पति पत्‍नी के बीच में

 

-दीप ज़ीरवी

कहते हैं कि शादी बूर का लड्डू है, जो खाय वो भी पछताए, जो न खाए वो भी पछताए।

सुकरात ने कहा था कि शादी करवाने वाला तो दु:खी होता ही है किन्तु शादी न करवाने वाले भी सुखी नहीं कहे जा सकते।

किसी के विचार में शादी एक आवश्यक ग़लती है जो हर व्यक्‍ति को करनी पड़ती है।

शादी के बारे में विचार अलग-अलग हो सकते हैं किन्तु शादी के बाद, पति-पत्नी को लगभग सभी ने गाड़ी के दो पहियों की उपमा दी है।

पति-पत्नी का रिश्ता धर्म का रिश्ता होता है। धर्म, विश्‍वास का ही दूसरा नाम है।

शादी एक ऐसा बंधन होना चाहिए जिसमें पत्नी दिल हो और पति धड़कन। पत्नी दिमाग़ हो और पति सोच, जहां-जहां ये सब गुण उपस्थित होते हैं, वहां-वहां बारहों मास बसंत रहता है।

परंतु आज के परिवेश में ऐसे सौभाग्यवान; सौभाग्यवतियां कम ही दिखते हैं।

आज शादी के मायने तक बदल रहे हैं। कभी शादी को जन्म-जन्म का बंधन माना जाता था। शादी औरत को सम्पूर्ण औरत और मर्द को सम्पूर्ण मर्द बना देने वाली संस्था हुआ करती थी यदि तब की बात करें जब शादी अल्हड़पने में हो जाती थी तो हम पाएंगे कि अल्हड़ उम्र की शादी का एक लाभ तो था कि पति-पत्नी एक दूसरे को बेहतर ढंग से ‘अपना-आप’ प्रस्तुत करने के लिए अल्हड़ता को ही माध्यम बना लेते थे।

परिवार नामक संस्था का मूल है- शादी व समाज का मूल है- परिवार नामक संस्था, जहां बालपन पलते हैं, फलते हैं। सेहतमंद समाज के लिए आवश्यक है सेहतमंद परिवार, सेहतमंद परिवारों का मूल हैं- सेहतमंद सोच वाले दम्पति। शादी करवाने के अनेक कारणों में से एक कारण सन्तान प्राप्त करना भी रहा है और असुरक्षा भाव से, एकाकी पन से मुक्ति की चाह भी शादी का कारण बन जाया करती है।

शादी के बाद पति-पत्नी को एक ही छत के नीचे रहना होता है एक साथ। वो मकान जिस की छत के नीचे रहने वाले पति-पत्नी एक दूसरे के क़रीब होते हैं बेशक वो पास-पास हों या न, सुन्दर सजीले घर कहलाते हैं लेकिन जिन मकानों की छत के नीचे रहने वाले साथ-साथ रहने के बावजूद क़रीब नहीं होते वो मकान जल्दी ही खंडहर बन जाया करते हैं, घर बन पाना तो दूर की बात रही।

घरों के मकानों में और मकानों के खंडहर बन जाने में जहां नशा, जुआ इत्यादि कारक काम करते हैं वहां एक अन्य कारक सबसे अधिक क्रियाशील सिद्ध होता है: दम्पति के मध्य किसी तीसरे का आगमन।

ये ‘तीसरा’ पत्नी का पुरुष-मित्र भी हो सकता है और पति की महिला मित्र भी।

दम्पति में ये ‘वो’ मिसरी की फांस, कबाब की हड्डी, दाल का कंकर, बिन बुलाए नहीं आता।

पुरुषों के मामले में विविधता की चाह अथवा कुछ रोमांचक करने की चाह इस तीसरे वो को आमंत्रित करती है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि औरतें परंपरा प्रिय होती हैं जबकि मर्द नवीनता का अधिक अभिलाषी रहता है।

बेमेल शादी भी किसी तीसरे को आमंत्रित करती है। मान लिया कि एक लड़का जो प्यार मोहब्बत का नक़ाब चढ़ा कर तीन चार लड़कियों के साथ जिस्मानी संबंध बना चुका है जब शादी करेगा तो उसे अपनी पत्नी में उतनी दिलचस्पी नहीं होगी जितनी एक सीधे-सादे लड़के को होती है। इसी प्रकार जो लड़कियां कथित मॉड होती हैं आधुनिकता की ध्वज वाहक होती हैं- (रूढ़िवादी विचारों से मुक्‍त)- एक से अधिक प्रेमी जनों के साथ सहवास-सुख हासिल करने वाली उनमें भी एक से अधिक पति रखने की चाह होती है।

संयम का नियम किसी को याद नहीं, गुरुकुल रहे नहीं। स्कूलों में केवल शिक्षा दी जाती है दीक्षा नहीं। आज शिक्षित वर्ग की तो भरमार है, लेकिन दीक्षित वर्ग लुप्त प्राय: है।

शादियां असफल करने में ये ‘तीसरे’ तारपीडों का कार्य करते हैं।
‘तीसरे’ को आमंत्रित करने वाले अनेक अन्य कारक भी हैं।
-पति-पत्नी की आर्थिक स्थिति असमान होना।
-पति-पत्नी की आयु में भारी अंतर होना: राजा दशरथ-कैकई, राजा सलवान-लूणा, राजा रसालू-कोकलां वगैरह-वगैरह इस की ज्वलंत उदाहरणें हैं।

पति-पत्नी की शैक्षणिक योग्यता में भारी अंतर भी इस ‘तीसरे’ को आमंत्रण देता है।

एम.ए.तक पढ़ी लिखी लड़की, यदि अनपढ़ को ब्याह दी जाएगी तो बहुत कम मौक़े होंगे कि लड़की उस अनपढ़ के साथ समायोजन कर ले।

या तो वो लड़की कुंठा ग्रस्त हो जाएगी अथवा अपने लिए अपने जैसे की तलाश करेगी।
इस सबके अलावा वक्‍़त के साथ-साथ न बदल पाने की अक्षमता भी ‘तीसरे’ को आमंत्रित करती है। उदाहरण लेते हैं एन.टी.रामाराव जी की और गुलशन कुमार जी की। इन दोनों उदाहरणों में तीसरे की प्रकट आमद आयु के उत्तरार्द्ध में हुई जब ये अपने अपने क्षेत्र में स्थापित हो चुके थे। साधारण आदमी से महानायक बन चुके थे। बाहर वालों के लिए ‘सिद्ध’ बन चुके थे किन्तु घरवालों के लिए ‘जोगड़े’ ही थे। प्राय: ऐसी उदाहरणें मिल जाएंगी।

कई विवाह पूर्व संबंध, विवाहेत्तर भी जारी रह जाते हैं।
आज भारतीय रुपए की भांति नैतिक मूल्यों का भी अवमूल्यन हो रहा है। शादी नाम की संस्था को संकट का सामना करना पड़ता है। आज हर मन में ‘चाह’ की चाह छिपी है। चाह है, नित्य नए अनुभव प्राप्‍त करने की। नए पैन, नई घड़ी, नई पोशाक की भांति ही नए-नए रिश्ते गांठने की। रंग-बिरंगे मुखौटे मिलते हैं दुनियां के बाज़ार में, तभी तो किसी शायर ने लिखा है:

हर आदमी में छिपे रहते हैं दस-बीस आदमी,
जब भी किसी से मिलिए, बार-बार मिलिए।।

दुनियां के बाज़ार में आज की तारीख़ में सबसे लोकप्रिय है इश्क, प्यार, मोहब्बत! इसी की चाबी लगा कर ‘तीसरा’ दम्पति के मध्य आ खड़ा होता है।

आज समय की पुकार है रसातल में जा रही नैतिक क़ीमतों को गिरने से बचाया जाए। इसके लिए सबसे पहले आवश्यकता है ‘परिवार की नींव’ शादी नाम की संस्था में विश्‍वास की लौ जलाई जाए जिसे विश्‍वासघात की आंधियों से बचाया भी जाना चाहिए।

दम्पति के मध्य तीसरा क्यों, कब, कैसे, कहां आ सकता है। सब सम्भावनाओं का समूल नाश करना दम्पति का कर्त्तव्य, है, जिसके लिए परम आवश्यक है- परस्पर प्रेम, विश्‍वास और विवेक।

शादी कोई लाइसेंस नहीं, न ही एक व्यक्ति के नाम दूसरे को शोषित कर सकने का परमिट ही है, न ही यह ‘कब्ज़ा’ है। यह तो आपसी समायोजन का नाम है। यत्न होने चाहिए कि एक छत के नीचे रहने वाले मात्र साथ-साथ ही न रहें, वरन् एक-दूसरे के इतना क़रीब हो कर रहें कि तीसरे को आने के लिए जगह ही न मिले।

यदि ऐसा हो तो खंडहरों को मकानों में और मकानों को घरों में तबदील होते देर नहीं लगेगी। स्वस्थ दाम्पत्य स्वस्थ परिवारों की सृजना करेगा, स्वस्थ परिवार स्वस्थ समाज का निर्माण करेंगे।

ध्यान रहे कि जितनी पूंजी व्यक्‍ति के पास अपनी होती है उतना ही खर्च वो निश्‍चिंत हो कर कर सकता है। उधार ली हुई सम्पत्ति‍/पूंजी को एक न एक दिन लौटाना पड़ता है। विवाहेत्तर संबंध ऐसी ही उधार की पूंजी होते हैं जिन्हें न तो समाज मानता है न परिवार ही इन्हें मान्यता देता है।

कोई व्यक्‍ति विवाहेत्तर चाहे जहां भाग ले किन्तु अपराध बोध से मुक्‍ति नहीं पा सकता।

यूरोप के किसी प्लेब्वाय ने यह रहस्योदघाटन किया था कि उसे जो संतुष्‍टि अपनी धर्मपत्नी के पास आकर मिलती है, वो अपने धन्धे में मिलने वाली औरतों से नहीं मिलती।

ध्यान रहे शादी का वर्तमान भी होता है और अतीत भी जबकि नाजायज़ रिश्ते तो बालू की भांति होते हैं जिनका न अतीत होता है न वर्तमान और न ही भविष्य।

सयाने कहते हैं कि नाजायज़ रिश्ता केवल कब्ज़ा है और अंधेरे और ज़ुर्म की भावना वाले वातावरण में एक दूसरे को उजाड़ने का अमल है।

शादी-शुदा ज़िन्दगी की सफलता के लिए यदि पति दिमाग़ और पत्नी दिल वाला रोल निभाए तो सोने पे सुहागा।

सफल शादी मनुष्य की मनुष्यता, विद्वान की विद्वता, मर्द की मर्दानगी, औरत की ममता की परख, बहादुर की बहादुरी का इम्तिहान है।
स्वप्न-कली को फूल करने की प्रक्रिया है यह।

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