मानव जीवन में धर्म का महत्त्व


                                                                                                                                                                          -प्रेम प्रकाश शर्मा

सृष्‍टि-यो‍जना में किसी भी तत्व, पदार्थ, स्थिति, कृत्ति, भाव आदि के ठीक–ठीक मूल्यांकन कर सकने से पूर्व उसके मर्म को समझ लेना अनिवार्य होना चाहिए ।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह स्पष्‍ट है कि ‘धर्म’ क्या है, यह निश्चित किया जाए। कहा गया है ‘धारयति इति धर्म:।’ अर्थात् जो धारण करें, वही धर्म अनिवार्य है, इसके बिना अस्त‍ित्त्व ही संभव नहीं। यदि यह सत्य है तो मानव संज्ञा रखने वाले अस्तित्त्व जीव का भी कुछ निश्चित ‘गुण’ या स्वभाव अवश्य होना चाहिए जो उसे अन्य जीवों से विलक्षण बनाता हो।

शायद यह गु्ण अथवा स्वभाव मानव प्राणों में उसकी मेधा या प्रतिभा है जिसके प्रताप से मानव अन्य प्राणियों की तुलना में प्रस्तुत परिस्‍थियों के साथ विशेष सफलतापूर्वक जूझता रहा है और इस दिशा में निरन्तर अधिकाधिक कुशलता प्राप्त करता जा रहा है। आरंभ में मानव इस कुशलता का लाभ व्यक्तिगत रूप से लेते-लेते लाभान्वित होने वाले समुदाय का विस्तार करता आया है। इसे ही मानव का विकास क्रम कहा जा सकता है। यही ‘मानवता’ का विशष्टि लक्षण है। मानवता को ही मानव का ‘धर्म’ समझना उचित होगा। मानव समुदाय ने जब-जब ‘मानवता’ लक्षण को उज्जवल बनाने की दिशा में प्रगति की है, तब-तब सुख, शांति, समृद्वि में वृद्वि हुई है। इसके विपरीत जब इस लक्षण का हृास हुआ, मानव समुदाय दु:खी, अशांत और दरिद्र होता रहा है।

मनुष्य अथवा मानव के ‘गुण’ या ‘स्वभाव’ उपर्युक्त ’मेधा’ अथवा ‘प्रतिभा’ को विकिरणशील पदार्थ की विकिरण प्रक्रिया के सदृश समझ सकते हैं। इस मेधा अथवा प्रतिभा की स्‍फुरण क्रिया मनुष्य की मनस्विता होनी चाहिए जिसका परिणाम अवधारणाओं के रूपायित होने में फलित होता है। इसी में ‘अहं’ का बीज देखा जा सकता है। यह अहं, मन की परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया अन्यान्‍य पदार्थों के संसर्ग में, दृष्टिगोचर संसार है। मनुष्य जब तक संसार में घटित होने वाली असंख्य क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं के साथ समरस, सामंजस्यपूर्ण संतुलित रूप से अपनी मेधा अथवा प्रतिभा से काम लेता है, विकट संघर्ष की स्थिति से बचा रहता है। ज्यूं ही उसका यह सामंजस्य या सन्तुलन गड़बड़ाने लगता है, व्यक्त‍िगत रूप के साथ-साथ सामुदायिक रूप से भी मानव संघर्ष का सामना करने को बाध्य हो जाता है।

विभिन्न देशों एवं कालों में ज्वलन्त मेधा और प्रतिभा के स्वामी मनीषियों ने सृष्टि के ‘ॠत’ अर्थात सत्य को भली प्रकार जाना और पहचाना। उन्होंने जीवन को सुखी, शांत और समृद्ध बनाने वाले गुणों, स्वभावों का निरूपण किया। अपने देश और काल में समझी जा सकने वाली भाषा में ऐसे निरूपण की ही कालान्तर में ‘धर्म’ संज्ञा हुई। उस निरूपण को जिस-जिस सीमा तक जितना-जितना मानव समुदाय समझकर अपने जीवन को ढाल पाया उस-उस सीमा तक वे समुदाय धार्मिक कहलाने के अधिकारी होकर सुखी शांत और समृद्ध हो पाए। देश और काल की विभिन्नताओं के रहते भी पथ प्रदर्शकों द्वारा नि‍रूपित ‘ॠत’ अथवा ‘सत्य’ में लगभग समानता पाई जाती है। समय बीतने पर स्वा‍र्थी और धूर्त तत्वों ने पथ प्रदशर्कों द्वारा प्रदर्शित सत्य मार्गों पर उनके नामों के झण्डे गाड़ कर अपना-अपना साम्राज्य स्थापित करना आरंभ कर दिया और वे जन सामान्य का शोषण करने में धर्मों की ठेकेदारी का उपयोग करने लगे। ‘धर्म’ का वास्तविक स्वरूप तो सर्वथा निरपेक्ष है। इस में ‘पक्ष’ विपक्ष के लिए मूलत: कोई स्थान नहीं हो सकता। ठेकेदारों ने ‘धर्म’ को न रहने देकर सम्प्रदायों में छिन्न-भिन्न कर डाला इसी से ‘धर्म’ की ग्लानि होने लगी।

विभिन्न देशों और कालों में पथ-प्रदशकों ने मानव जीवन के लिए जिन गुण-स्वभावों का निर्देशन किया है उन सभी का सार तत्व शील-सदाचार ही दिखाई देता है। समाज में जब शील-सदाचार का लोप होने लगता है, समाज की अधोगति आरम्भ हो जाती है। शील और सदाचार रूपी ॠत के बिना मानव जीवन वरदान न रहकर अभिशाप बन जाता है यही है मानव जीवन में धर्म का महत्त्व।

 

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