसार, यह वास्‍तविक दुनिया यदि वास्‍तव में भगवान की कल्‍पना का नतीजा है तो उसे भगवान की कल्‍पना तो उसकी अपनी कल्‍पना से कमतर ही नज़र आती है। और वो सोचने को मजबूर हो जाता है कि आख़िर दुनिया के रचयिता ने ऐसा तसव्‍वुर क्‍यों कर किया। और फिर कभी लेखक कल्‍पना से उतर कर यथार्थ पर लिखने का प्रयत्‍न करता है तो यथार्थ में आकर जब वो दिनों-दिन बदसूरत होती जा रही दुनियां को देखता है तो उसे बदलने की चाहत रखता है। और लोगों में इस तरह के जज़बात जगाने की भी चाह रखता है। यही लेखक का वास्‍तविक कर्त्तव्‍य भी है। लेखक का काम है लोगों को सही दिशा दिखाना उनके लिए प्रेरणा बनना। लेखक की क़लम जानती है रास्‍तों को बदलने का हुनर।

     इतिहास साक्षी है कि क़लम ने समय को समय-समय पर स्‍वयं दिशाएं दिखलाई हैं। लेकिन आज बाज़ारीकरण के दौर में क़लम पशोपेश में है, स्‍वयं दिशा की तलाश में भटक रही है। जब लेखक भटकता है तो भविष्‍य भटकता है यानी आने वाली पीढ़ी की दिशा भटकती है। यह सही है कि आज के दौर में आदर्शों पर क़ायम रहना मुश्किल है और असली मुश्किल है आदर्शों पर क़ायम रहते हुए पहचान बनाने की। लेकिन मुश्किलों से हार मानने वाले भविष्‍य के रखवाले नहीं हो सकते। यदि वास्‍तव में लेखक बनने की चाह है, जज्‍़बा है तो मुश्किलों को पार करने का हुनर तो आना ही चाहिए। एक शायर के शब्‍दों में-

यूं ही पड़े रहो सहमे हुए दीयों की तरह,

अगर हवाओं के पर बांधना नहीं आता।”

सत्‍य यह भी है कि वक्‍़त के साथ लेखक के विषय बदलते हैं। आज संस्‍कृति के पतन का दौर है तो ज़ाहिर है यथार्थ पर लिखने वाले लेखकों के लिए विषय भी ऐसे हो सकते हैं। लेकिन ऐसे विषयों पर लिखते हुए बेहद सतर्क रहने की आवश्‍यकता होती है। गंदगी दूर करने के लिए खुद पर गंदगी नहीं लगाई जाती। छोटी उम्र में व्‍यस्‍क हो जाने वाले बच्‍चों को, औरत मर्द के हर रिश्‍ते को, हर सम्‍बन्‍ध को, इंटरनेट पर दिखने वाली अश्‍लीलता को और समलैंगिक सम्‍बन्‍धों को लिखने के लिए अश्‍लील शब्‍दों की, अभद्र भाषा की आवश्‍यकता नहीं होती। लेकिन विडंबना तो यही है कि आमतौर पर ऐसे विषयों पर लिखा ही केवल इसीलिए जाता है कि लेख रोचक बन पाएं।

   मैंने अरसा पहले एक लेख में ऐसे एक फ़ोटोग्राफ़र का ज़िक्र किया था जिसने कहा था कि बोल्‍ड फ़ोटोग्राफ्‍़ज़ देकर संस्‍कृति के पतन के बारे में, इन लोगों के विरुद्ध लेख दिए जा सकते हैं। और ख़ास तौर पर ताकीद की थी कि यदि मैगज़ीन के पाठकों की संख्‍या बढ़ानी है तो ऐसे फ़ोटोग्राफ्‍़ज़ देने ज़रूरी हैं। और उनके हिसाब से मजबूरी यह भी थी कि उनकी तारीफ़ में नहीं उन के ख़िलाफ़ लिखना आवश्‍यक था। तो इससे सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि किसी भी चीज़ की ख़िलाफ़त करने के पीछे कितनी इमानदारी होती है। इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया तो प्रिंट मीडिया से कई कदम आगे है और यदा कदा ऐसे उदाहरण पेश करता ही रहता है। न्‍यूज़ चैनल्ज़ में हमेशा जिन दृश्‍यों को अश्‍लील करार दिया जाता है वही दृश्‍य बार बार, अनेकों बार दिखाए जाते हैं। पिछले दिनों जब अदालत ने किसी प्रोग्राम के प्रसारण समय पर रोक लगाई तो न्‍यूज़ चैनल्‍ज़ को भी उन दृश्‍यों को केवल देर रात को ही प्रसारित करने के निर्देश दिए। इस पर एक फ़िल्‍म निर्देशक की टिप्‍पणी थी “यह न्‍यूज़ चैनल्ज़ वाले बहुत शातिर हैं। हमारी फ़िल्‍मों के जिन दृश्‍यों के ख़िलाफ़ ये न्‍यूज़ में बोलते हैं उन्‍हीं दृश्‍यों को बार-बार दिखाते हैं। अब यह चालाकी नहीं चलेगी।” साफ़ ज़ाहिर है अपसंस्‍कृति का शोर मचाने का अर्थ अपसंस्‍कृति का फ़िक्र नहीं केवल और केवल टी.आर.पी.का फ़िक्र है।

कितने ही कहानीकार, नावलकार हैं जो मशहूर होने की जल्‍दी में अश्‍लीलता परोसने से बाज़ नहीं आते। आज हम बच्‍चों के बिगड़ने की दुहाई तो देते हैं। परन्‍तु अपने नौनिहालों को हम स्‍वयं क्‍या परोस रहे हैं इनको गलत दिशा में धकेलने के हम स्‍वयं कितने ज़िम्‍मेवार हैं इस पर चिंतन नहीं करते। अगर कोई रोमांटिक कहानी या अन्‍य भी किन्‍हीं ऐसे विषयों पर कहानियां लिखने पर अश्‍लील भाषा या अभद्र भाषा का प्रयोग करता है तो चलो लेखक की मानसिकता समझ में आती है। लेकिन जब कोई अपसंस्‍कृति पर चिंतन करते हुए अशलीलता परोसने का प्रयत्‍न करता है तो इस मानसिकता को समझना आवश्‍यक है। अब यहां यह समझना भी मुश्‍किल होता है कि लेखक प्रसि‍द्धि पाने के लालच में यह सब कर रहा है या फिर उसे यह सब लिखना अच्‍छा लगता है। जैसे कई लोग गालियां देकर, गंदी बातें करके जीभ का स्‍वाद लेते हैं उसी प्रकार कई लोग गंदी भाषा लिखकर अपनी भूख शांत करते हैं। यह बेहद विकृत मानसिकता होती है जिस पर रोक लगानी आवश्‍यक है। इस बीमार मानसिकता को समझना और उसे दूर करना हमारा फ़र्ज़ है। कई उमदा लेखक, बढ़िया लेखनी लिखने में माहिर लेखक जब ऐसा रास्‍ता अख़्‍ितयार करते हैं तो मन विचलित होता है उन्‍हें रोकने को मन चाहता है। और जहां तक मेरे बस में होता है मैं कह पाती हूं। यहां पर मैं यह अवश्‍य कहना चाहूंगी कि यह मुझे अपना फ़र्ज़ जान पड़ता है। जिस प्रकार एक समलैंगिक व्‍यक्‍ति के साथ हमदर्दी करने का अर्थ उसके मर्ज़ को बढ़ावा देना होता है उसी प्रकार ऐसी चीज़ों का समर्थन देने पर या फिर चुप रह जाने पर हम भी इन कुकृत्‍यों के भागीदार बनते हैं।

साहित्‍य के सृजनहारों को, भविष्‍य के रखवालों को, लेखकों, कवियों कलाकारों को बस यही संदेश देना चाहती हूं, उनसे यही निवेदन करना चाहती हूं कि आने वाली पीढ़ी को सही दिशा दें। अपनी क़लम को अपसंस्‍कृति के तूफ़ान में बह न जाने दें। इस मुश्‍किल दौर में ही तो क़लम की ताक़त की आवश्‍यकता है। और एक बेहद दिलचस्‍प बात जो जाननी ज़रूरी है कि लेखक की क़लम तभी खूबसूरत साहित्‍य का सृजन कर पाती है, उमदा लेखनी लिखती है जब जब मुश्‍किल दौर होता है, मन में तड़प होती है, मन अशांत होता है।

“जो आसां राह ढूंढे वो क़लमें नादां होती हैं।

मुश्‍किल तो तब होती है जब मुश्किलें आसां होती हैं”

-सिमरन

 

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