जब तन महके तो मन बहके

–विजय रानी बंसल

जहां एक ओर आज की नारी घर की चारदीवारी से बाहर निकल बाहर की दुनियां में ज़्यादा व्‍यस्‍त हो गयी है, वहीं अपने सौंदर्य तथा व्यक्तित्व के प्रति ज़्यादा जागरूक भी हो गयी है। अपने को अधिकाधिक सुन्दर दर्शाने के लिए वह तरह-तरह के ज़ेवर, कपड़े व सौन्दर्य प्रसाधनों का इस्‍तेमाल भी करने लगी है। जब इन सौन्दर्य-प्रसाधनों की बात चलती है तो इनमें एक नाम इत्र या परफ्यूम का भी जु़ड जाता है। सुन्‍दर दिखने के साथ-साथ उसका व्यक्तित्व महका-महका सा रहे, इसके लिए वह काफ़ी जागरुक हो गयी है।

यदि हम इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो पायेंगे कि प्राचीन काल से ही इत्र का प्रयोग हमारे देश में होता है। गुलाब व हिना का इत्र महिलाओं की विशेष पसन्द थी। मुगल बादशाहों की बेगमें नहाने के टब में गुलाब की पत्तियां डालकर नहाया करती थीं। इत्र की खोज मुगल साम्रज्ञी नूरजहां ने की थी। नूरजहां अपनी सुन्दरता के साथ-साथ अपनी नज़ाकत के लिए भी मुगल इतिहास में प्रसिद्ध है। एक दिन उसने नहाने के टब में पड़ी गुलाब की पत्तियों की खुशबू के साथ-साथ उनकी स्निग्धता को भी महसूस किया। तभी उसे लगा कि गुलाब का ‘इत्र’ बनना चाहिए। उसने शाही हकीम को इसका आदेश दिया और शीघ्र ही गुलाब का इत्र आकर्षक बोतलों में महकने लगा। कहने का तात्पर्य है कि खुशबू का नारी जीवन में अलग ही महत्त्व है। अगर हमारे करीब से कोई स्त्री भीनी–भीनी सी खुशबू छोड़ती हुई गुज़र जाती है तो हम अनायास ही पीछे मुड़़कर देखने को मजबूर हो जाते हैं। ‘वाह! क्या खुशबू है’ कहकर हमारा मन बाग़-बाग़ हो जाता है।

आप महकें ज़रूर, मगर इस खुशबू का प्रयोग ज़रा सावधानी से कीजिए। कहीं ऐसा न हो कि आप महकने के चक्‍कर में दूसरों के लिए परेशानी का कारण बनें क्योंकि तेज़ महक वाले सैंट के प्रयोग से आस-पास के लोगों को कई प्रकार की उलझनें पैदा हो सकती हैं जैसे जी मिचलाना, चक्कर आना, सिर में दर्द होना या अजीब-सी घुटन महसूस होना। महक वही सर्वोत्तम है जो दूसरों को भी महकने पर बाध्य कर दे।

वैसे तो हमारे देश में हर तरह का इत्र मौजूद है पर अभिजात्य वर्ग की महिलाओं में विदेशी परफ्यूम काफ़ी लोकप्रिय है और इसका प्रयोग एक प्रकार का ‘स्टेटॅस सिम्बल’ बन गया है। मध्यम वर्ग की महिलाएं भी विदेशी सैंट के नाम पर नकली माल ख़रीदने का लाभ संवरण नहीं कर पाती है और महंगे सैंट ख़रीदने की अंधी दौड़ में शामिल हो जाती हैं जिसका नतीजा अन्तत: निराशा ही होती है।

हमारे अपने ही देश में अत्यन्त उच्‍च कोटि के इत्र बाज़ार में उपलब्ध हैं। गुलाब, जूही, चम्‍पा, चमेली, खस, कस्‍तूरी, मोगरा, रात की रानी आदि न जाने ऐसे कितने ही ‘इत्र’ हैं जिनकी सुगन्ध तन के साथ-साथ मन को भी भीतर तक महका देती है। गर्मी के मौसम में गुलाब व खस का इत्र भीनी-भीनी सुगंध के साथ शीतलता का भी एहसास कराता है। इसके अतिरिक्त जहां एक ओर ये हमारे व्यक्तित्व को ताज़गी देते हैं, वहीं हमारे आस-पास के वातावरण को भी तरो-ताज़ा रखते हैं। इत्र का प्रयोग यदि आयु व व्यक्तित्व के अनुरूप किया जाए तो बेहतर होगा। इससे आप भीड़ में भी अपनी एक अलग पहचान बना सकती हैं। सुबह व शाम के समयानुसार खुशबू में भी अंतर लेना चाहिए। गर्मियों के दिनों में जब कूलर व एयरकंडीशनर चल रहे होते हैं तो बंद कमरे होने की वजह से तीखे सैंट की महक से मन बेचैन-सा होने लगता है और तब मन करता है कि कहीं ताज़ा हवा में निकल कर बैठा जाए। याद रखिए, सैंट ताज़गी के लिए लगाया जाता है, सिर दर्द करने के लिए नहीं।

जिस प्रकार विभिन्न फूलों की महक भिन्न–भिन्न होती है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति की एक मौलिक गंध होती है इसीलिए यदि शारीरिक सफ़ाई का ध्यान रखा जाए तो किसी भी व्यक्ति की प्राकृतिक गंध को महसूस किया जा सकता है। इत्र को कानों के पीछे, गर्दन, कंधे के जोड़ों आदि पर लगाना चाहिए। इसे लगाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि नहाने के बाद पूरे शरीर को तौलिए से अच्छी तरह पोंछ लेना चाहिए फिर थोड़े से पानी में कुछ बूंदे इत्र की डालकर यदि पूरे बदन पर छिड़क लिया जाए तो यह पूरे शरीर में समा जाएगा और आपका सम्पूर्ण व्यक्तित्व पूरे दिन के लिए भीनी-भीनी खुशबू के एहसास से निखरा रहेगा। कंघी या हेयर ब्रश में थोड़ा-सा इत्र छिड़क कर यदि कंघी की जाए तो बाल ताज़गी से महक उठेंगे। मगर सैंट कभी बालों में सीधे नहीं छिड़कना चाहिए क्‍योंकि इनमें मिले रसायनों की वजह से बालों को नुक़सान पहुंच सकता है।

अत: निष्कर्ष रूप में यही कहा जा सकता है कि हर खुशबू का अपना ही परिचय है और अपना ही प्रभाव इसलिए इसका प्रयोग सोच-समझकर ही करना चाहिए और अंधानुकरण से बचना चाहिए। अपने व्यक्तित्व को एक अलग पहचान देने के लिए महकें ज़रूर मगर थोड़ा सोच-समझकर।

                                       


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