आत्म विश्‍वास

जब व्यक्‍ति को चारों तरफ़ से दु:ख और विपत्तियों का सामना करना पड़े, सब तरफ़ से असफलता ही प्राप्‍ति हो, अपनों से सम्बंध टूट जाएं या व्यक्‍ति जीवन के अंधकारमय पथ पर अकेला ही रह जाये, सब तरफ़ से अंधकार भरे कुएं उसे निगलने को तैयार नज़र आने लगें, तो व्यक्‍ति क्या करे ? क्या वह फिर कुछ कर सकता है ? ज़िंदा रह सकता है ? क्या वह फिर से इन परिस्थितियों में सफलता की ओर अग्रसर हो सकता है ? अवश्य ही हो सकता है क्योंकि आत्म-विश्‍वास एक ऐसी ज्योति है जो दु:ख भरी परिस्थितियों के अंधकार में हमें उम्मीद की एक नई रोशनी दिखला सकती है। अगर व्यक्‍ति के पास सफलता प्राप्‍त करने के सभी साधन मौजूद हों, लेकिन उसमें आत्मविश्‍वास का अभाव हो तो वह कभी भी सफलता प्राप्‍त नहीं कर सकता है। इतिहास भी आत्मविश्‍वासी लोगों की सफलताओं से भरा पड़ा है और उनकी सफलतायें ही हमारा-मार्ग दर्शन कर सकती हैं। राईट बंधुओं ने जब आकाश में वायुयान उड़ाने की बात सोची तो लोगों ने उनकी बातों पर हंसना शुरू कर दिया था। लोग तरह-तरह की बातें करने लग पड़े थे। लेकिन वे लोगों की इन बातों तथा नकारात्मक व्यवहार की तरफ़ बिना ध्यान दिए हुए पूरे आत्मविश्‍वास के साथ वायुयान की तैयारी में जुटे रहे और अन्त में इसी आत्मविश्‍वास के ज़रिये सफलता ने उनके क़दम चूमे तथा लोगों ने भी दांतों तले उंगलियां दबा ली।

नि: संदेह हर परिस्थति में मनुष्य का उसका अपना साथी आत्मविश्‍वास ही होता है। स्वामी विवेकानंद के शब्दों में, “संसार का इतिहास है जिन्होंने अपने ऊपर विश्‍वास किया।” एमर्सन ने भी ठीक ही कहा है- मनुष्य के आत्म-विश्‍वास को किसी भी क्षेत्र में सफलता की कुंजी माना जाता है। इसके बिना मनुष्य समय के साथ क़दम मिलाकर चल नहीं सकता है, चाहे खेल मैदान हो या रण-भूमि हो, जिनके पास आत्मविश्‍वास रूपी शक्ति होगी, वही आख़िर में विजय प्राप्‍त करता है।

कार्ल मार्क्स जिसने अपने जीवन में दुर्दिनों के कारण ग़रीबी देखी, उसे कई स्थानों पर भटकना पड़ा। लेकिन अपनी संकल्प शक्ति और दृढ़ विचारों से ही दुनियां के करोड़ों लोगों को अपना विधाता आप बना गया। महान् कलाकार चार्ली चैपलिन जिन्हें अपने जीवन में आजीविका प्राप्‍त करने के लिए कई तरह के पापड़ बेलने पड़े थे, लेकिन आत्मविश्‍वास ही उनकी किस्मत को बदलने का साधन बना और उनका आत्मविश्‍वास ही उन्हें रंगमंच की दुनियां में एक महान् तथा सफल अदाकार बना गया।

न्याय और समानता के लिये अपने प्राणों की आहुति दे देने वाले अब्राहम लिंकन को तो अपने जीवन में असफलताओं का मुंह इतनी बार देखना पड़ा कि यदि उनके जीवन के सभी कार्यों का हिसाब लगाया जाये तो वे सौ में से निन्यानवे बार असफल हुए। जीवन में आख़िर एक बार उनकी महत्वाकांक्षा पूरी हुई जब वे राष्ट्रपति बने। इस अवसर में उन्होंने इतनी सफलता प्राप्‍त कर ली कि वे विश्‍व इतिहास में प्रसिद्ध हो गए। उनकी इतनी बड़ी सफलता को प्राप्‍त करने का श्रेय उनके आत्म-विश्‍वास को ही मिलता है।

आत्म-विश्‍वास मनुष्य को तुच्छता से महानता की ओर अग्रसर करता है। आत्म-विश्‍वास का अर्थ अपनी आत्मा पर विश्‍वास करना है। भारतीय दर्शन विज्ञान ने आत्मा को परमात्मा का ही एक हिस्सा माना है। इसलिए मनुष्य को भी सदैव परमात्मा का अभिन्न अंग बन कर रहते हुए अपने अंदर असीम शक्‍ति, गुणों तथा आत्म विश्‍वास का विकास करना चाहिए क्योंकि जिन व्यक्तियों के पास इनका अभाव होता है, वे अपने जीवन में सफलता का आनन्द कभी नहीं उठा सकते हैं।

संसार को वही व्यक्ति विजय कर सकता है, लोगों का वही व्यक्‍ति मार्ग दर्शन कर सकता है जो दृढ़ आत्म-विश्‍वासी हो। हमारा देश जिसे सोने की चिड़िया कह कर कभी पुकारा जाता था, अंग्रेज़ों ने अपने हितों की पूर्ति के लिये इसका इतना शोषण किया कि भारतीय समाज विशेषकर अर्थ-व्यवस्था चरमरा कर रह गई थी। लेकिन स्वतंत्रता प्राप्‍ति के बाद देश का जितना भी काया-कल्प हुआ है उसमें यहां के लोगों की नि:संदेह मेहनत के साथ-साथ आत्मविश्‍वास का भी योगदान रहा है।

साहस वह हुण्डी है जिसे किसी भी बाज़ार में भुनाया जा सकता है और उसके बदले में किसी भी दुकान में कुछ भी ख़रीदा जा सकता है। बहुत से लोगों के पास एक-सी परिस्थितियां होती हैं, एक से साधन, शिक्षा या शक्‍ति होती है। परन्तु इन में से कुछ एक ही जीवन में इच्छित सफलता प्राप्‍त करते हैं। क्योंकि उनके पास कुछ करने की धुन के अलावा आत्म-विश्‍वास का ख़ज़ाना भी भरा पड़ा होता है और जिनके पास इस ख़ज़ाने का अभाव होता है, वह प्राय:दु:खों से भरा, तिरस्कार तथा पराधीनता का जीवन ही व्यतीत करते हैं।

प्रकृति ने सभी लोगों को समान रूप में शरीर प्रदान किया है। सभी को दो आंखें, दो कान और सामान्य दिमाग प्रदान किया है। परन्तु जिन व्यक्तियों के पास आत्मविश्‍वास का अपार तेज़ होता है तथा जिन के मन में आत्मविश्‍वास होता है उनके समक्ष खूंखार जानवर भी गुलाम बन कर रह जाते हैं। आत्मविश्‍वास तो एक सकारात्मक धारणा का नाम है। एक शक्तिशाली, समर्थ व्यक्‍ति भी तब तक अपनी बुनियाद या अस्तित्त्व कायम रख सकता है जब तक इसके पास विश्‍वास होगा।

भारत वर्ष को सबसे पहले राष्ट्रीय स्तर पर संगठित करने वाले मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्‍त मौर्य ने एक दासी की कोख से जन्म लिया था। परन्तु चाणक्य जिन्हें ‘महान् राजनीतिज्ञ’ कहा गया है, उनकी सहायता तथा अपने विश्‍वास से ही दासी पुत्र ने भारत को एक सूत्र में पिरोया था। नि:संदेह आत्मविश्‍वास अपने आप में एक महान् संबल है। अगर किसी विद्वान में इसकी कमी पाई जाती है तो वह भी एक मूढ़ व्यक्ति की तरह ही कार्य करेगा। इसी प्रकार और भी न जाने कितने उदाहरण हैं जिन्होंने अपने दृढ़ संकल्प और आत्मविश्‍वास के बल पर संकटों के दौर पर विजय प्राप्‍त करके अपना नाम इतिहास के पन्नों पर सुनहरी अक्षरों में लिखवा लिया है। सफलता प्राप्‍त करने के लिए समय के साथ, विकट परिस्थितियों के साथ कड़ा संघर्ष करना पड़ता है, नहीं तो हम भी उन लोगों की पंक्ति में आ जाएंगे जिनमें आत्म-विश्‍वास की कमी होती है या आत्मविश्‍वास होता ही नहीं। यदि हम अपने आत्मविश्‍वास को जगाने में सफल हो जाते हैं तो हम भी संसार पर अपनी गहरी छाप छोड़ जाएंगे और जिन में आत्मविश्‍वास की कमी होती है, उन पर समय की धूल हमेशा गहरी ही गहरी होती जाएगी। इस प्रकार उनका अस्तित्त्व ही ख़त्म हो जाता है। सफलता प्राप्‍त करने का एक ही मंत्र है, ‘प्रतिकूलताओं से टकराना और अपने अंदर विश्‍वास की भावना का संचार करना।’

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