संयुक्‍त परिवार का टूटता तिलिस्म

 

-पवन चौहान

नैतिकता की पहली पाठशाला परिवार को माना जाता है। लेकिन परिवारों के बिखराब के साथ ही नैतिकता, सामाजिक नियमों व कानूनों, रहन-सहन में भी बहुत बदलाव आ चुका है। यदि वर्तमान संदर्भ में देखा जाए तो संयुक्त परिवारों का अस्तित्त्व धुंधला-सा हो गया है। संयुक्त परिवारों के मज़बूत स्तंभों के ढहते ही समाज का सारा ढांचा गड़बड़ा गया है। कई परंपराओं व रीति-रिवाज़ों ने दम तोड़ डाला है। इससे हमारी संस्कृति को करारा आघात पहुंचा है। संयुक्त परिवारों में बिखराब आने से पाश्चात्य संस्कृति को भारतीय संस्कृति में प्रवेश करने का एक सुनहरा अवसर मिला है।

परिवार समाज का निर्माण करता है। मज़बूत राष्ट्र या समाज की परिकल्पना तभी की जा सकती है यदि परिवार सुसंगठित हो। संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों के ऊपर परिवार का चैक रहता है। घर का बुज़ुर्ग मुखिया की भूमिका अदा करता है। उसकी बात मानना हर सदस्य का फ़र्ज़ बनता है। सुख-दुख की घड़ी में पूरा परिवार एक साथ बैठकर जब कोई निर्णय देता है तो वह निर्णय कई विचारों के मिश्रण से तैयार एक सही निर्णय माना जा सकता है। या यूं कहा जाए तो ग़लत न होगा कि संयुक्त परिवार एक अनुशासनात्मक प्रक्रिया है जिसका पूरा परिवार मिल-जुल कर पालन करता है। एकता की पहली सीख भी तो हमें संयुक्त परिवार ही देता है। व्यक्ति के अच्छे संस्कार परिवार में ही पनपते हैं और यदि वह परिवार संयुक्त हो तो उनमें निखार की गुंजाइश बहुत ज़्यादा होती है। वह परिवार के हर सदस्य से अनुभव ग्रहण कर अपने आप को और सुदृढ़, सुसंस्कृत सक्षम और आत्मनिर्भर बनाने की प्रेरणा पाता है। संयुक्त परिवार में जटिल से जटिल कार्य भी बंटकर सरल हो जाता है।

लेकिन विडम्बना यह है कि संयुक्त परिवारों का अस्तित्त्व धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। आज की पीढ़ी की अकेले और स्वच्छंद रहने की इच्छाशक्ति व आधुनिक लाइफ़ स्टाइल की मनोवृत्ति ही संयुक्त परिवार के टूटने का प्रमुख कारण है। परिवार से अलग रहने का सीधा-सा अर्थ है अपना स्वार्थ सिद्ध करना। आज की युवा पीढ़ी मां-बाप, बुज़ुर्गों के सामने ही नशा कर लेने में कोई शर्म महसूस नहीं करती। उनमें बुज़ुर्गों के प्रति आदर, सम्मान, सुसभ्य व्यवहार व अच्छे संस्कारों की कमी खलती है। परिवार से टूट कर बंटने से प्रेमभाव में कमी हो गई है। यही कारण है कि इंच-इंच ज़मीन के लिए भाई-भाई का दुश्मन बना हुआ है। सभी अपनी सुविधानुसार जीवन शैली ढालते जा रहे हैं जिसमें पाश्चात्य रंग साफ़ घुला हुआ नज़र आता है। परिवार के टूटते ही व्यक्ति इतना व्यस्त हो जाता है कि घर के बुज़ुर्गों तक के पास दो घड़ी बैठकर प्यार से बातें करने व उनका हाल-चाल पूछने का समय तक नहीं निकाल पाता यदि देखा जाए तो संयुक्त परिवारों के टूटने से सबसे ज़्यादा आहत बुज़ुर्ग ही हुए हैं। उन्हें बेकार-सी वस्तु जानकर एक अलग से कोने में बिठा दिया जाता है। जन्मदाताओं के साथ यह सलूक फलदायी सिद्ध नहीं हो सकता है। बुज़ुर्गों के अनुभवों को साथ लिए बग़ैर समाज ज़्यादा देर तक उन्नति के पथ पर टिक कर नहीं रह सकता है।

संयुक्त परिवार के टूटने से यदि किसी को ज़रा-सा फ़ायदा हुआ है तो वह है महिला। संयुक्त परिवार में महिलाएं स्वयं को पुरुष प्रधानता की मानसिकता में दबा हुआ महसूस करती थी। उसके बहुत से अधिकार घर के सदस्यों की मर्ज़ी के अधीन थे। लेकिन ऐसे परिवार जहां महिलाओं के अधिकारों का हनन हुआ है, उनके टूटने से महिलाओं को ज़रूर राहत मिली है। आज वह स्वतंत्र हैं। आत्मनिर्भर हैं। अब उसे छोटी-छोटी ज़रूरतों के लिए परिवार के किसी अन्य सदस्य के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता है। इस सबके पीछे यदि प्रमुखता से शिक्षा का हाथ माना जाए तो कतई ग़लत न होगा लेकिन नारी की स्वतंत्रता इस क़दर बढ़ गई है कि वह फ़ैशन और ग्लैमर के रंग में रंगी अर्धनग्न मूर्त बन चुकी है। हमारी सभ्यता व संस्कृति में यह सब तो न था। फिर यह सब क्यों ? क्या इस तरह के चोंचलों से वह खुद को विकसित व उन्नत साबित करना चाहती है ? यदि वे यह सब मानती हैं तो यह उनका भ्रम है। क्योंकि विचारों की उन्नति ही मानव की उन्नति कहलाती है।

यदि हम दूसरे पहलू की ओर नज़र डालें तो औरत संयुक्त परिवार को टूटने से बचाने में अहम भूमिका अदा कर सकती है। क्योंकि अक्सर देखा गया है कि परिवार के विघटन का प्रमुख कारण महिलाओं का आपसी द्वेष व लड़ाई-झगड़ा भी बन जाता है। यदि औरत परिवार को तोड़ने के बजाय जोड़ने के उपाय सोचें तो काफ़ी हद तक परिवारों को टूटने से बचाया जा सकता है। लेकिन यह कार्य मात्र एक औरत का न होकर सभी सदस्यों का सामूहिक प्रयास होना चाहिए। इससे घर का मान-सम्मान और प्रतिष्ठा बरकरार रहती है।

आज हमें एक अच्छे सुसभ्य, सुसंस्कृत समाज की आवश्यकता है। यह तभी संभव है यदि समाज की नींव अर्थात् परिवार-सुसंगठित हो। इसके लिए संयुक्त परिवारों के बिखराव को रोकने की ख़ास ज़रूरत है। एक अच्छे व सुसभ्य समाज व राष्ट्र के निर्माण के लिए आइए इस बिखरती नींव के पत्थरों को फिर से जोड़ने का प्रयास करें।

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