विरासत और परंपरा से सजे ये लहंगे

परंपरा ने फ़ैशन बाज़ार की उन मान्यताओं को तोड़ दिया है जिनमें फ़ैशन डिज़ाइनरों ने ये दावे किए थे कि पश्चिम से जैसी हवा चलती है हिन्दुस्तान में वैसे ही ट्रेंड सेट हो जाते हैं। परंपरा की यह खनक किसी पश्चिमी देश से नहीं आ रही है बल्कि ग्रामीण अंचल की ख़ास पोशाक लहंगा आज फ़ैशन का पर्याय बन गया है।

आजकल फ़ैशन की दुनिया मुख्य रूप से पारम्परिक पोशाकों पर केन्द्रित होती जा रही है लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि इन परम्परावादी पोशाकों के साथ-साथ फ्‍़यूज़ॅन ने भी अपना जादू बिखेरा है। इसी तरह से फ़ैशन को ख़ास तौर पर विवाह जैसे अवसरों के लिए डिज़ाइनर्स वैस्टॅर्न लुक देने में लगे हुए हैं। इनमें आज लहंगा विवाह की शान और आन का प्रतीक बन गया है।

आज फ़ैशन की दुनिया में विरासत को स्थिर रखने की कोशिश की जा रही है। कुछेक डिज़ाइनरों की पोशाकों की विशेषता है चिकन कारीगरी। इसके लिए उन्होंने चिकन कला केन्द्र लखनऊ में जाकर उसकी अहमियत को समझा और फि‍र अपनी पोशाकों में उसका भरपूर इस्तेमाल किया। डिज़ाइनर मानते हैं कि बहुत ज़्यादा महंगी पोशाकें लेने वालों का दायरा बहुत ही सीमित होता है जितनी कम क़ीमत की पोशाक होती है उसकी मांग भी उतनी ही ज़्यादा बढ़ती है।

यह फ्‍़यूज़ॅन का ज़माना है। जहां तक रंगों की बात है तो आमतौर पर इन दिनों चटक रंग ही चल रहे हैं। लाल और मैरून रंग की ख़ासी मांग रहती है। कभी-कभी यह भी देखना पड़ता है कि पोशाक जिनके लिए तैयार की जा रही है उनकी काया व रंग कैसा है? ऐसे में ऑर्डर पर भी काम करना पड़ता है।

कई अच्छे डिज़ाइनरों की चिकन कारीगरी की पोशाकों में अवध की कला का लुक झलकता है।फि‍लहाल फ़ैशन में ऐसा लहंगा व साड़ी हैं जो भारतीय लुक भी देते हैं और पाश्‍चात्य रंग भी उनमें शामिल होता है।

एक मशहूर डिज़ाइनर कहती हैं कि परम्परा से ज़्यादा किसी चीज़ को महत्त्व नहीं देती हूं और यह महानगरीय या शहरी संस्कृति में नहीं पनपती है। उसका जन्म‍ तो गांव में ही होता है। थोड़ा-सा मॉडर्न लुक देकर उसे हम अपना प्रोडक्ट बना देते हैं लेकिन विरासत और परम्परा दो ऐसे अहम् बिंदु हैं जिन्हें हम कभी नहीं नकार सकते हैं। यही बिंदु स्वर लहरि‍यों की तरह अपना जादू जगाते हैं।

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