अपनों ने जिन को लूटा

 

-मंजुला दिनेश

दुनिया कहां की कहां पहुंच गई। हम अपने आप को अति आधुनिक समझने लगे हैं। जहां एक तरफ़ हम स्वतंत्र सुरक्षित समाज का निर्माण कर रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ अभी भी आमतौर पर महिलाएं अपनी आबरू के कभी भी लुट जाने के भय से सदैव असुरक्षित महसूस करती दिखाई देती हैं।

भले ही आज महिलाओं ने हर क्षेत्र में आगे बढ़ने की ठान ली है और उसने हर क्षेत्र में सफलता के झंडे भी गाढ़ दिए हैं फिर भी काफ़ी निडर क़िस्‍म की महिलाएं भी कहीं न कहीं, कभी न कभी अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं। नारी अपनी इज्‍़ज़त की रक्षा के लिए सदैव सचेत रहती है जैसे ही वह जवानी में क़दम रखती है और उसे इस बारे में समझ आने लगती है वह इसके प्रति काफ़ी सतर्क हो जाती है। अपनी इज्‍़ज़त की रक्षा के लिए ही वह पिता, भाई, पति एवं पुत्र रूपी पुरुष वर्ग का संरक्षण चाहती है।

इतना होने पर भी रोज़ ही एक नया हादसा सुनने को मिलता है। रोज़ ही हम अख़बारों में पढ़ते हैं कि फलां औरत बलात्कार का शिकार हो गई फलां औरत के साथ वहां हादसा हुआ, फलां औरत के साथ यहां हादसा हुआ। हम इसे एक रूटीन की तरह पढ़कर रख देते हैं, शायद ही कभी किसी ने थोड़ी देर बैठ कर उस औरत के दु:ख को महसूस करने की कोशिश की हो। कितना मुश्किल होता होगा इसके बाद ज़िंदा रहना और जीते रहना। इस न भूलने वाले हादसे को शायद कुछ अपनों ने भुलाने में मदद की हो। न भूल पाने की हालत में भी अपनों के स्नेह ने कम से कम कुछ तो मरहम का काम किया ही होगा।

लेकिन उनके दु:खों का तो कोई अंदाज़ा लगाए जिनको उनके अपनों ने ही लूटा। घर से बाहर क़दम रखते ही नारी सतर्क हो जाती है तथा थोड़ी-सी आहट भी उसे रक्षात्मक क़दम उठाने को कहती है। जब वह घर वापिस लौटती है तो पिता, भाई, पति, पुत्र या ससुर के संरक्षण में निश्‍चिंत हो जाती है। उसे इस बात का आश्‍वासन होता है कि यहां हर कोई रिश्तों की मर्यादा में रहेगा परन्तु जब घर में ही राक्षस पैदा हो जाएं, जब वे ही उसकी इज्‍़ज़त के साथ खिलवाड़ कर जाएं तो उसके लिए रिश्तों के मायने ही ख़त्म हो जाते हैं। अब तो उसका सभी पुरुषों को एक ही नज़र से देखना और पुरुष वर्ग से कतराना स्वाभाविक ही है। इस हालात में उसके सारे विश्‍वास डगमगाते हैं और हर तरफ़ अंधेरी राहें ही नज़र आती हैं और इन अंधेरों से उबर पाना बहुत मुश्किल होता है।

लड़कियां शर्मीली प्रवत्ति की होने के कारण जब युवावस्था में क़दम रखती हैं तो शारीरिक भिन्नता के कारण अपने उन्नत अंगों को काफ़ी परहेज़ से रखती हैं। लेकिन घर में रहते हुए हर समय पूरी तरह संभल कर रह पाना संभव नहीं होता और घर के पुरुषों पर विश्‍वास होने के कारण इसकी आवश्यकता भी महसूस नहीं होती। लेकिन घर के ही पुरुष वर्ग का कोई सदस्य कब उसके यौवन पर मुग्ध हो जाए, उसके अंदर का जानवर कब जाग जाए और अपनी मर्यादा का उल्लंघन कर दे इसकी किसे ख़बर होती है। ऐसी घटनाएं एक दो के साथ नहीं होती। आए दिन हम ऐसे समाचार पढ़ते रहते हैं। ऐसी अनेक महिलाएं हैं जो अपनों द्वारा ही लूट ली गई हैं। भाई, देवर, बहनोई, चाचा, ससुर यहां तक कि पिता द्वारा बेआबरू की गई नारियों की कमी नहीं है। शिक्षकों, डॉकटरों द्वारा छात्राओं का यौन शोषण करने की कहानियां भी कई बार सुनने को मिलती हैं। यहां तक कि धार्मिक प्रवृत्ति दिखाने वाले लोग भी धर्म की आड़ में यौन शोषण करते पकड़े गए हैं।

ये सब सुनने-पढ़ने के बाद महिलाओं में असुरक्षा की भावना पनपना स्वाभाविक है। आए दिन अख़बारों में ऐसी घटनाएं पढ़ने को मिलती हैं। एक समाचार के मुताबिक़ एक विधुर पिता ने लगभग दस वर्षों तक अपनी तृप्‍ति के लिए अपनी सगी बेटी को भोगा और उसकी शादी तय होने पर उसका जम कर विरोध किया। एक बहुत ही शरीफ़ जानी जाने वाली अपाहिज लड़की के गर्भवती होने पर सभी बहुत हैरान थे। उसे धमकाने पर पता चला कि वो अपने भाई की वासना का शिकार होती रही है। अपाहिज, कलंकित लड़की के मर जाने के इच्छुक थे उसके घरवाले। ऐसी लड़की घर में रहने से दिल का कलेश ही उत्पन्न होने वाला था और मात्र एक लड़के को तो वे खोना नहीं चाहते थे। उस लड़की का दु:खों से भरा अंधेरा कुंआ जिस में वो गिरा दी गई थी अभी और कितना गहरा था किसी को नहीं मालूम।

दो बच्चों की मां, खुशहाल ज़िंदगी जी रही एक औरत का जीवन उस समय नरक में बदल गया जब उसके देवर की गंदी निगाह उस पर पड़ी और उसने उसे अपनी हवस का शिकार बना लिया। और ससुराल वाले इसलिए उसे घर में नहीं रहने देना चाहते थे कि दोनों भाइयों में तनाव न बने।

पहले अपनों ने ही लूटा और फिर बाक़ी अपनों ने ही नश्तर चुभोने का काम कर डाला। इस प्रकार बचती ज़िंदगी में मुश्किलें कम करने का प्रयत्‍न करने की बजाए जीना ही दूभर कर दिया। ऐसे हालातों का किसने कब तक मुक़ाबला किया होगा, कौन जाने ? उनके दु:खों के बारे में सोच पाना तो शायद किसी के वश में नहीं होगा। ऐेसे हादसों का अन्त होना तो संभव नहीं है लेकिन ज़िंदगी संघर्ष की तरफ़ न मुड़ने पाए इसलिए हमें कुछ बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए। आंकड़े बताते हैं कि जान-पहचान वालों, संबंधियों आदि द्वारा शिकार बनने वाली औरतों की संख्या काफ़ी ज्‍़यादा है। इसलिए कुछ बातों की सतर्कता आवश्यक है।

युवावस्था प्राप्त होते ही युवतियों को जहां अपने पहनावे पर ध्यान देना चाहिए वहीं घर के पुरुष सदस्यों के व्यवहार की कुछ बातों की ओर ध्यान देना भी आवश्यक है। आधुनिक बनने की होड़ में बहुत तंग कपड़े या खुले गले के कपड़े नहीं पहनने चाहिए। घर में आराम के मूड़ में होते हैं इसलिए लेटते सोते वक़्त आपकी आधुनिकता आपको और भी भद्दा बना देगी इसलिए दूसरों से मर्यादा की उम्मीद रखने की बजाए खुद अपनी शालीनता बनाते हुए अपने कपड़ों का विशेष ध्यान रखें।

अतिथि पुरुष या ट्यूटर से अधिक बातें करने से परहेज़ करें और उनके सामने अपने कपड़ों का विशेष ध्यान रखें। उनकी किसी भी बेहूदगी का प्रतिकार अवश्य करें। कोई भी विश्‍वसनीय व्यक्‍ति, वो चाहे आपका कोई सगा ही क्यूं न हो आपके साथ बेहूदा हरकत करता नज़र आए तो आप को इसके लिए सतर्क हो जाना चाहिए। यदि वो कभी आपके विशेष अंगों को छूने का प्रयत्न करे तो आपको समझ जाना चाहिए कि ये ग़लत संकेत है। शुरू में वो ऐसा करते वक्‍़त ये ज़ाहिर नहीं करेगा कि वो जानबूझ कर ऐसा कर रहा है लेकिन आपको पहली बार में ही सतर्क हो जाना चाहिए और आइंदा भी ऐसा कुछ होने की सूरत में आप को किसी बड़ी महिला को विश्‍वास में लेते हुए रक्षात्मक क़दम उठा लेने चाहिए।

हालांकि अपने ही घर में रहते हुए अपनों पर ही अविश्‍वास करना और अपनों से ही सतर्क रहना संभव नहीं लगता लेकिन जितनी आवश्यकता हो सतर्कता बरतनी चाहिए ताकि कम से कम हम खुद तो ऐसे हादसों को बुलावा न दें।

फिर भी यह कह पाना मुश्किल है कि कब किस पर ऐसी विपत्ति आन पड़े और कब कौन ऐसे हादसे का शिकार हो जाए।

अभी ऐसी कहानियों का अन्त हो पाना तो संभव नहीं दिखता लेकिन कम से कम ऐसी घटनाओं की शिकार औरतों की मनोदशा को ठीक करने का कार्य तो हम ज़रूर कर सकते हैं। उनमें ज़िंदगी जीने की चाह पैदा हो सकती है यदि हमारा व्यवहार सामान्य हो। यह हमारा कर्त्तव्‍य है कि उनको सामान्य ज़िंदगी जीने के लिए प्रेरित करें।

ज़िंदगी में घटी एकाध ऐसी घटना की छाया को अपने दिलो-दिमाग़ से निकालने का प्रयत्‍न उनको खुद भी करना होगा। उन्हें हमेशा याद रखना चाहिए कि इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं इसलिए किसी भी प्रकार के पाप की भावना उनके दिल में नहीं होनी चाहिए। किसी घटिया व्यक्‍ति की ग़लती की सज़ा वो खुद क्यूं भुगतें। उन्हें इस सब से अपने आप को उबारने का पूरा प्रयत्‍न करना चाहिए।

अगर हो सके तो ऐसे व्यक्‍ति से दूर रह कर अपनी ज़िंदगी को सामान्य बनाने का प्रयत्‍न करें। ऐसे में बाकी सभी का भी फ़र्ज़ है कि उसे भरपूर समर्थन दें और किसी और की ग़लती की सज़ा उन्हें न दें।

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