हमारी संस्कृति और प्रेम भावना

 

-बलबीर बाली

आज के इस भौतिकवादी युग में समाज मात्र एक वस्तु सी बन कर रह गया है। कुछ समय पहले की बात है कि हम अमरीका जैसे राष्ट्र को भौतिकवादी राष्ट्र समझते थे, जहां मानवीय मूल्यों की कोई महत्ता नहीं, प्रत्येक व्यक्‍ति को अपनी पड़ी होती है, दूसरा अन्य चाहे वह जिये या मरे, किसी को उससे कोई सरोकार नहीं। आज वही वातावरण मात्र अमरीका जैसे राष्ट्रों में व्याप्‍त न होकर सम्पूर्ण विश्‍व में फैल रहा है। भारत जैसे मानवीय देश में भी यही परिस्थिति अपना घर कर रही है, यदि कोई व्यक्‍ति सड़क पर दुर्घटना का शिकार हो जाता है तो हम उसकी मदद करने की बजाए इधर-उधर खिसकना अधिक सुलभ समझते हैं, तथा हरण हो जाता है मानव संस्कृति का, जिसका हम दम भरते हैं। क्या कारण है कि आपसी सहयोग, भ्रातृत्व, प्रेम भावना आज मात्र उपदेश बन कर रह गये हैं। हम यह नहीं कह सकते कि इन भावनाओं की इति हो गई है, ऐसा कहना सर्वथा अनुचित होगा, क्योंकि भारत जैसे देश के लोगों में यह भावना लुप्‍त नहीं हो सकती है, हमारे सामाजिक चक्र का केन्द्र बिन्दु है यह भावनायें।

सत्य यह है कि आज भारतीय मानव में यह भावनायें तो विद्यमान् हैं, परन्तु इन भावनाओं पर मानव ने अपने व पराये की परत चढ़ाई हुई है, इस पहलू ने मानव के विश्‍वास का आधार खोखला कर दिया है। आज इंसान सहयोग, भ्रातृत्व व प्रेम की भावना का पालन तो करता है, परन्तु काफ़ी सीमित हो कर अर्थात् केवल पारिवारिक सदस्यों के साथ।

पंजाब इन भावनाओं की अभिव्यक्‍ति में सम्पूर्ण भारत में सबसे अग्रणी रहा है, इतिहास साक्षी रहा है कि पंजाब के बाशिन्दों ने कई ऐसी उदाहरणें प्रस्तुत की हैं जिससे सहयोग, भ्रातृत्व व प्रेम की भावना की उपस्थिति का आभास होता है।

कितना हृदय-स्पर्शी विषय है न प्रेम। आज प्रत्येक व्यक्तिे चाहे वह पुरुष हो या महिला इस विषय की गहराइयों से भली-भांति परिचित है। इस शब्द के श्रवण मात्र से ही दिल में कुछ-कुछ होने लगता है, आज यह शब्द अपने विस्तृत स्वरूप से सब को अपनी ओर आकृष्ट कर चुका है, यद्यपि आज तक कोई भी व्यक्‍ति इस शब्द को उचित परिभाषित नहीं कर पाया क्योंकि प्रेम बहुत मायावी है, इसके भिन्न-भिन्न रूप हैं, इतने रूपों की गणना भी नहीं की जा सकती। इसके स्वरूप के बारे में भी कोई नहीं बता सकता। है न एक बेहद रोचक विषय जिसकी रोचकता उसके नाम से ही परिभाषित हो जाती है, क्यों न आज हम इस रोचक विषय जिसे स्मरण मात्र कर लेने से कौतूहलता पैदा हो जाती है के बारे में थोड़ा संजीदगी से सोचें।

आज प्रत्येक मनुष्य के जीवन में ‘प्रेम’ ने अपनी एक अलग छवि निर्मित की हुई है, दुनियां में कोई ऐसा प्राणी नहीं जिसके दिल में यह ‘प्रेम बीज’ अंकुरित न हुआ हो। प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी रूप में प्रेम पाश में फंसा हुआ है, मनुष्य के जीवन के आरंभ से ही प्रेम प्रवाहमान हो जाता है, शिशु का प्रेम उसकी मां से हो जाता है जबकि माता को अपने शिशु से। बड़ा होने पर यही प्रेम अपनी परिधि विकसित करता है, इस परिधि में फिर पिता, भाई, बहन, दादा, दादी, चाचा, चाची, मामा, मामी आदि के संबंध शामिल हो जाते हैं, जिनके माध्यम से प्रेम अपना विविध रूपों में विकास करता है। किशोरावस्था में पहुंचते ही प्रेम का दायरा और विस्तृत होने लगता है जब वह अपने मित्र-बंधुओं से प्रेम भावना का वरण करता है, तत्पश्‍चात एक जीवन संगिनी फिर पुत्र, बेटी, सास, ससुर, साली आदि संबंधों के रूप में प्रेम भावना प्रफुल्लित होती है। मरण तक न जाने किन-किन रूपों में विद्यमान् रहता है यह प्रेम। क्या कोई व्यक्‍ति अपने जीवन में इस प्रेम के महत्त्व से इन्कार कर सकता है। इन्कार कर सकता है मानव इन उपरोक्‍त परिस्थितियों से जो मानव जीवन चक्र में आती हैं और चली जाती हैं, जी नहीं।

इतने विस्तृत रूप में समाज में विद्यमान् होने के बावजूद भी आज ऐसा क्या घटित हो गया कि हम यह सोचने को विवश हो गए कि आज के इस समय में प्रेम अपना महत्त्व खो रहा है, मूल्य खो रहा है। हमारे पास ऐसे कई तर्क उपलब्ध हैं जिससे मानव द्वारा इस बहुमूल्य प्रेम पर अपने व पराये की प्रवृत्ति का कवच चढ़ाने का प्रमाण स्पष्ट हो जाता है, यही आज हमारी चिन्ता का विषय है। वह व्यक्‍ति जो आज के आधुनिक युग में जीवनयापन कर रहा है, अपने आप को कठोर व सीमित करता जा रहा है। प्रेम भावना केवल उसके परिवार के सदस्यों तक ही सीमित हो कर रह गई है। आज से एक डेढ़ दशक पहले तक इस परिधि में न केवल पारिवारिक सदस्य शामिल होते थे अपितु कई ऐसे व्यक्‍तित्व भी व्यक्‍ति की प्रेम की सीमा में शामिल होते थे जिनका उस व्यक्‍ति विशेष से रक्त का संबंध नहीं होता था, यदि कोई अन्य व्यक्‍ति कठिनाई में होता था तो उसकी मदद की जाती थी। परन्तु आज तो रक्‍त ही सफ़ेद हो रहा है, आज मानव व्यवहार पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि उसने अपने आप को इतना सीमित कर लिया है कि वह अपनी जन्मदायिनी से भी ज़िंदगी भर प्रेम नहीं कर पाता। समय व्यतीत होते-होते यह प्रेम जन्मदायिनी से भी घटता जाता है तथा अन्य सदस्यों में वितरित होता जाता है। है न एक कटु सत्य। हम चाहे माने या न माने यही यथार्थ है, चाहे स्त्री हो या पुरुष आज सभी की यही स्थिति है, हम जो ऊपर मानव रूप का वर्णन कर रहे हैं वह स्त्री तथा पुरुष दोनों का मानकर कर रहे हैं क्योंकि आज स्त्री तथा पुरुष दोनों समान रूप से उक्त परिस्थितियों में से गुज़र रहे हैं।

किशोरों की स्थिति तो आज और भी दयनीय है, चिन्तनीय है, कारण स्पष्ट है, क्योंकि किशोर वर्ग ही एकमात्र ऐसा वर्ग होता है जो किसी भी समाज का आधार होता है। आज हमारे समाज में व्याप्‍त भौतिकवादिता व रूढ़िवादिता की भावना इतनी प्रबल हो चुकी है कि हम किशोर वर्ग के हृदय से प्रेम की भावना का हरण कर उनमें रूढ़िवादिता व भौतिकवादिता की रुचि कूट-कूट कर भरते हैं। क्यों बात गले नहीं उतरी ? सांच को क्या आंच, कर लो आसान सी जांच। बच्चा जब किशोर अवस्था में प्रवेश करता है तो उसका संबंध कई अन्य ऐसे व्यक्ति विशेष से बनता है परन्तु हमें वह पसंद नहीं आता। मानते हैं न। यह क्यों होता है कि बच्चा उन व्यक्‍तियों को पसंद करता है, उनसे संबंध बनाता है। हम बताते हैं, बच्चों का मन साफ व चंचल होता है, वह अपने स्वच्छ मन के आईने में कई मूर्तें स्थापित करता है परन्तु हम उसके द्वारा स्थापित इन मूर्तों पर अपने व पराये तथा ऊंच-नीच आदि रूढ़िवादी प्रवृत्तियों की परत चढ़ा देते हैं। किशोरावस्था तो वह कच्चा घड़ा है जिस रूप में ढालोगे उसी रूप में ढल जाएगा। स्वच्छ आईने में जो चित्र जिस रंग में आप भरेंगे वही आपको दिखाई देगा।

वास्तव में आज यदि इन्सान एक-दूसरे से अलग हो रहा है। वह अपने आप को सीमित रखता है तथा प्रेम भावना का हरण हो रहा है, तो इसके लिए हम ही ज़िम्मेवार हैं। किशोरावस्था में यदि कोई युवा किसी अन्य से संबंध बनाना चाहता है तो उसे अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है, कई कटाक्ष सहने पड़ते हैं और विशेषकर किसी युवा लड़के व युवा लड़की के मध्य संबंध तो कभी हो ही नहीं सकता, अभिभावकों को उस लड़के पर कभी विश्‍वास हो ही नहीं सकता, चाहे वह दूध का धुल कर क्यों न अपने आप को प्रस्तुत करे। यह हम ही हैं जो किशोर पौद्य को रूढ़िवादिता अवसरवादिता रूपी पानी से सींचते हैं तथा यही वृक्ष आगे बढ़ कर सूखे हुए फल देता है, अर्थात् वही अपने ही परिजनों से आंख चुराता है। किसी भी स्थिति में युवा वर्ग पर विश्‍वास न बना पाना ही इस परिस्थिति के लिए आधार बनता है, यहीं उसकी प्रेम भावना का हरण हो जाता है जो भविष्य में विभिन्न रूपों में पल्लिवत होनी थी। हम यह नहीं कहते कि युवा वर्ग को पूर्णत: स्वतंत्रता मिल जाये, परन्तु तर्क परन आधारित स्वतंत्रता कोई अपराध नहीं, बल्कि समय की आवश्यक्‍ता है।

क्या आप जानते हैं प्रेम के कई रूप होते हैं। प्रेम समय-समय पर मानव जीवन में अपनी विविध छटा बिखेरता है। जन्म के समय मां वात्सल्य प्रेम की अभिव्यक्ति‍ करती है, तदुपरांत प्रेम में मोह जागृत हो जाता है, मोह उस प्रेम को अपने नियंत्रण में करने का। इसी सनक में किशोर वर्ग प्रेम की तलाश करता है, न केवल अपने परिजनों में अपितु बाहरी व्यक्‍तित्व में भी। तदुपरांत भविष्य में प्रेम, पति-पत्नी प्रेम, संतान प्रेम और न जाने किन-किन रूपों में प्रेम मानस पटल पर अपनी अदभुत छटा बिखेरता है। आज प्रेम का जो रूप सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ है वह है, किशोर वर्ग का प्रेम। इस प्रेम रूप ने अपना ऐसा प्रेम पाश चलाया है कि युवा वर्ग तो युवा वर्ग, मध्य आयु वर्ग व वृद्ध आयु वर्ग भी स्वयं को इस पाश से मुक्त नहीं करना चाहता किन्तु खेद की बात है कि आज युवा वर्ग में जो प्रेम ठाठें मार रहा है, उसमें भी यौनाकर्षण ही है, इस यौनाकर्षण से कोई भी स्वयं को अलग नहीं कर पा रहा, परन्तु पंजाब व भारत की संस्कृति ने हमें यह भावना तो विरासत में नहीं दी। विदेशी रंगत में रंगे इस प्रेमजाल ने हमारी भारतीय संस्कृति पर अवैध कब्ज़ा करना शुरू कर दिया है। युवा वर्ग को पथभ्रष्ट करना शुरू कर दिया है, आज इसी प्रेम जाल ने ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है कि आज युवा वर्ग पर विश्‍वास लगभग समाप्‍त ही हो गया है। यदि युवा वर्ग पर विश्‍वास ही समाप्‍त हो गया तो क्या हमारा सामाजिक चक्र चल पाएगा। क्या हम उस विश्‍वासहीन समाज की कल्पना कर सकते हैं।

हीर-रांझा, शीरी-फरहाद, सस्सी-पुन्नू, लैला-मजनूं, मिर्ज़ा-साहिबां, सोहनी-महिवाल और न जाने कितनी ऐसी सच्चे इश्क की कहानियों व संस्कृति के आधार पर खड़े भारत को यह विदेशी प्रेम जाल कैसे रास आ गया। हम इतने अभद्र तो नहीं थे। एक और कड़वी बात कहें, उपरोक्त ‘सच्चे इश्क की दास्तान’ आज हमारी सांस्कृति धरोहर मानी जाती है। हम इन कहानियों को बड़े चाव से सुनते हैं, पसंद करते हैं परंतु एक कड़वा सवाल है, जिसे सुनकर सभी निरुत्तर हो जाते हैं, क्या आप अपने ही व्यक्ति विशेष में से एक अन्य हीर-रांझा अथवा सोहनी-महिवाल प्रकरण प्रवाण चढ़ने देंगे। प्रश्‍न सुनते ही भौंहें तन जाती हैं, कैसी बकवास है यह आदि-आदि।

सत्य तो यह है कि समाज उस समय भी इश्क के विरुद्ध था, आज भी विरुद्ध है, तथा सम्भव है कि भविष्य में भी विरुद्ध ही रहेगा। परन्तु क्या हम जाने अनजाने जब इन प्रेम प्रसंगों को सुनते हैं तो स्वयं को नायक अथवा नायिका के रूप में नहीं मानते ? यदि हम स्वयं को नायक अथवा नायिका के रूप में देखना चाहते हैं तो कोई अन्य क्यों नहीं। आवश्यकता है सत्यनिष्ठ उत्तर की। यदि हम स्वयं को नायक अथवा नायिका के रूप में स्थापित करना चाहते हैं तो यही शर्त दूसरों पर लागू क्यों नहीं होती। क्यों उस समय हमारा विश्‍वास डोल जाता है। पहली बात तो यह है कि आज कल वैसा सच्चा इश्क अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, प्रेम के इस दैव्य रूप की इस ख़स्ता हालत की किसी को परवाह नहीं। दूसरा यदि कोई यह दु:साहस कर भी ले तो समाज उन्हीं रूढ़िवादी चक्रव्यूह में फंस जाता है, कुछ प्रश्‍नों के उत्तर देने से प्रेम के इस दैव्य रूप की रक्षा की जा सकती है, उसे अंत से बचाया जा सकता है, शांत मन से इन प्रश्‍नों पर गौर करें…….।

क्या किसी का भला चाहना अपराध है?
क्या किसी के दु:ख-सुख में सहायक होना अपराध है?
क्या किसी को सच्चे मन से अपनाना अपराध है?

क्या इन सभी भावनाओं के लिए रक्‍त संबंध होना आवश्यक है। यह प्रश्‍न आज के उस तर्कशील समाज से है जो तर्कों का दम भरता है, क्या आपके उत्तर हां में हैं। जी नहीं, हम जानते हैं कि आप उत्तर न में देंगे, तो कब छोड़ेगा यह समाज प्रेम का विरोध करना। सच्चा प्रेम अपराध कैसे हो सकता है क्योंकि प्रेम इन्हीं तीन भावनाओं के सुमेल से अपने विभिन्न रूपों का निर्माण करता है। यही वो आधार है जिसके दम पर प्रेम ने सदियों से मानस पटल पर एक छत्र राज्य किया है। क्यों हम इस प्रेम को अपने जीवन से महरूम करने पर अमादा हैं, क्या हम नहीं चाहते कि हम आपस में मिल जुल कर प्रेम सहित रहें और ऐसे समाज का निर्माण करें जहां भ्रातृत्व, सहयोग व सामंजस्य की भावनायें प्रबल हों। वैर विरोध का नामो-निशान न हो, बस प्यार ही प्यार हो। आवश्यकता है अपनी निम्‍न स्तरीय मानसिकता में बदलाव की।

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