खूंटी से बंधी नारी

-मीरा हिंगोरानी

आज समाज का हर कोना लुटती पीटती औरतों से भरा पड़ा है। आए दिन समाचार पत्रों में, नित नई घटनाएं पढ़ने को मिलती हैं। जब नारी की सहन सीमा समाप्‍त हो जाती है, तब सामूहिक आत्म-हत्या की घटनाएं भी देखने को मिलती हैं। तब पूरा का पूरा परिवार समाप्‍त‍ि के शिखर पर रहता है। तब पछतावे की लम्बी कतारें पीछे रह जाती है।

हर समय औरत को ग़ुलाम की नज़र से देखना, हुकम बजा न लाने पर उसे अपमानित, प्रताड़ित करना। उसके अहं पर वार कर, उसे घर निकासी देने में ही मर्द का मर्दानगी से जुड़ना साबित करता है। ऐसे में यदि बंधिनी स्वतंत्रता का दावा करे तो उसके इरादों को वहीं कुचल दिया जाता है। उसकी इच्छाओं, अभिलाषाओं को पनपने नहीं दिया जाता। आज भी गांवों में स्थिति यह है कि विभिन्न जाति के युवा प्रेमी यदि प्रेम बंधन में बंधते हैं तो उनके माता-पिता उन्हें शारीरिक यातनाएं देकर उन्हें आत्म-हत्या करने पर विवश कर देते हैं। मानो प्रेम करना गुनाह हुआ। देवदास जैसी ‍फ़िल्‍मों से यही शिक्षा मिलती है। ग़लत जगह किया गया ‘पारो’ का विवाह, अपने पति की उम्र जितने बेटे, घर की ग़लत मान-मर्यादाएं सभी का भुगतान, अकेले उसी एक ‘नारी’ की बपौती बन जाते हैं। ‘देवदास’ में लेखक ‘शरत्’ जी ने सामयिक समाज की कुरीतियों का अति उत्तम ढंग से चित्रण किया है।

आज का समाज ऐसी ‘पारो’ से भरपूर है। अब यदि दोनों प्रेमी स्वावलम्बी बनकर, अपनी इच्छाओं को संचित करें और उठ कर समाज का मुक़ाबला करें तो कुछ बात बने। कुछ ऐसी भी संस्थाएं हैं जो प्रताड़ित नारियों की सहायता हेतु आगे आती हैं। इतने अत्याचारों की सिल्ली पीठ पर बांधे, चलती नारी को क्यों कोई पुरुष आज तक समझ नहीं पाया। इस तरह जंगली हरकतें करते हुए हम ‘बर्बर युग’ में जी रहे हैं। यदि कहीं प्रेम-क्रीड़ा में असफलता मिली तो झट प्रेमिका का गला घोंट कर हत्‍या कर डाली। ये इकीसवीं सदी के कायर प्रेमी संकल्प और संघर्ष की नदी पार क्यों नहीं कर सकते। जिस समाज में इतने बुज़दिल युवा पुरुष, पल-बढ़ रहे हों, वह समाज यक़ीनन भीतर से जर्जर व खोखला होगा।

देखा जाए तो सब जगह पुरुषों की मनमानी चलती है। अगर न चली तो उन्हें हीनता की ग्रन्थि जकड़ लेती है। यदि परिवार की पहली संतान बेटा हुई तो बड़े होने पर वह भी अपने पिता के पदचिन्हों का अनुसरण करता है। अपने ही परकोटे में, क़ैद होकर रह जाती है, तो बस नारी! बस यहीं से पुरुष की मर्दानगी नज़र आती है। पहाड़-सा लम्बा रसहीन जीवन नारी क्यों सिसक कर काटे ? क्यों पग-पग पर पीड़ा के घूंट पिए ?

आज नारी सजग हो उठी है। अपने पैरों की ज़मीन पा ली है उसने। अब यह निस्‍सहाय नहीं रही। न रुकेगी, न झुकेगी, आगे बढ़ती रहेगी। अब यह गाय की तरह, खूंटी से बंधकर भी नहीं रहेगी।

आओ! आज प्रण लें उसे सक्ष्म बनाने में, पग-पग पर, उसका साथ देंगे। अपने हकों की जंग वह अकेले नहीं लड़ेगी।

                “पहले प्रेम फिर सज़ा की बेड़ी पहनाता पुरुष,

               उसके मूल्यांकन का दावेदार भी पुरुष।

                   अपने ही जायों से लांछित,

                   किससे पूछे अपनी पहचान!!

 

 

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