बेटा-बेटी में असमानता कहां तक उचित

-मुकेश अग्रवाल

रमेश के यहां लड़की होने का समाचार पाकर मैं उसके घर बधाई देने चला गया। उसके घर जाकर देखा तो वहां एक अजीब-सी खामोशी छाई हुई थी। रमेश की मां एक कोने में बैठी आंसू बहा रही थी तो स्वयं रमेश भी किसी गहरी चिंता में डूबा हुआ था। औपचारिकता की रस्म निभाने के बाद मैंने उदासी भरे माहौल के बारे में पूछा तो रमेश ने भरे मन से जवाब दिया, “काश! लड़का हो जाता तो…।”

इस तरह का हाल केवल रमेश का ही नहीं बल्कि अधिकांश परिवारों का है। आज जबकि नारी ने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में शिक्षा, संगीत, विज्ञान, खेल, चिकित्सा एवं अन्य क्षेत्रों में अपनी श्रेष्‍ठता प्रमाणित कर दी है। फिर भी हमारे देश में नारी को आगे बढ़ने के अवसर नहीं मिल पा रहे हैं। आख़िर क्यों…?

इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे दक़ियानूसी रीति-रिवाज़ और सामाजिक व्यवस्था ने बेटा-बेटी में एक गहरी दरार उत्पन्‍न कर दी है। माता-पिता को बेटी के पैदा होते ही उसके अगले घर की, विवाह की चिंता सताने लगती है। अधिकांश लोगों का यह मन है कि लड़की का विवाह तो माता-पिता का ऐसा उत्तरदायित्व है, जिसे हर हाल में निभाना पड़ता है। यह बेटी को अनचाहा बोझ बनाने में एक महत्पूर्ण भूमिका निभाता है।

शिक्षित लड़की के लिए उसे अधिक पढ़ा-लिखा वर खोजने की परेशानी की मानसिकता के कारण भी न जाने कितनी लड़कियां शिक्षा-दीक्षा के नाम पर केवल घरेलू कार्यों में उलझ कर रह जाती हैं। माता-पिता का भी उसे योग्य और प्रतिभा सम्‍पन्‍न नारी बनाने की अपेक्षा दक्ष गृहिणी बनाने की ओर अधिक झुकाव रहता है।

माता-पिता द्वारा बेटे को बेटी से अधिक महत्त्व देने का एक मूल कारण यह भी है कि अधिकांश माता-पिता यह समझते हैं कि बेटा तो जीवन पर्यन्त उनके साथ रहेगा और बुढ़ापे का सहारा बनेगा। हालांकि आजकल के संदर्भ में पुत्र को बुढ़ापे की लाठी मानना एक मृगतृष्णा ही है। क्योंकि वर्तमान परिस्थितियां ही कुछ ऐसी हैं कि कोई भी पुत्र अपना निर्वाह चलाते हुए माता-पिता के भरण-पोषण का दायित्व नहीं उठा पाता। बेटी को पराया धन मानकर उसकी सेवाओं से वंचित रहने की सोच के कारण ज़िंदगी भर बेटी पर समय और धन व्यय न करना भी अधिकांश माता-पिता की मजबूरी ही है। इस सम्बन्ध में महाकवि कालिदास ने ‘कुमार सम्भव’ में लिखा है कि केवल मूर्ख व्‍यक्‍ति ही कन्या और पुत्र में भेद करता है।

हिन्दू शास्त्रों के अनुसार पिता की मृत्यु उपरान्त पुत्र द्वारा चिता को अग्नि देने पर ही मोक्ष प्राप्‍ति जैसी धारणा के कारण भी अधिकांश माता-पिता पुत्र प्राप्‍ति की अंधी दौड़ में शामिल होकर बेटी को उसके अधिकारों से वंचित रखते हैं। नतीजा…बेटी का सारा जीवन अपने हितों को प्राप्‍त करने में ही बीत जाता है। बचपन में मिली उपेक्षा के बाद अनपढ़ और अशिक्षित लड़की विवाह के उपरान्त अपनी संतान का पालन-पोषण उतनी कुशलता से नहीं कर पाती, जितना कि वह शिक्षित होकर कर सकती थी। उचित शिक्षा के अभाव में उसे अपने पति के सामने भी झुककर ही रहना पड़ता है। फलस्वरूप आने वाली संतान के मन में भी पुत्र मोह का पनपना स्वाभाविक ही है।

हैरतअंगेज़ विषय तो यह है कि प्राचीन समय में स्त्रियों की प्रतिभा की अभिव्यक्‍ति के क्षेत्र समान रूप से खुले हुए थे। वह हर क्षेत्र में अपनी योग्यता को प्रदर्शित करती थी। उदाहरणार्थ महाकवि कालिदास द्वारा रचित ‘कुमार सम्भव’ में पार्वती द्वारा गेंद खेलने का उल्लेख मिलता है। ‘मेघदूत’ में अल्‍कापुरी की कन्‍याओं का शस्‍त्र विद्या सीखने का व्‍यापक उल्‍लेख है। महाभारत में भी शांता और कुंती द्वारा खेलने का विवरण है। ‘पोज़ीशन ऑफ़ वुमेन इन इंडिया’ पुस्तक के लेखक ने लिखा है कि चालुक्य वंश में स्त्रियां समान रूप से योगदान देती थी। एक अन्य पश्‍चिमी लेखक के अनुसार हिन्दू शासन में नैपुण्य, मितव्ययता, अनुशासन, प्रचुर उपज और जनता में खुशहाली थी तो ऐसे चार राज्यों में से तीन राज्यों में स्त्रियों का प्रशासन होता था। इस विषय में कवि मैथिलीशरण गुप्‍त ने भी क्या खूब कहा है।

‘भागे न क्यों हमसे भला फिर दूर सारी सिद्धियां। पाती स्त्रियां आदर जहां, रहती वहीं सब सिद्धियां’

परन्तु वर्तमान में हम ज्यों-ज्यों उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होते जा रहे हैं, त्यों-त्यों नारी को उसके मूलभूत अधिकारों से वंचित करते जा रहे हैं। हम सभी अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि नारी को विकास के समुचित अवसर मिले तो वह अपनी योग्यता और शासन द्वारा समाज के निर्माण में रचनात्मक योगदान दे सकती है। विकासशील देशों की प्रगति एवं चहुंमुखी विकास के पीछे नारी शक्‍ति का ही हाथ है। विदेशों में नारी को घर की दासी नहीं माना जाता बल्कि उसे पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किए जाते हैं। जिससे वे विकास और प्रगति के क्षेत्र में अपनी योग्यता और प्रतिभा का पूर्ण उपयोग कर सकें, यदि इस प्रकार की व्यवस्था अपने देश में भी हो जाये तो बेटा-बेटी में व्याप्‍त अंतर स्वत: ही समाप्‍त हो जायेगा।

वर्तमान समय में नारी की सामाजिक स्थिति मर्यादाओं तथा कुरीतियों की उतनी शिकार नहीं है जितना वह अपने ही घर में भेदभाव की शिकार है। यदि पिता एवं विवाह उपरान्त पति द्वारा सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया जाये तो निश्‍चित रूप से नारी की क्षमता का अभूतपूर्व विकास होगा। यदि हम आज से ही यह संकल्प लें कि अपनी बेटी का बेटे के समान ही पालन पोषण करेंगे तो कौन जाने आने वाले कल में किसकी बेटी पी.टी.उषा, किरण बेदी, या फिर इंदिरा गांधी बन कर अपना और देश का नाम रौशन कर दे।

बेटा-बेटी को समान अधिकार मिलें इसके लिए पिछले कुछ समय से भारत सरकार अवश्य ही प्रयत्‍नशील है। दूरदर्शन के माध्यम से प्रचार, लड़कियों को बी.ए. तक मुफ्‍़त शिक्षा, लड़की के जन्म पर उसके विवाह हेतु ‘धन योजना’ तथा भ्रूण हत्या पर पाबंदी जैसे विधेयक भी पारित किये गये हैं, परन्तु यह ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ ही सिद्ध हुए हैं।

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