हरिवंश राय बच्चन

      -डॉ अंजना कुमारी

कल मुरझाने वाली कलियां
हंस कर कहती हैं मग्न रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से
संदेश सुनाती यौवन का
तुम देकर मदिरा के प्याले
मेरा मन बहला देती हो
उस पार मुझे बहलाने का
उपचार न जाने क्या होगा?
इस पार प्रिय मधु है तुम हो
उस पार न जाने क्या होगा?

अब उस पार पहुंच कवि बच्चन की यह पंक्‍ति यां बरबस ही हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं। मस्ती और अल्हड़पन से मधु के गीत गाने वाले कवि हरिवंश राय बच्चन का हिन्दी जगत् से सर्वप्रथम परिचय ‘उमर ख़ैयाम’ की रुबाइयों के अनुवाद से हुआ। गीतों को श्रुतिमधुर बनाकर संगीत भरे स्वरों में प्रस्तुत करने और गीतों की विविधता भरी संरचना करने में उनका विशिष्ट योगदान है।

हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 में प्रयाग में हुआ। प्रयाग विश्‍वविद्यालय से इन्होंने अंग्रेज़ी में एम.ए.किया। इंगलैंड में कैम्ब्रिज विश्‍वविद्यालय से पी.एच.डी.की डिग्री प्राप्‍त करने वाले यह पहले भारतीय थे। हिन्दी को भारतीय जन की आत्मा की भाषा मानते हुए डॉ.बच्चन ने इसी में साहित्य सृजन करने का निर्णय लिया। दस वर्ष तक डॉ.बच्चन ने विदेश मंत्रालय में हिन्दी विशेषज्ञ के पद पर काम किया। हिन्दी के इस आधुनिक गीतकार को राज्यसभा में छह वर्ष के लिए मनोनीत किया गया था।

हरिवंश राय बच्चन जी का गौरव कवि के रूप में उल्लेखनीय है। उनके अनेक काव्य संग्रह हैं जिनमें से प्रमुख हैं मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश, निशा-निमंत्रण, एकांत-संगीत, आकुल अंतर सतरंगिनी, बंगाल का काल, सूत की माला, खादी के फूल आदि।

बच्चन मूलत: आत्मानुभूति के कवि हैं इसलिए उनकी जिन रचनाओं में आत्मानुभूति की सघनता है वे अपने प्रभाव में तीव्र और मर्मस्पर्शी है। कवि कर्म के विषय में बच्चन का मानना है। “जैसे वादक अपनापन स्वरों में प्रकट करके यह चाहता है कि वे किसी के कानों में क्षणभर गूंजकर, विस्तृत गगन में क्षीण होकर विलीन हो जाए, चित्रकार अपना अपनापन रेखाओं में प्रकट करके यह इच्छा करता है कि वे किसी की आंखों में पलभर प्रतिबिंबित होकर धुंधले बनकर तिरोहित हो जाएं और कवि अपना अपनापन सजीव शब्द-पदों में व्यंजित करके चाहता है कि वे किसी के हृदय को शीघ्रता से छूकर संसार के सघन कोलाहल में छिप जाएं, खो जाएं।”

डॉ. बच्चन ने सरल लेकिन चुभते हुए शब्दों में अपनी कृति मधुशाला के माध्यम से साम्प्रदायिकता, जातिवाद और व्यवस्था के ख़िलाफ़ फटकार लगाई है। शराब को ‘जीवन’ की उपमा देकर डॉ. बच्चन ने अपनी कृति के माध्यम से एकजुटता की सीख दी कभी उन्होंने हिन्दू और मुसलमान के बीच बढ़ती कटुता पर व्यंग्य करते हुए लिखा है:-

मुसलमान और हिन्दू हैं दो, एक मगर उनका प्याला
एक मगर उनका मदिरालय, एक मगर उनकी हाला
दोनों रहते एक न, जब तक मंदिर-मस्जिद में जाते
मंदिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला

जातिवाद पर करारी चोट करते हुए उन्होंने लिखा :-

कभी नहीं सुन पड़ता, उसने हां छू दी मेरी हाला
कभी नहीं कोई कहता उसने जूठा कर डाला प्याला
सभी जाति के लोग बैठ कर साथ यहीं पर पीते हैं
सौ सुधारकों का करती है काम अकेली मधुशाला

बच्चन जी ने शराब और मयख़ाने के माध्यम से प्रेम, सौन्दर्य, दर्द, दु:ख, मृत्यु और जीवन की सभी झांकियों को शब्दों में पिरोकर जिस खूबसूरती से पेश किया उसका उदाहरण कहीं और नहीं मिलता।

बच्चन जी की मधुशाला, मधुबाला और मधुकलश रचनाएं हाला यानी शराब से संबंधित होने के कारण कुछ लोग उन्हें हालावादी भी कहने लगे थे। बच्चन जी ने हालावाद के संदर्भ में कहा है, ‘मेरा हृदय कहता है कि आज तुझे इसकी आवश्यकता है, ले इसे पानकर और इस मद के उन्माद में अपने को, अपने दु:खद समय को और काल के कठिन चक्र को भूल जा। ले इसे पी और मधु से अपना जीवन नवोल्लास, नूतन स्फूर्ति और नवल उमंगों से भर।’

बच्चन जी स्वच्छन्द प्रकृति के कवि रहे हैं। किसी वाद से वे स्वयं भी अपना संबंध स्वीकार नहीं करते थे। वे कहते थे, “मैंने वादों से प्रभाव ग्रहण नहीं किया है, ग्रहण किया है जीवनानुभूतियों से।”

उनके कथन के आलोक में यदि उनकी कृतियों को देखा-परखा जाए तो यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि बच्चन जी आत्मानुभूति के कवि हैं और उन्होंने अपनी अनुभूति के अनुसार सौंदर्य और प्रेम, सुख और दु:ख, नैराश्य और विद्रोह के स्वरों को मुखरित किया है।

डॉ.चौहान बच्चन काव्य का मूल्यांकन करते हुए कहते हैं, “बच्चन के गीतों ने हिन्दी-कविता का एक नया रूप संस्कार किया। भाषा सरल, मुहावरेदार और व्यक्‍तिगत वेदना की अनुभूति से मूर्त्त और भावसिक्‍त हो उठी है।”

डॉ.बच्चन ने अपने काव्यकाल में कई श्रेष्‍ठ रचनाएं लिखी जिनमें हिंदी कविता को नया आयाम देने वाली ‘मधुशाला‘ सबसे लोकप्रिय मानी जाती है।


अब जबकि उनका शरीर पंचतत्व में विलीन हो चुका है तब मधुशाला की निम्नलिखित पंक्तियां उनको प्रत्यक्ष हमारे सामने ला खड़ा कर देती है:-

“पितृ पक्ष में, पुत्र उठाना
अर्घ्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना
गंगा-सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिट्टी भीगे
तृप्‍ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण-अर्पण करना मुझको
पढ़-पढ़ करके मधुशाला”

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