अश्‍लीलता के विरुद्ध जीतना है एक और महाभारत

मुनीष भाटिया

आज यदि समाज पर दृष्टि डाली जाए तो यहां ऐसी वृत्तियां पनप रही हैं जिसमें नैतिक शिक्षा, सदाचार की अपेक्षा अनैतिकता व भ्रष्ट आचरण को महत्त्व दिया जा रहा है। इन सबका खामियाजा दुर्भाग्य से नारी समाज को भुगतना पड़ रहा है। समाज की भ्रष्ट प्रवृत्ति के कारण नारी को वस्तु बनाकर उपयोग किया जा रहा है। सौंदर्य प्रदर्शन तो कोई बुरी बात नहीं पर जब देह प्रदर्शन व अश्लीलता को मनोरंजन के नाम पर परोसा जाता है तो यह इक्कीसवीं सदी के महिला जगत का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है। भले ही वह बढ़ावां विदेशी प्रचारतंत्र के माध्यम से अथवा धन-लोलुपता के गणित में उलझे कुछ फ़िल्म निर्माताओं के माध्यम से ही हो रहा है। इन सबमें से कोई न कोई प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अश्लीलता फैला रहा है। समाज में इस तरह का वातावरण तैयार किया जा रहा है जिसमें अश्लीलता को समाज का अभिन्न अंग मानकर प्रस्तुत किया जा रहा है। ब्लेड के विज्ञापन से लेकर वाशिंग मशीन को बेचने के लिए जबरन ऐसे दृश्य ठूंसे जा रहे हैं जिसमें नारी को कुत्सित हाव-भाव के साथ पेश किया जाता है। इन बातों का समाज में युवा वर्ग पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

समाज में चहुं ओर बढ़ रही अश्लीलता का ही परिणाम है कि छ:वर्ष की बालिका से लेकर वृद्धा तक के यौन उत्पीडऩ की ख़बरें-पढ़ने-सुनने को मिल जाती हैं। यह समाज के नैतिक व चारित्रिक दिवालिएपन का ही परिणाम है कि समाज में संयम समाप्त हो रहा है। भारत में घटित हो रही ऐसी उच्छृंखल यौनाचार की घटनाएं समाज में फैल रही असहय अश्लीलता के फलस्वरूप ही घटित हो रही हैं।

जिस देश में कभी नारी की साड़ी उतारने से महाभारत छिड़ गया था उसी राष्ट्र में आज नारी की साड़ी को तार-तार किया जा रहा है। मनोरंजन के नाम पर अंग-अंग का बड़ी बेशर्मी से प्रदर्शन किया जा रहा है। सभी फ़िल्म निर्माताओं, विज्ञापन एजंसियों व देशी-विदेशी चैनलों में अश्लीलता के लिए मानों होड़ लगी हुई है। छोटे-छोटे क़स्बे व गांव जो कि इस अश्लीलता से अछूते थे वहां भी केबल टी.वी. की पहुंच से व इंटरनेट के जाल से असहय अश्लीलता फैल रही है।‘सरकाई लो खटिया………’ जैसे गीतों ने युवा वर्ग की नैतिकता व चरित्र की खटिया खड़ी कर दी है। वहीं जब रोडवेज़ की बसों अथवा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर भद्दे व दो मुंहे गीत बजते हैं तो नारी को तो शर्मिंदगी का अहसास होता ही है साथ ही किशोर वर्ग व बालकों पर भी कोई अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। आज हालत यह है कि तीन-चार साल का बच्चा कोई शिक्षाप्रद बाल कविता सीखने के बजाए दो मुंहे गीत गाना पहले सीखता है। आज का सिनेमा व अन्य प्रचार माध्यम समाज में प्रत्येक वर्ग के लोगों में कुवासनाएं भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा।

एक कटु सत्य यह भी है कि धार्मिक धारावाहिकों में भी नग्नता परोसी जा रही है जिस पर किसी सामाजिक संगठन की नज़र नहीं जा रही। ऐसी अश्लीलता पर कुतर्क दिया जाता है कि यह तो अजंता एलोरा के काल से भारतीय संस्कृति का हिस्सा रही हैं। यह विडंबना ही है कि अपनी उद्दंडता को सफेद पोश जामा पहनाने के लिए ऐसे कुतर्कों का सहारा लिया जाता है इसी अश्लीलता का दुष्प्रभाव है कि समाज में महिलाओं से छेड़छाड़ होती है। मां के गर्भ से जन्म लेकर व उसके आंचल का आश्रय लेकर पला-बढ़ा बालक जब बड़ा होकर नारी को हेय दृष्टि से देखता है तो इसे विडंबना ही कहा जाएगा।

जिस मां ने आज की युवा पीढ़ी को अपना खून पिलाया व इस लायक़ बनाया कि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके, उसी महिला को समाज में स्वच्छंद विचरण पर अश्लीलता के प्रभाव में अंकुश लगा देता है। अश्लीलता के मकड़जाल में जकड़े लोग अपनी ओछी हरकतों से अपने परिवार को तो धोखा देते ही हैं साथ ही समाज के लिए भी बोझ सिद्ध होते हैं।

अत: आज यह अवश्यंभावी हो गया है कि सुरसामुखी अश्लीलता के विस्तार पर अंकुश लगाया जाए और मनोरंजन के नाम पर आज जो नारी को मोहरा बनाकर ज़हर घोला जा रहा है, उसे और अधिक फैलने से रोकने के लिए समाज की प्रथम इकाई अर्थात् पारिवारजनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। आज यदि हमें अपनी महान् सांस्कृतिक विरासत को बचाना है तो हमें अपने परिवार के युवा व किशोर वर्ग को ऐसा मार्गदर्शन देना होगा ताकि उसका नैतिक व चारित्रिक उत्थान हो सके तभी अश्लीलता पर विजय प्राप्त की जा सकती है। नग्नता को नारी सौंदर्य की संज्ञा देने वाले वर्ग को भी समझना होगा कि धनलोलुपता के लिए उनका कृत्य समाज का घोर अहित करता है। भले ही स्वतंत्र भारत में निज विचार प्रकट करने का मौलिक अधिकार है किंतु साथ ही साथ समाज व राष्ट्र के प्रति नैतिक कर्त्तव्य भी हैं जिनके प्रति आंखें नहीं मूंदी जा सकती।

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