नए कानून और वृद्धों की स्थिति

 

-नरेन्द्र देवांगन

जीवन का उत्तरार्द्ध ही वृद्धावस्था है। वस्तुत: वर्तमान की भाग दौड़, आपाधापी, अर्थ प्रधानता व नवीन चिंतन तथा मान्यताओं के युग में जिन अनेक विकृतियों, विसंगतियों व प्रतिकूलताओं ने जन्म लिया है, उन्हीं में से एक है युवाओं द्वारा वृद्धों की उपेक्षा। वस्तुत: वृद्धावस्था तो वैसे भी अनेक शारीरिक व्याधियों, मानसिक तनावों और अन्योन्य व्यथाओं को लेकर आता है और अगर उस पर परिवार के सदस्य भी परिवार के वृद्धों को अपमानित करें, उनका ध्यान न रखें या उन्हें मानसिक संताप पहुंचाएं, तो स्वाभाविक है कि वृद्ध के लिए वृद्धावस्था अभिशाप बन जाती है।

संसद में संतान के दायित्व संबंधी ‘वृद्धजन सुश्रुषा संरक्षण एवं गुज़ारा विधेयक’ प्रस्तुत होने से यह उम्मीद जागी कि जीवन के अंतिम पड़ाव में अपनी ही संतानों द्वारा उपेक्षा का दंश झेलते बुज़ुर्गों को कुछ राहत अवश्य मिलेगी। यूं तो परिवार वालों द्वारा सयानों से किए जाने वाले दुर्व्‍यवहार की घटना अत्यंत शर्मनाक एवं निंदनीय है। घर से बेघर किए जाने, उन्हें निरंतर अपमानित किए जाने की पीड़ा वैसे तो कभी मिट नहीं सकती, परंतु अब अपने ही लाडलों द्वारा उपेक्षा का शिकार होने पर बुज़ुर्ग न केवल संतानों को अपनी संपत्ति से बेदख़ल कर सकेंगे, बल्कि यथोचित क्षतिपूर्ति व गुज़ारा भत्ता पाने का कानूनी अधिकार एवं संरक्षण भी पा सकेंगे। केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में स्वीकृत यह विधेयक राहत देने वाला है। प्रस्तावित विधेयक में वरिष्‍ठ नागरिकों और उपेक्षित बुज़ुर्ग दंपतियों को कम ख़र्चीली एवं सुलभ कानूनी सहायता देने का प्रावधान होगा। संसद के दोनों सदनों में इस दिशा में मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। उक्‍त विधेयक में पीड़ित वृद्धजनों के मामलों की सुनवाई की समय-सीमा 6 माह तय की गई है।

वस्तुत: वृद्धावस्था जीर्ण-शीर्ण काया का पर्याय है इसलिए इसे रोगों, शारीरिक व्याधियों और कष्‍टों का केंद्र माना जाता है। बुढ़ापा स्वयं एक बीमारी है। एक पोरी, हज़ार बीमारी आदि कहावतें इसी ओर संकेत करती हैं। वैसे भी वृद्ध की शारीरिक क्षमता चुक गई होती है इसलिए उसे उचित सहारे व देखभाल की आवश्यकता होती है। उपचार भी अपरिहार्य हो जाता है, पर वर्तमान की पीढ़ी परिवार के वृद्धों को बोझ मानती है। इसलिए उनकी उचित देखभाल के अपने दायित्व से मुकर जाती है। इसलिए वृद्धों को कष्‍टसाध्य जीवन बिताने के लिए विवश होना पड़ रहा है। वैसे बहुत बार परिजनों का स्वार्थ, परिजनों की स्वंय की समस्याएं या रुपए-पैसों का अभाव भी वृद्धों की उचित देखभाल पर नकारात्मक प्रभाव अंकित करता है। कारण चाहे कुछ भी हो पर वृद्धों को तो दु:खमय जीवन बिताने के लिए विवश होना ही पड़ता है।

भारत में सन् 2001 में 60 वर्ष से अधिक वरिष्‍ठ नागरिक उम्र के लोगों की संख्या 7 करोड़ 50 लाख थी। सन् 2026 तक एक सर्वेक्षण के अनुसार बढ़कर 11 करोड़ 20 लाख हो जाने की संभावना है। यह तीसरा पहर भी अपने आप में सेवा से निवृत्ति देने के बाद उनके भावी जीवन के लिए पेंशन जीवन निर्वाह भत्ता की व्यवस्था करता है। इसे इस अर्थ में लिया जाना चाहिए कि जिस क्षमतावान व्यक्‍ति की शक्‍ति एवं ऊर्जा से अनेक लाभ प्राप्‍त किए हैं, उन्हें मानवता स्वरूप जीविका हेतु आश्रय या सहारा दिया जाए। शासकीय सेवकों को तो यह लाभ मिलता है, परंतु सर्वसाधारण वृद्धों को यह सुविधा कहां प्राप्‍त है?

वृद्धों को आर्थिक तंगी की हालत से भी कष्‍टपूर्ण साक्षात्कार करना पड़ता है। यहां तक कि कभी-कभी तो उन्हें दो जन की रोटी और सिर छिपाने के लिए छत भी नसीब नहीं होती है और उनके परिजन उन्हें मारे-मारे फिरने और वृद्धाश्रमों में शरण लेने को विवश कर देते हैं। कहीं-कहीं तो वृद्धों से नौकरों जैसा कार्य भी लिया जाता है और उन्हें रूखा-सूखा या बचा-खुचा ही खाने को प्रदान किया जाता है। ऐसे वृद्धों की संख्या गिनी-चुनी ही होगी, जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर या संपन्न होंगे। हक़ीक़त तो यह भी है कि वृद्धों को मानसिक सहारे की आवश्यकता होती है। जीवन की इस संध्या में वे तन्हाई, उपेक्षा एवं निरर्थकता का अनुभव न करें। इस हेतु उन्हें यह एहसास कराने की आवश्यकता होती है कि वे अकेले, महत्वहीन और अनुपयोगी नहीं है। पर हक़ीक़त तो यह है कि वर्तमान पीढ़ी अपने आप में इतनी मस्त-व्यस्त है कि उसे वृद्धों की ओर ध्यान केन्द्रित करने की फुर्सत ही नहीं है। आज परिवार के वृद्धों से वार्तालाप करना, उनकी भावनाओं की कद्र करना, उनकी सुनना-कोई पसंद ही नहीं करता है। जब वे उन्मुक्‍त, स्वच्छंद, आधुनिक व प्रगतिशील युवाओं को दिशा-निर्देशित करते हैं, टोकते हैं तो प्रति उत्तर में उन्हें अवमानना, लताड़ और कटु शब्द भी सुनने पड़ते हैं। वस्तुत: वृद्धावस्था मानसिक व्यथा का पर्याय है। आज न तो कोई वृद्धों की कद्र करने वाला है और न ही उनके अनुभवों से सीखने का जज्‍़बा रखने वाला। अपने जीवन-साथी की मौत के उपरांत तो एकाकी वृद्ध और अधिक संबल चाहता है।

जिस प्रकार एक वृद्ध सदस्य परिवार के सदस्यों के बीच सांमजस्य स्थापित कर अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह करता है, परिवार के सभी लोगों का ख्‍़याल करता है। ठीक उसी प्रकार परिवार के लोग उस वृद्ध का ख्‍़याल क्यों नहीं रखते? परिवार के सदस्य दायित्व से दूर भागते हैं, वृद्ध उन्हें बोझ नज़र आते हैं। क्या यह परिवार के सदस्यों का दायित्व नहीं है कि वे वृद्धों से प्यार के बोल बोलें, उनको आदर दें, कार्यों में उनके हस्तक्षेप को स्वीकार करें, लेकिन ऐसा नहीं होता। घर के सदस्य वृद्धों के साथ आदेशात्मक रूप से पेश आते हैं और उन्हें एकांतवास में चुपचाप जीवन निर्वाह करने का निर्देश देते हैं। वृद्ध लोगों के साथ सहभागिता निभाने से घर के सदस्यों की आन, इज्‍़ज़त में कमी आ जाएगी वाली बात भी नहीं है। किन्तु इतना अवश्य है कि सदस्यों की ओर से सहभागिता की पहल होने पर वृद्धों के मन में परिवार के सदस्यों के प्रति श्रद्धा और आदर का भाव बढ़ जाता है।

बहुतेरे मामलों में पुत्र-पुत्रियां तब तक तो अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करते हैं जब तक कि वे अपने पास का धन, संपत्ति, ज़मीन-जायदाद उनके नाम नहीं कर देते। पर संपत्ति, धन का हस्तांतरण होते ही या वसीयत संपन्न होते ही पुत्र-पुत्रियां, माता-पिता के प्रति नज़र बदल देते हैं और फिर आरंभ हो जाता है वृद्धों की व्यथा, दु:खद अवस्था का समाप्‍त न होने वाला दौर। अधिकांश मामलों में तो वृद्धों पर अपने पक्ष में ज़मीन-जायदाद कर देने के लिए दबाव भी डाला जाता है और उन्हें प्रताड़ित भी किया जाता है। पराधीन होने के कारण वृद्ध अपने शौक़ भी पूरा कर पाने में असमर्थ होते हैं।

वृद्धावस्था में बुज़ुर्गों को आमतौर पर नेत्र संबंधी समस्याएं, हृदय, श्‍वसन, त्वचा एवं मूत्र संबंधी विकारों को झेलना पड़ता है। अध्ययनों में पाया है कि 60 से 70 वर्ष के वृद्धों में मानसिक अस्वस्थता 71.5 प्रतिशत होती है। बुज़ुर्ग माता-पिता, दादा-दादी की समुचित देखभाल को लेकर परिवार वालों को ज़िम्‍मेदार बनाए जाने की इस वकालत का भविष्य में सार्थक एवं राहत देने वाला परिणाम प्राप्‍त होने की उम्मीद है। परिवार वालों पर इस विधेयक के तहत यह कानूनी बाध्यता रहेगी कि वे इन बुज़ुर्गों की देखभाल करें। अगर वे अपनी इस ज़िम्मेदारी से पीछे हटते हैं तो उनके मामलों में कानून अपना स्वतंत्र निर्णय देगा। कोशिश तो यह होनी चाहिए कि अपने वरिष्‍ठ माता-पिता की ज़िम्मेदारी उनकी उत्तराधिकारी संतान सामाजिक दायित्वों के तहत निभाए। अगर उत्तराधिकारी बुज़ुर्गों की उपेक्षा करते हैं या उन्हें नियति के हवाले छोड़ देते हैं तो उनके ख़िलाफ़ कानून तहत कारवाई होगी। तब यह विधेयक कानून में तबदील हो जाएगा तो स्थानीय पुलिस थाने में सभी वरिष्‍ठ नागरिकों का रिकार्ड भी संगृहीत किया जाएगा ताकि इन बुज़ुर्गों को अधिकतम सुरक्षा मुहैया कराई जा सके। इसके अलावा इस विधेयक में इन बुज़ुर्गों के लिए पर्याप्‍त संख्या में ‘आश्रम केन्द्रों’ की स्थापना की जाएगी, जिसमें केन्द्र शासन एवं राज्य शासन का परामर्श लिया जाएगा।

 

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