महिला की असली स्वतंत्रता ‘महिलापन’ में है

-विभा प्रकाश श्रीवास्तव

प्रात: स्मरणीय अहिल्याबाई का मूल वाक्य था, ‘मैं अपने प्रत्येक कार्य के लिए ज़िम्मेदार हूं।’ इसी प्रकार महिला की तथाकथित ग़ुलामी, बेबसी, परतंत्रता, दोयम दर्जा इन सबके लिए कहीं न कहीं महिला स्‍वयं भी ज़िम्मेदार है, क्योंकि पारंपरिक रूप से उसे कोमलांगी, सुकुमारी, घर की रानी आदि कहा गया और उसने बड़े प्रसन्न होकर इन क़ैद करने वाले विशेषणों को अपनाया, जैसे ये शब्द बड़े आकर्षक अलंकरण हों। अलंकरण का यही मोहपाश अस्तित्त्व, अस्मिता की मृत्यु का जनक बना। यदि शुरू से ही नारी अपनी शक्‍ति को उजागर करती या अस्तित्त्व का स्थापन करती तो शायद स्थिति कुछ और होती। द्रौपदी के विभाजन का कारण भी उसकी चुप्पी या मौन रहना था। जैसी मुखरता उसने चीरहरण के समय प्रदर्शित की यदि वैसी ही ‘समान विभाजन’ पर करती तब महाभारत का परिदृश्य भिन्न होता।

घर जो दुनिया का कोमलतम आश्रम स्थल है नारी के लिए असहनीय पीड़ा केन्द्र बन जाता है, घर नहीं ‘चरित्रशाला’ बन जाता है, जिसमें रहते हुए नारी को क्षण-प्रतिक्षण अपने चरित्रवान होने का प्रमाण जुटाना पड़ता है। इस प्रमाणपत्र की सारी लिखावट, भाषा एवं हस्ताक्षर पुरुष के होते हैं। नारी की ‘चरित्रशीलता’ पुरुषों की मोहताज हो गई। मानो स्त्री का चरित्र न हुआ, कांच का बर्तन हो, ज़रा-सी चिरकन हुई और टूट गया। नारी की सारी पवित्रता उसके शरीर में केन्द्रित हो गई। इसी कारण जय-पराजय के दौर में नारियों को यौन दासता के लिए बाध्य किया गया। दूसरे महायुद्ध के दौरान दासता से पीड़ित महिलाओं के प्रश्‍न आज तक अग्निशलाका की भांति दहके हुए हैं। शरीर की पवित्रता बनाए रखने की शिक्षा कन्या को जन्म-घूंटी के साथ पिलाई जाती है। वह बार-बार संस्कारित की जाती है, जैसे शरीर न हुआ मिट्टी का लोंदा हुआ, छूते ही बिखर गया, फैल गया। इसी तथाकथित पवित्रता के शगूफे ने नारी की स्वतंत्रता को परतंत्रता में बदल दिया। यही आधार उसे देवदासी से ‘काॅल गर्ल’ तक ले आया । नगरवधू या कॉलगर्ल बनना पुरुष के हित में रहा। पुरुषों की स्वार्थसिद्धि में सहायक बना। औसत नारी के मन में बैठा हुआ बलात्कृत होने का भय उसे दासता के लिए बाध्य करता रहा। पुरुष प्रधान समाज की दोहरी व्यवस्था तारीफ़ के क़ाबिल है, जिसमें बलात्कारी मौज उड़ाता है और शिकार महिला आत्महत्या या घिनौनी, तिरस्कृत, बहिष्कृत ज़िंदगी जीने के लिए बाध्य होती है। बलात्कार जुर्म है, अन्य संदर्भों में जुर्म करने वाला लोक निगाहों में गिरता है तथा जिसके प्रति जुर्म हुआ हो, उसके प्रति जनसहानुभूति होती है। परंतु बलात्कार या महिला के संदर्भ में स्थिति अत्यंत दु:खद है। बलात्कार हो तो वह दोषी, पुत्री को जन्‍म देने पर भी वही दोषी। जिस महिला के प्रति अन्याय हुआ है उसे लोक सहानुभूति तो कम मिलती है, हां उल्टे-सीधे प्रहार उसकी नियति बन जाते हैं।

बहुत कम महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें अपने औरत होने पर गर्व है। कितनी महिलाएं अमृता प्रीतम के समान अगले जन्म में औरत के रूप में पुन: जन्म लेना चाहती हैं ? शायद औरत अपने ही ‘पन’ को नकारना चाह रही है। (तभी तो पुरुषवत या उसके समान बनना चाह रही है) इसका कारण है पुरुष को अपने से श्रेष्‍ठ समझना और इस श्रेष्‍ठता की स्वीकारोक्‍ति के बदले मिली तमाम बंदिशें, वर्जनाएं और ग़ुलामी सहना। शायद यही वजह है कि नारी एक ‘नारी शिशु’ की मां बनने से बचती है क्योंकि वह अपने जैसी यंत्रणा, पीड़ा अपने शिशु को देना नहीं चाहती।

नि: संदेह, शिक्षा-दीक्षा से महिलाओं में चेतना आई है। घर से लेकर आकाश तक उनकी पहुंच हो गई। पर वह स्वतंत्रता का मुखौटा है, छदम रूप है। उसकी स्वतंत्रता सशर्त अनुबंधित है और यह अनुबंधन है पैसे का। पैसे से जुड़ी स्वतंत्रता ही स्वीकार्य है। इस शर्त के साथ कि वह आर्थिक अर्जन करते हुए अपने ‘औरतपन’, ‘पत्‍नीपन’ को यथावत् बनाए रखेगी। घर की सारी ज़िम्मेदारियों को वैसे ही पूरा करेगी, जैसे वह पूर्व में (बिना नौकरी की स्थिति में) करती रही।

यह परिवर्तन महिलाओं को सुखद प्रतीत हुआ, क्योंकि इसमें उन्हें स्वतंत्र होने का तथा पारंपरिक भूमिका को बदलने का मुगालता हुआ। पर सच्चाई तो यह है कि आर्थिक स्वतंत्रता के लिए रणक्षेत्र में उतरी महिला अभिमन्यु की भांति चक्रव्यूह में घुस तो गई, पर वापस घर का रास्ता न पा सकी। उस चक्रव्यूह में घिरकर संघर्ष करना उसका जीवन बन गया। घर से बाहर निकलना आम महिला की स्वतंत्रता नहीं, मजबूरी है इस भ्रमित स्वतंत्रता के बदले ज़िंदगी भर की बंधुआ मज़दूरी महिला की झोली में आ गई। अब उसे अपने घर में ही रहने की स्वतंत्रता नहीं रही। वह सीता के समान अपने ही घर से निर्वासित कर दी गई। यह निर्वासन एवं वापसी भी पुरुष की इच्छा पर है। आज स्थिति यह है कि उसकी ‘घरवाली’ भूमिका भी संदेहास्पद हो गई है। घर पर रहने के नारी के मौलिक अधिकारों का भी अपहरण होने लगा है, जिसके विरोध में किसी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।

नारी जीवन से संबंधित सारे निर्णय एकतरफ़ा हैं। ये निर्णय पुरुष प्रधान हैं। यह निर्णय न ले पाना नारी की मजबूरी है, क्योंकि अब तक उससे संबंधित निर्णय पुरुष लेता रहा। और तथ्य यह है कि बहुत दिनों तक क़ैद रहने वाला प्राणी आत्मचेतना को भूलने लगता है। लगभग वही स्थिति महिलाओं की है वह विचार करने को स्वतंत्र नहीं है। बचपन से अपने बारे में विचार करने व निर्णय लेने का कार्य पुरुष को करते देख वह इतनी अभ्यस्त एवं पंगु हो जाती है कि अपनी सारी वैचारिक क्षमता ही खो देती है। शायद ग़ुलामी की परिभाषा भी यही है कि दूसरों की इच्छाओं को मूर्त रूप दिया जाए। महिला की वैचारिक परतंत्रता ही उसकी सारी विकासात्मक गतिविधियों को रोक रही है। नारी स्वतंत्रता का दम भरने वाली महिलाएं सचमुच स्वतंत्र नहीं है वरन् वे एक स्वतंत्रता के भ्रम में दूसरी परतंत्रता में बंध रही हैं और यह परतंत्रता है पुरुष के बराबर या उसके जैसा होने की। जब किसी के जैसा ही बनना है फिर स्वतंत्रता कहां रही ? यह तो पुन: और अधिक घातक बंधन हुआ, अपने को खोने का और सब कुछ खोकर भी उसके जैसा न बन पाने का। नारी की प्रतिष्ठा उसके ‘नारीपन’ में है, पुरुष का प्रतिस्पर्धी या विरोधी बनने में नहीं। नारी मुक्‍ति आंदोलन भी महिला को महिला रूप में प्रतिष्‍ठित करने के बजाय पुरुष विरोधी रूप में प्रतिष्‍ठित करने पर तुले हुए हैं।

महिला की असली स्वतंत्रता उसके ‘महिलापन’ में है और आज नारी मुक्‍ति का अर्थ भी यही है कि महिला को केवल ‘महिला’ के रूप में प्रतिष्‍ठित किया जाए। यह प्रतिष्‍ठा केवल महिला द्वारा ही हो सकती है। अपने हर परिणाम के लिए महिला इस माने में ज़िम्मेदार है क्योंकि वह हर मायने में पुरुष से ज्‍़यादा शक्‍तिशाली एवं सहनशील है। सूर्य भले ही रजत आभा बिखेरता रहे, भोजन तो पृथ्वी ही देती है। अत: अपनी अस्मिता को स्थापित करने के लिए किसी भी संधिपत्र पर पुरुष हस्ताक्षर की नारी मोहताज नहीं है।

 

One comment

  1. Very good article. Want to read more of such articles in near future from you. Great magazine.
    Keep it up!!!

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