पतिगण ज़रा इधर भी गौर फरमाइए

 Part 1

 

– नील कमल ‘नीलू’

आज की नारी- यह शब्द आजकल पत्रिकाओं में एक विशेष स्थान हासिल कर चुका है। इस विषय पर आधारित लगभग प्रत्येक लेख में कुछेक बातें अवश्य दृष्टिगोचर हो जाती हैं, पर चूंकि इसी विषय को लेकर लेख की शुरूआत की गई है, अत: उन महत्वपूर्ण बातों को एक बार फिर दोहराना अति आवश्यक हो जाता है।

‘आज की नारी’ यह शब्द ही ऐसा है जो हमें आज और अतीत की तुलना करने पर विवश कर देता है। पहले जहां नारी अपनी घर की चौखट के अंदर, घूंघट काढ़े खामोशी से घर के काम काज में व्यस्त दिखाई देती थी, वहीं आज वो इस चौखट के बाहर क़दम रख चुकी है व पुरुषों वाले हर क्षेत्र में अपनी निपुणता व सफलता के झण्डे गाड़ चुकी है। पर इसी के साथ यह तथ्य भी विचारणीय है कि महिलाओं की बड़ी तादाद आज भी अपने घर की दहलीज़ के अंदर ही अपने कार्यक्षेत्र को सीमित किए हुए है। लेकिन जब कल और आज के बीच इतना बड़ा परिवर्तन आया है तो इन घरेलू महिलाओं की पदोन्नति होना भी तो आवश्यक था। तो उसी कार्यक्षेत्र की सीमारेखा में इनकी पदोन्नति हुई। जहां उसे घर की इज़्ज़त, गृहशोभा या घर की लक्ष्मी के नाम दिए गए थे, वहीं उसे इन के साथ-साथ एक अन्य नाम से निवाज़ा गया और वो है- गृहस्वामिनी। इस नाम ने न केवल उसके गौरव को बढ़ाया, अपितु उसमें एक नई स्फूर्ति, नए आत्मविश्‍वास का संचार किया।

मैं जानती हूं कि आप सोच रहे हैं कि मैं वास्तविक विषय से दूर हूं, किन्तु उस विषय तक पहुंचने के लिए यह आधार बनाना आवश्यक था। ज़ाहिर है तमाम पतिगण उत्सुक हैं अपने काम की बातें जानने को- तो महाशय, तनिक धीरज धरिए, हम उसी पथ पर अग्रसर हो रहे हैं।

तो कैसे संतुष्‍टि रखा जाए अपनी आधुनिक पत्‍नियों को सबसे पहला गुर तो बातों ही बातों में सामने आ ही चुका है, तो जनाब आज बल्कि अभी से अपनी अर्धांगिनी को अपने घर की महारानी यानि गृहस्वामिनी के ख़िताब से निवाज़ दें, बस यह मैडल हासिल करने की देर है कि आपकी अर्धांगिनी सहर्ष आपकी दासी बन जाएगी। जी हां श्रीमान, इतना जान लीजिए कि आपका यह पहला ही तीर सीधे निशाने पे जा लगा है।

जी हां, बहुत मामूली बात है, अपनी घर के अंदर बंधी हुई दिनचर्या को लेकर आपकी पत्‍नी का डिप्रैस हो जाना या फिर उनके स्वभाव का दिन-ब-दिन बिगड़ते चले जाना। ऐसा हो जाने से घर में हर वक़्त तनाव हो जाना स्वाभाविक है। तो सोच क्या रहे हैं जनाब, हमारे कहे पर चलिए। सच मानिए आपकी दुनियां में फिर से बहार आने वाली है। बस अपनी ज़ुबान में थोड़ी सी मिठास मिलाइए और थोड़ी-सी मधुर पंक्तिेयों को रट लीजिए। जैसे- तुम्हारे बिना घर घर नहीं, तुम बिन मैं अधूरा हूं, तुम्हीं मेरी प्रेरणा हो, तुमने ही तो पूरे घर को संभाल रखा है, तुम नहीं होती हो तो पूरी गृहस्थी तहस-नहस हो जाती है, तुम्हारे दम पर ही घर की खुशियां हैं, पता नहीं कैसे तुम इस घर का ढेर सारा काम मैनेज कर लेती हो इत्यादि-इत्यादि। लेकिन बात का लहज़ा यूं होना चाहिए कि यह कतई न लगे कि उन्हें मसका लगाया जा रहा है, धीरे-धीरे यह अहसास करा दें कि अगर वो नहीं तो आप भी नहीं और आप की गृहस्थी भी नहीं। बस, फिर देखिए कि कैसे वो ‍ बिना रात और दिन देखे कठपुतली की तरह घर का हर काम खुशी-खुशी सर-माथे लेंगी। बस ज़रा उन्हें ऐसी प्रशंसा की लत डाल दें।

अरे महाशय, समस्याएं बताने की ज़रूरत कहां है? हम तो आपके दिल की हर बात पढ़ रहे हैं। यही न कि आप रोज़-रोज़ वही साधारण खाना खा-खा उक्‍ता चुके हैं? अरे भई, ज़रा मैडम की हालत पर भी तवज्जों दीजिए, क्या वो रोज़ के उसी चौंके-चूल्हे से तंग नहीं आतीं। पर यही काम वो हंसते-हंसते करेगी, यह हमारा वायदा है। ज़रा यह नुसख़ा तो आज़माइए। तो शुरूआत आज शाम की चाय से ही कीजिए। चाय की पहली चुस्की से ही आपके चेहरे से थकावट के भाव उतर जाने चाहिए। लेकिन पहली चुस्की पे प्रशंसा चाय की नहीं, आप की श्रीमति की होगी। “सच, आधी थकान तो तुम्हें देखते ही दूर हो जाती है।” देखिए, मैडम के चेहरे पर आ गई न मुस्कान! अब बारी है दूसरे वार की। झट से कह डालें, “तुम जब यूं मुस्कुरा कर स्वागत करती हो न, तो दफ़्तर की हर टेन्शन को भूल जाता हूं।” इस बात का नतीजा आपको अब नहीं, कल दफ़्तर से लौटने पर मिलेगा। दरवाज़ा खुलते ही आपका स्वागत होगा एक मधुर मुस्कान से और अब बारी है दूसरी चुस्की की, चुस्की लेते ही कहें, “भई तुम्हारी चाय भी कमाल है। सच में, तुम्हारी कुकिंग की तो दाद देता हूं, तुम्हारे जैसा स्वादिष्ट खाना मैंने कहीं और नहीं खाया। शायद इस का कारण इस में मिला हुआ तुम्हारा स्नेह है।” बस………बस………..ज़्यादा नहीं, इतना ही काफ़ी है। इसी में रोज़मर्रा का साधारण खाना तो और लज़ीज़ बनने ही लगेगा, बल्कि आपको आए दिन नए-नए पकवान भी खाने को मिलेंगे। बस इतना कष्ट कीजिए कि इन बातों को विभिन्न अंदाज़ में थोड़े दिनों के अंतराल पर दोहराते रहें।

घबराइए मत मिस्टर, आपकी इस आख़िरी समस्या का समाधान भी हमारे पास है। पर बेचारी मेमसाब का दोष इसमें है कहां? वो बेचारी तो गृहस्थी में इतनी उलझ चुकी है कि अपनी तरफ़ उसका ध्यान कैसे जाएगा। पर ज़रा विचार कीजिए, कहीं आप भी वो शादी के शुरू-शुरू वाली मधुर बातें भूल तो नहीं गए। भई, ज़रा उनकी खूबसूरती की प्रशंसा तो कीजिए। यदि वो बेहद खूबसूरत है तो अंदाज़ कुछ यूं हो- “तुम्हारी इस दिलकश खूबसूरती के तो हम शुरू से ही क़ायल हैं।” यदि वो सांवले रंग रूप की है तो यूं “तुम्हारे इस सलोने रूप ने ही तो हमें घायल किया था।” यदि वो सामान्य सी है यानि बहुत सुन्दर नहीं है, तो कुछ यूं, “तुम्हारा यह सादा रूप तो मुझे हमेशा ही लुभाता है” और यदि वो अपनी खूबसूरती गंवा चुकी है तब भी “तुम आज भी मुझे आकर्षित करती हो। तुम में अब तक वही जादू है।” इस आगाज़ के बाद, “तुम्हें पहना-ओढ़ा बहुत फबता है। ज़रा सा तैयार होने या बनने संवरने से ही तुम सबसे अलग नज़र आती हो” इत्यादि-इत्यादि।

सच मानिए हुज़ूर, यह फ़िल्मी बातें नहीं। हर पत्‍नी अपने पति से इन बातों की अपेक्षा करती है। यदि आप उनकी अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरते तो आप यह अपेक्षा कैसे करते हैं कि वो आपकी अपेक्षाओं पर खरी उतरे। कल और आज की गृहस्वामिनियों में इतना अंतर तो आया है कि जहां कल वो आपके रौब को सह कर आपकी हर आज्ञा का पालन करती थी, वहीं आज वो अपने दिल की बात सुनने लगी है। केवल आपकी इच्छाएं पूरी करने की बजाय, वो आपसे भी कुछ अपेक्षाएं रखने लगी है और फिर सुखी जीवन कौन नहीं चाहता। ज़रा यह नुसख़े आज़मा कर तो देखें। बहुत आसान हैं, और असर लाजवाब है। यानि दाम में कम और काम में दम।

अ…….अ…….इसका मतलब यह हरगिज़ मत लें कि मेरे पतिदेव ये सब चालाकियां मुझ पर आज़माते हैं। यह सच है कि वो मेरी प्रशंसा करते हैं, खूब करते हैं। पर मुझ में तो ये सारी खूबि‍यां वास्तव में विद्यमान हैं। अत: मेरे श्रीमान् तो सिर्फ़ सच्चाई ब्यां करते हैं, पर ज़रूरी तो नहीं कि जो खूबियां उनकी श्रीमति में हैं, वो आपकी श्रीमति में भी हों। कहो, कैसी रही?

 Part 2

– नील कमल ‘ नीलू’

जैसे ही सरोपमा का नया अंक हाथ में आया, फ़ोन की घंटी घनघनाई। दूसरी तरफ़ से एक प्रिय सखी का रोष भरा स्वर सुनाई दिया, ‘क्‍या नीलू, हमारी श्रेणी की होते हुए तुम ने पतियों के पक्ष में लेख लिख दिया? तुम्हारा लेख तो पत्‍नियों को संबोधित होना चाहिए था, इसके विपरीत तुम पतिगण को चातुर्य सिखा रही हो?’ मैं स्तब्ध सी रिसीवर को कान लगाए बैठी थी। बहुत समझाया, ‘अरे भई, तुम्हें पक्ष में विपक्ष दिखाई दे, तो मेरा क्या दोष? इन चंद बातों को यदि पतिगण ध्यान में रखेंगे, तो सुखी जीवन की प्राप्‍ति तो दोनों को होगी।‘ खै़र! ज्‍़यादा तर्क-वितर्क में न पड़ने की सोची और बात समाप्‍त की। जब चंद और सखियों ने शिकायत की तो, बिना कोई जवाब दिए, बस चेहरे पर एक मुस्कान ओढ़ ली और सोचा कि अब तो यह शिकायत ‘सरोपमा’ के ज़रिए ही अगले अंक में दूर करनी पड़ेगी।

अभी अपनी संगीनियों, इन आधुनिक गृहस्वामिनियों के प्रति अपना कर्त्तव्‍य निभाते हुये एक नया लेख लिखने की सोच ही रही थी कि एक नई समस्या खड़ी हो गई, जिसने न केवल अचंभित किया अपितु दुविधा में डाल दिया। अब की बार शिकायत पतिगण की ओर से थी। कुछेक का कहना था कि उन्होंने अभी मेरा लेख पढ़ा ही नहीं था। किसी अच्छे मूड में पत्‍नी की प्रशंसा कर बैठे, पत्‍नी तमतमा गई। उसके बाद यह आए दिन की बात हो गई। जब कभी पतिदेव किसी बात पर प्रशंसा कर बैठते, श्रीमति जी अच्छा-भला मूड बदल कर लाल-पीली हो उठतीं, ‘खूब जानती हूं, इन चोंचलों को। अभी सरोपमा पढ़ कर आ रहे हो क्या? खूब असर पड़ा है।’ निर्दोष व अचंभित पति महोदय असमंजस में पड़ गए कि आख़िर उनसे ख़ता कहां हो गई। इस विचित्र पहेली को सुलझाने के लिए ‘सरोपमा’ उठाई और पढ़ डाली, जब ‘पतिगण ज़रा इधर भी ग़ौर फरमाईए’ नाम का लेख पढ़ा तो सभी सवालों का जवाब उन्हें मिल गया और श्रीमति का पूरा गुस्सा शिकायतों के ज़रिए लेखिका यानि मुझ पर उड़ेल दिया।

इधर रोज़ की शिकायतों, टीका-टिप्पणियों से परेशान मैं कोई भी निष्कर्ष निकाल पाने में असमर्थ सी हो गई। ज़िन्दगी में कुछ कर पाना, कुछ बन पाना जितना आसान दिखता है, उतना होता नहीं। एक बार बेचारे मुरारी चले थे हीरो बनने और बस भटक के रह गए और इस बार मैंने कुछ थोड़ा बहुत लिख कर कुछ करने की कोशिश की। सोचा अगर ज़रा सी क़लम चलाने से चंद घरों में खुशी आ जाए, तो मेरा क्या जाएगा। कहते हैं, नेकी कर दरिया में डाल। लेकिन यहां तो मामला ही उलटा था, मेरी नेकी खुद मुझे दरिया में डालने को तैयार बैठी थी।

इधर मेरे श्रीमान जी सबसे पहले मेरा लेख पढ़ अत्यंत प्रसन्न दिखाई दिए थे और मेरे प्रशंसक होने का दावा करने लगे थे, वही आज मेरी विचित्र परिस्थितियों का चटखारे ले ले कर आनंद उठा रहे थे। शाम को दफ्‍़तर से लौटते, तो प्रतिदिन इकलौता प्रश्‍न उनकी जुबां पर आने से नहीं चूकता, ‘तो आज किस-किस ने शिकायत की?’ मैं अपना सा मुंह लेकर रह जाती, तो उनके मुख-मंडल की आभा और बढ़ जाती, ‘चलो भाई! इतना तो है कि तुम्हारी वो पुरानी शिकायत तो दूर हो गई। कम से कम घर में बोर होने का टाइम तो नहीं मिलता।’ और मेरा पीड़ित मन उनके इस कटाक्ष को सुनकर भी ख़ामोश रह जाता। वही मैं जो हर उत्तर पर प्रत्युत्तर करना और हर वाद-विवाद में सबको चुप करा देना अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानती थी, वहीं इस विषय पर कोई बात छिड़ते ही चुप्पी साध लेने में बेहतरी मानने लगी। एक चुप और सौ सुख-इस बात का गूढ़ अर्थ मैंने पहली बार समझा था।

सोचा था, मेरा यह एक प्रयास तमाम पाठकों व पाठिकाओं के चेहरे पर खुशी की छटा दिखलाएगा और करिश्मा देखो, उलटे यह प्रयास सबके माथे पर क्रोध की लकीरें दर्शा रहा था। सो, प्रसन्नता तो न पतियों को हुई और न श्रीमतियों को और इधर निरुत्तर हुई बैठी मैं किसी को कुछ भी कहे बिना मन ही मन एक पुराना गीत गुनगुना कर रह गई,

‘यह शमा तो जली रोशनी के लिए

इस शमा से कहीं आग लग जाए तो,

यह शमा क्या करे।‘

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