क्या आकर्षण ही प्रेम है

 

बलबीर बाली

बात हमारे मित्र पंकज की है। मित्र क्या वो तो हमारे छोटे भाइयों की तरह है। शायद इसलिए ही वह हमसे कोई बात नहीं छिपाता था परन्तु उस दिन तो पंकज के रंग-ढंग ही बदले हुए थे। समय दोपहर लगभग 12 अथवा 12.30 का होगा। हम अपने ऑफ़िस के लिए तैयार हो रहे थे, कि अचानक हमारे घर के बाहर स्कूटर आकर रुका। शीघ्र ही स्कूटर सवार ने हमारे घर का दरवाज़ा खोला और वहीं से हमें पुकारना शुरू कर दिया। हमारी माताश्री जोकि हमारे पास ही बैठी हुई थी ने कहा, ‘आ गया अफ़लातून।‘ माता जी उठ कर बाहर जाने लगी, तो पंकज सामने आ खड़ा हुआ। उसने माता जी को चरणवंदना की व अपने आप को संयमित करते हुए उनका कुशल क्षेम पूछा। मां ने पूछा, ‘क्या लोगे चाय या ठण्डा’, तो पंकज ने कहा, ‘कुछ नहीं आंटी, बस बाहर जा कर ले लेंगे। मैं भइया को लेने आया हूं।‘ मम्मी पंकज की बात सुन कर बाहर चली गई, क्योंकि अक्सर वह हमें अपने साथ ले जाता था।

हम नित्य प्रति के हिसाब से तैयार हो रहे थे परंतु पंकज की कौतूहलता बढ़ती जा रही थी। जब हमसे न रहा गया तो हमने पूछा, ‘यार, क्यों आसमान सर पे उठा रखा है, क्या कोई लाटरी लग गई है?’ तो उसने मुस्कुराते हुए कहा ‘कुछ यूं ही समझ लो।’ हमने पूछा क्या मतलब तो उसने शीघ्र तैयार होने का कह कर बात बीच में ही रोक दी। ख़ैर हम तैयार हो गए और पंकज हमें एक होटल में ले गया। वहां उसने दो कप काफी के मंगवाए और कहने लगा, ‘भइया, आज मैं बहुत खुश हूं, आज आप जो भी लेना चाहें ले सकते हैं।’ हम हैरान थे आख़िर इसके साथ ऐसा क्या हो गया।

इतने में पंकज ने अपना पर्स खोला, तो हमने उसका हाथ रोका और कहा, ‘पंकज पैसे हम दे देंगे’, तो वह बोला, ‘नहीं, भइया, पैसे नहीं निकाल रहा हूं, आपको कुछ दिखाने लगा हूं।’ उसने अपने पर्स से एक पत्र निकाला जिसके साथ एक तस्वीर भी थी, उसने हमें दिखाते हुए कहा, ‘देखो भइया, कैसी रही।’ हमने पत्र देखा तो वह अपने आरम्भ से ही हमें एक प्रेम-पत्र प्रतीत हुआ, पत्र बिना पढ़े ही जब हमने तस्वीर देखी तो हैरान रह गए, चित्र किसी 17-18 वर्षीय खूबसूरत लड़की का था। हमने हैरानी से पंकज से पूछा, ‘यह क्या है?’ तो वह कहने लगा, ‘भइया यह चांदनी है।‘ तो हम क्या करें, हमने तनिक गुस्से में कहा तो पंकज कहने लगा, ‘भइया, मैंने आपसे आज तक कुछ नहीं छिपाया, तो भला मैं यह बात कैसे छिपा सकता हूं। आज चांदनी ने मुझे प्रॅपोज़ किया है। भइया, मैं तो सोच भी नहीं सकता कि वो मुझे प्रॅपोज़ करेगी।‘ फिर उसने हमें चांदनी व अपनी सारी डिटेल बताई……..। और कहा भइया, ‘उसने मुझे जवाब देने को कहा है, आप तो जानते हैं कि मेरा ऐसा कोई टारगेट नहीं था, पर यदि कोई लड़की प्रॅपोज़ करे तो मैं कैसे चुप रह सकता हूं।‘ हमने कहा, ‘फ़िलहाल तो हम ऑफ़िस के लिए लेट हो रहे हैं, हम तुम्हें कल इस बारे में बताएंगे।’ ‘ठीक है’, कह कर पंकज ने हमें ऑफ़िस छोड़ा व चला गया।

हमारे पास चांदनी द्वारा लिखा हुआ प्रेम पत्र पड़ा हुआ था, जब हमने उसे पढ़ा तो एक दुविधापूर्ण मनोस्थिति पैदा हो गई कि अन्तत: हम पंकज को क्या उत्तर दें, क्योंकि यदि छोटे भाई को हम सही मार्ग न बता पाए तो हमारे लिए अच्छी बात न होती। चांदनी ने अपने पत्र में पंकज के प्रति पैदा हुए आकर्षण के बारे में लिखा था। उसने लिखा था कि पंकज की अदाओं, उसका बात करने का अंदाज़ और उसके ड्रेसिंग सेन्स के कारण वह किस प्रकार उसकी ओर आकर्षित हुई है और अपने दीवानेपन का हाल बयान किया था। उसने पत्र में यह भी बताया था कि वो इस बारे में अपनी फ्रैंडस से भी बात कर चुकी है और उनकी हामी भी भरवा चुकी है।

यह तो था चांदनी द्वारा बताया गया, अपना हाल। हम परेशानी में थे कि पंकज द्वारा किया गया निष्कपट व्यवहार चांदनी के लिए आकर्षण का केन्द्र तो बन गया, परन्तु चांदनी ने जो इस आकर्षण को प्रेम का नाम दे दिया, क्या इसी को प्रेम कहते हैं? परन्तु वास्तव में तो यह एक मात्र आकर्षण ही है। हमने निर्णय कर लिया कि हम पंकज को वास्तविक स्थिति से अवगत ज़रूर करवाएंगे।

अगले दिन पंकज सुबह ही हमारे घर पर उपस्थित था। हमने उसे व्यंग्य करते हुए कहा, ‘क्या रात को नींद भी आई या नहीं?’ पंकज कुछ झेंपता हुआ बोला, ‘भइया भला नींद कैसे आ सकती है।’ हमने भी मन में सोचा कि इसमें भला पंकज का क्या दोष। यदि पंकज के स्थान पर कोई दूसरा भी होता है शायद उसकी मनोस्थिति भी कुछ इसी तरह की होती। हमने पंकज को अपने विश्‍वास में लेते हुए कहा, ‘पंकज यदि हम तुम्हें इस संबंध में कुछ ऐसा कहें जो तुम्हें पसंद न हो तो क्या तुम हमारी बात मानोगे।’ पंकज यकायक गंभीर हो गया, ‘क्या मतलब भइया? कहीं आप प्रॅपोज़ल रिफ्‍़यूज़ करने के लिए तो नहीं कह रहे। हम कुछ कहते इससे पहले ही पंकज भावुक हो गया, और कहने लगा, ‘भइया चांदनी कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं। सारे कालेज के लड़के उसके पीछे-पीछे घूमते हैं।’ हमने पंकज को समझाते हुए कहा, ‘अरे नहीं, पंकज पहले हमारी बात तो सुनो फिर कुछ कहना।’

पंकज अपने आप को संयमित करते हुए बोला,’बताओ।’ हमने कहा कि ‘हम यह तो नहीं कह रहे कि चांदनी का चरित्र ठीक नहीं बल्कि हम तो यह कहना चाहते हैं कि जो कुछ उसने तुम्हें लिखा है, वह लड़कपन और चंचलता के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं, यह तो मात्र एक अल्पकालिक अनुभूति है, जिसे हम प्रेम नहीं बल्कि आकर्षण मानते हैं, जो इस आयु में प्रत्येक इंसान को होता है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष। समझ रहे हो न जो हम कह रहे हैं। पंकज चुप रहा। हमने उसे समझाया और कहा, ‘तु़म चांदनी को मिस नहीं करना चाहते।’ तो पंकज बोला, ‘हां’। मानों हमने उसकी दुखती नब्ज़ पहचान ली हो। हमने उसे बताया कि इस समस्या का भी समाधान है तुम उसे मिलो और समझाओ कि वह इस भ्रम की स्थिति को न पाले कि वह तुमसे प्रेम करती है, हां जो यह आकर्षण पैदा हुआ है, उसका अन्त यह है कि तुम दोनों एक अच्छे दोस्त बनो और तुम अच्छे दोस्त के मायने तो समझते ही हो। दोस्त वह होता है जो व्यक्‍ति को चाहे। वह स्त्री हो या पुरुष उस के सुख-दु:ख में काम आए। उसे कुमार्ग पर चलने से रोके। हमने पंकज को समझाया कि वह चांदनी के प्रति पूरी ईमानदारी बरतने का आश्‍वासन दे, क्योंकि भारतीय समाज नारी व पुरुष की मित्रता को कभी स्वीकार नहीं करता अब इसे हम अपनी रूढ़िवादिता कहें या कुछ और, हम इस विवाद में फ़िलहाल नहीं पड़ना चाहते। सौभाग्य था कि पंकज ने हमारी बात को अन्यथा नहीं लिया। वह चांदनी से मिला और उससे वही बातें कीं जो हमने बताई थीं।

हम ऐसी तमाम लड़कियों को, जो चांदनी की ही विचारधारा रखती हैं समझाना चाहते हैं कि यह उम्र का तक़ाज़ा है कि आकर्षण ही प्रेम लगता है, जबकि आकर्षण ही प्रेम का नाम नहीं है। आकर्षण का केन्द्र रहा व्यक्‍ति दोस्त तो बनाया जा सकता है परन्तु प्रेमी नहीं। हम यह चाहते हैं कि आज की युवा पीढ़ी चाहे पुरुष हो या स्त्री इस भ्रम से बाहर निकले। अन्यथा इस समय में की गई भूल से भविष्य में पश्‍चाताप् के अतिरिक्‍त और कुछ नहीं मिलता। हमने पंकज से वादा लिया, क्योंकि वह दोनों ही आधुनिक परिवार से संबंधित थे, कि वह अपनी फ्रैंडशिप के बारे में अपने घरवालों को अवश्य बता दें ताकि उनके माता-पिता का विश्‍वास उन पर और बढ़ सके व सबसे बढ़कर वह एक दूसरे के प्रति ईमानदार रहें व पथ भ्रमित न हों।

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