कन्यादान उचित या अनुचित

    

गोपाल शर्मा फिरोज़पुरी

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जो लोग भूतकाल और वर्तमान में डूबे रहते हैं सम्भवत: भविष्य को खो देते हैं। समय की आवश्यकताओं के अन्तर्गत परिस्थितियों के अनुकूल मानव प्रगति के पथ पर अग्रसर होता है। पुरातत्व से नया अनुसंधान करना यश और कीर्ति को सूचित करता है-पुरानी परम्पराओं को जीवित रखना जहां आवश्यक है वहां उनमें शोध करना अनिवार्य है। अन्यथा रूढ़िवादित अन्धविश्‍वास और धर्मान्धता की जड़ें विकृत रूप धारण कर लेंगी। प्राचीन काल में मनु जी ने जिस समाज का वर्गीकरण किया था वह वक्‍़त की पुकार थी। आधुनिक संसार में उसका कोई मूल्य नहीं। बाल-विवाह, सती-प्रथा, पर्दा तथा दहेज़ अमर्याद हैं। इन कुकृत्यों की जितनी भी भर्त्‍सना की जाए कम है। सदियों से चली आ रही हमारी विवाह पद्धति जो संस्कृत के श्‍लोकों पर आधारित है जन-साधारण की भाषा नहीं हो सकती उसको पुन: लिखने की आवश्यकता है ताकि एक वर्ग के लोगों का आधिपत्य समाप्‍त हो जाए। कई शताब्दियों से हम कन्यादान करते आ रहे हैं जो आधुनिक लोकतन्त्र में कदापि न्यायोचित नहीं है। किसी भी विद्वान पंडित ने इसमें संशोधन करने का साहस नहीं किया। सभी प्रपंची समाज से भय खाते हैं। यह समस्या पंडितों और पुरोहितों को चुनौती है। कन्यादान करना दुष्कृत्य और अनैतिक है। तनिक गहराई से सोचिए कन्यादान की रस्म कितनी घिनौनी और घातक है उदाहरणत: आप मुझे कम्बल दान में दे देते हैं तो आपका उस पर हक़ नहीं रह जाता। मैं उसका कहीं अन्यत्र भी प्रयोग कर सकता हूं। यही कारण था कि सदियों से नारी पर वज्र प्रहार होता रहा, वह प्रताड़ित होती रही। यह धारणा बना कर कि बेटी पराया धन है आप समूची नारी जाति का अपमान कर रहे हैं। माना कि विवाह अनिवार्य समस्या है परन्तु कन्या दान कर देने से बेटी सारे अधिकारों से वंचित हो जाती है। उसका माता-पिता से कोई सरोकार नहीं रह जाता। उन पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आपकी ज़ुबान सदा के लिए बंद हो जाएगी। धर्मशास्त्र के पन्ने खोलकर देखिए, सत्यवादी हरिशचन्द्र ने स्वप्न में अपना राज्य मुनि विश्‍वामित्र को दान में संकल्प करके दिया था। उसे अपना वचन निभाने के लिए अपने राज्य का परित्याग करना पड़ा। अब कल्पना कीजिए कि कोई पुत्रहीन है तो कन्यादान के पश्‍चात् उसके पास क्या बचेगा ? क्या उसका हित सम्पादन हो सकेगा ? क्या पुत्र की लालसा में परिवार नियोजित रह सकेगा ? साधारणतया पुत्री को विदा करते समय धाराश्रु इस बात को इंगित करते हैं कि कोई अनर्थ हो गया है। महानुभावों पुत्री वह निधि है जिसको हम दान में नहीं दे सकते। यह बहुत बड़ा विस्फोट है इससे बचिए। आपने उसके लिए योग्य वर ढूंढना है न कि उसे ही संकल्प करके दे देना है। पिछले ज़माने में नारी को तलाक़ का हक़ नहीं था। माता-पिता उसके घर का दाना तक मुंह में नहीं डालते थे।

क्या कारण था ? स्पष्‍ट-सा उत्तर है ‘कन्यादान’ जो कि स्त्री जाति पर अतिक्रामक षड्यंत्र है। योग्यता के आधार पर उसे किसी क्षेत्र में प्रवेश की मनाही नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने तो यहां तक निर्णय दे दिया है कि कोई भी पुत्रहीन व्यक्‍ति विवाहित पुत्री से भी निर्वाह अनुसार मुआवज़ा ले सकता है यदि पुत्री स्वयं धन उपार्जन के योग्य हो। यह तभी सम्भव है यदि बेटी को दान में न दिया जाए। विवाह के उपरान्त जहां बेटा अपने बूढ़े मां-बाप का सहारा बनता है वहां लड़की को भी अधिकार होना चाहिए कि अपने वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करे। लड़की को किसी भी क़ीमत पर कोई वस्तु मायके से ससुराल को नहीं ले जानी चाहिए यदि युवा पीढ़ी यह संकल्प धारण कर ले तो यह चुनौती दहेज़ के लालचियों पर चपत का काम करेगी। विवाह पद्धति के लेखकों से अपील है कि कन्यादान संकल्प के स्थान पर कन्या विवाह संकल्प लिखें। कोई सज्जन कन्यादान करने का महात्मय कमाने की चेष्‍टा न करे अपितु वर-वधु का विवाह आधुनिक ढंग से सुयोजित करे।

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