अधिकारों से वंचित आधी दुनियां

श्री गोपाल नारसन

जहां भी नारी का नाम सामने आता है, वहीं एक कोमल, कमज़ोर, लाचार अबला की तस्वीर सामने आ जाती है। कहने को हम 21 वीं सदी में पहुंच गए हैं, लेकिन आज भी नारी को दुनिया में आने से रोकने के लिए उसकी गर्भ में ही हत्या करने का घिनौना अपराध प्राय:शहर, कस्बे व गांव में हो रहा है। हालांकि शासन स्तर पर नारी जाति के संरक्षण के लिए भरपूर कोशिशें हो रही है, कानून तक बनाये जा रहे हैं।

किन्तु अन्धविश्वासों, रूढ़ियों और मात्र ‘पुत्र’ को ही बुढ़ापे का सहारा मानने वाले लोग नारी के जन्म को बोझ मानकर उसे गर्भ में ही समाप्त कर देने पर उतारू हैं। अब भला उन्हें कौन समझाए कि अगर नारी अर्थात मां, बेटी, बहन, वधू को यूं ही दुनिया में आने से रोका जाता रहा तो एक दिन ऐसा भी आएगा जब इस नारी जाति के अभाव में न बेटी होगी, न बहन, न मां और न ही वधू, शायद वही दिन दुनिया की गति को विराम देने का आख़िरी दिन होगा।

दुर्भाग्य तो इस बात का है कि जो नारी आज के दौर में पुरुष के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चल रही है। हर दु:ख-सुख, हानि-लाभ, प्रगति-अवनति, शिक्षा-दीक्षा तथा व्यापार-सेवाकार्यों में पुरुष के साथ बराबरी के दायित्व का निर्वहण कर रही है, उसे बोझ मानकर दुनिया में आने से रोका जा रहा है। लेकिन सच पूछिए तो आज की नारी पुरुष से भी कहीं आगे बढ़ती नज़र आ रही है। शिक्षा के क्षेत्र में पुरुष को पछाड़ते हुए अव्वल आ रही नारी ने एक अध्यापिका, एक चिकित्सक, एक नर्स, एक इंजीनियर, एक वैज्ञानिक, एक लेखक, एक धर्म संवाहक की ही ज़िम्मेदारी नहीं अपनाई, बल्कि राजनीतिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी आगे बढक़र नारी जाति रूपी आधी दुनिया ने पूरी दुनिया को मुट्ठी में भरने के लिए प्रगति की उड़ान भरी है।

जिस देश में आठ हज़ार गर्भपातों में से सात हज़ार नौ सौ निन्यानवे गर्भपात मादा भू्ण के किये जा रहे हों, जिस देश में एक मां की भी इच्छा लड़की के बजाए लड़का जनने की हो, जिस देश में 98 प्रतिशत महिलाएं पुरुष प्रधान समाज के सहारे टिकी हों, जिस देश में पुरुषों की तुलना में ज़्यादातर महिलाओं की मृत्यु जन्म से लेकर मात्र 29 वर्ष की आयु में हो जाती हो। उस देश को यदि मां जगत जननी का देश कहा जाए, मां दुर्गा की पूजा करने वाला देश कहा जाए, देवी को शक्ति का रूप मानने वाला देश कहा जाए या फिर नारी को समृद्धि की अधिष्ठाता मानने वाला देश कहा जाए तो क्या यह सि‍र्फ़‘दिखावा’ नहीं लगता ?

आज़ादी के आन्दोलन में अपनी बहादुरी, राष्ट्रभक्ति एवं बलिदान का इतिहास रचने वालों में जहां पुरुष अग्रणीय थे, वहीं नारी जाति ने भी बढ़-चढ़क़र भागीदारी निभाई थी और अपने प्राणों तक की आहुति दी थी। चाहे सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में नाना जी राव पेशवा के संकट की घड़ी में उनकी पुत्री वीरांगना मैनावती द्वारा दुश्मनों से लोहा लेते हुए प्राण स्वाहा कर देने का क़िस्सा हो या बंगाल की शेरनी कही जाने वाली 14 वर्षीया सुनीति चौधरी द्वारा अंग्रेज़ कलैक्टर को मारकर महान् क्रान्तिकारी होने का गौरव हासिल करने की सच्ची कहानी या फिर 21 वर्षीया महारानी लक्ष्मीबाई, उनकी सहयोगी झलकारी बाई, 1930 में अंग्रेज़ों की क्रूरता से तंग आकर ‘कुलपहाड़’ नामक थाने पर क़ब्जा करने वाली राजेन्द्र कुमारी, अंग्रेज़ों के क्लब पर बम वर्षा करके आन्दोलनकारियों को मुक्त कराने वाली प्रीतिलता सभी ने श्यामा बाई, अनुसूइया, प्रभा साठे, प्रमिला दंडवते, सिन्धू देशपांडे तथा शान्ता नायक की तरह देश के दुश्मनों के दांत खट्टे किये थे।

यानी हर क़दम पर अग्रणी रही नारी आज भी जब अपने जन्म लेने के अधिकार, भरण-पोषण व लाड़-प्यार में समानता के अधिकार, शिक्षा के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा के अधिकार तथा राजनीति में आरक्षण के अधिकार से वंचित रह जाती है तो 21वीं सदी का आना भी बेमायने लगने लगता है।

 

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