औरत पर अत्याचार आख़िर सच्चाई कितनी

-धर्मपाल साहिल

भारतीय इतिहास के पृष्‍ठ महिलाओं की गौरवमयी कीर्ति से भरे पड़े हैं। शास्त्रानुसार जहां स्त्रियों की पूजा होती है, वहां देवता वास करते हैं। औरत को गृहलक्ष्मी, गृहशोभा, सुरोपमा आदि उपमाओं से सुशोभित किया गया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नारी ने पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर साथ दिया तो कई बार उससे दो क़दम आगे बढ़ कर भी लोगों को आश्‍चर्यचकित किया है। देवासुर संग्राम में कैकेई के अदभुत कौशल से महाराजा दशरथ को चकित करने की कथा से कौन अनभिज्ञ है। सीता, शकुन्तला, दमयंती, गार्गी, मैत्रेई, झांसी की रानी, विजय लक्ष्मी पंडित और इन्दिरा गांधी जैसी अनेकों उदाहरणें आसानी से मिल जाती हैं।

फिर समय ने करवट बदली। देश की परतन्त्रता के साथ-साथ स्त्रियों की आज़ादी का भी अपहरण हो गया। उनका स्थान समाज से गौण प्राय: हो गया। उन्हें पर्दे में रहने को विवश होना पड़ा। उनसे शिक्षा के साथ-साथ जीवित रहने के मूलभूत अधिकार तक छीन लिए गए। रामचरित मानस में सीता जैसे आदर्श चरित्र का निर्माण करने वाले समाज सुधारक गोस्वामी तुलसीदास भी यह कहने से नहीं हिचके-

‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सब ताड़न के अधिकारी’

या फिर ‘अबला तुम्हारी यही कहानी, आंचल में है दूध, आंखों में पानी।’

पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियां अंधविश्‍वास, अशिक्षा, अस्वच्छता, पर्दा समस्या, बेमेल विवाह, विधवा विवाह, बाल विवाह, बहु विवाह, दहेज़ समस्या आदि समस्याओं से ग्रस्त हो गई। फिर समय चक्र बदला। औरत की महत्ता को पुन: समझते हुए समाज में जागृति आई। राजा राम मोहन राय जैसे समाज सुधारकों ने औरत की स्थिति को सुधारने एवं संवारने का प्रयास किया। संविधान में पुरुषों के बराबर अधिकार दिए गए हैं। आरक्षण की व्यवस्था की गई। अत्याचारों को रोकने हेतु कई कानून बनाए गए। महिला आयोग स्थापित हुए। महिलाओं में उनके अधिकारों की प्राप्‍ति एवं जागृति हेतु अन्‍तर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाए जाने लगे। महिला सशक्‍तिकरण का नारा उभरा। इससे स्त्रियों में जहां आत्मविश्‍वास, स्वाभिमान की भावना जागी वहीं पुरुषों के प्रति प्रतिकार की भावना ने भी जन्म लिया। इतना सब होने के बावजूद वर्तमान समय में औरतों पर अत्याचारों का शोर मुख्य रूप से उभर रहा है। बिना शक अभी भी पुरुष प्रधान मानसिकता से ग्रसित पुरुषों के अत्याचारों का सिलसिला जारी है। लेकिन विचारणीय विषय यह है कि क्या वास्तव में स्त्रियों पर इतने अत्याचार हो रहे हैं जितना बावेला मचाया जा रहा है? अथवा स्त्रियों द्वारा सामाजिक हमदर्दी एवं कानूनी सहायता का नाजायज़ लाभ तो नहीं उठाया जा रहा। क्या केवल स्त्री ही पुरुषों के अत्याचारों की शिकार है? कहीं पुरुष भी स्त्रियों के हाथों प्रताड़ित तो नहीं हो रहे? इतना ही नहीं औरत, औरत पर भी अत्याचार करने से नहीं चूक रही है। वास्तविकता से अवगत होने के लिए वस्तु स्थिति का विश्‍लेषण करना अत्‍यावश्‍यक हो गया है।

थोड़ी-सी सूक्ष्म दृष्‍ट‍ि दौड़ाने से हमें समाज में हमारे आसपास कहीं-कहीं ऐसी उदाहरणें भी मिल जाती हैं जहां अपनी सुन्दरता, उच्च शिक्षा, उच्च पद, आर्थिक सम्पन्नता के कारण पत्‍नियां अपने पतियों के साथ नाइन्साफी कर रही हैं। यहां तक कि पति को गु़लाम जैसा जीवन गुज़ारने को विवश कर रही औरत के उदाहरण भी देखने को मिले। वे सभी बातें जो पुरुषों द्वारा औरतों पर अत्याचार हेतु प्रयोग में लाई जाती रही हैं उन को औरतें लागू नहीं कर सकतीं पर उन्होंने नए-नए तरीक़े खोज लिए हैं। विलक्षणता यह है कि औरतों द्वारा किए जाने वाले अत्याचार बल प्रयोग वाले बहुत कम लेकिन मानसिक तौर पर असह पीड़ा पहुंचाने वाले अधिक होते हैं और कुछ एक बड़े ही कुशाग्र बुद्धि व्‍यक्‍ति पागलपन की अवस्था तक पहुंचे देखे गए हैं। ऐसे पीड़ित आदमी समाज में अपनी प्रतिष्‍ठा की ख़ातिर चुप रह जाते हैं या फिर ऐसी स्त्रियों से पीछा छुड़ाने में ही अपनी समझदारी समझते हैं। हालांकि ऐसी औरतों की तादाद अधिक नहीं लेकिन उनका शिकार हुए मर्दों के बारे में क्या कभी कोई सोच पाया।

ज़रा अपने इर्द-गिर्द घटती छोटी-मोटी घटनाओं पर नज़र डालें, अगर कहीं सार्वजनिक स्थान पर स्त्री-पुरुष का झगड़ा हो जाए तो आम लोग बिना देखे-समझे-परखे पुरुष को ही दोषी समझ कर औरत का पक्ष लेकर उस की हमदर्दी बटोरने का प्रयास करने लगते हैं। यदि बात थाने तक पहुंच जाए तो पुलिस भी पहले मर्द की सेवा करती है। उस का पक्ष जानने का प्रयास तक नहीं करती क्योंकि अबला का आवरण ओढ़े स्त्री न तो झूठ बोल सकती है, न धोखा दे सकती है, न हाथ उठा सकती है। जबकि औरत की बिना कहे बहुत कुछ कह देने की क्षमता, बिना हथियार क़त्ल करने का हुनर, ऊपर से सरल एवं भीतर से जटिल व्यवहार जिसे देवता भी समझ सकने में असमर्थ रहते हैं की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। यह सही है कि आमतौर पर औरतें झगड़े बढ़ने पर ज़्यादा शर्म महसूस करती हैं, तनाव झेलती रहती हैं और झगड़े में नहीं पड़ती। लेकिन उनके तनाव का ध्यान रखते हुए हम ऐसी औरतों को नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते जो बिना वजह झगड़े पैदा करती हैं। यह सही है कि औरतों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए उनको अपने हक़ में आवाज़ बुलंद करना सिखाया जा रहा है। लेकिन वो महिलाएं असामान्य व्यक्‍तित्‍व की मालिक हैं जो किसी न किसी तरीक़े से लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहती हैं और लोगों की हमदर्दी का नाजायज़ फ़ायदा उठाती हैं। उनको भी तो नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस प्रकार कई बार बेक़सूर व्‍यक्‍ति ख्‍़वाहमख़्वाह शिकंजे में जा फंसता है।

औरतों से दिन-प्रति-दिन छेड़-छाड़ एवं बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं के पीछे मुख्य तौर पर पुरुष को ही दोषी माना जाता है। लेकिन क्या ऐसा कोई कानून है, जो इनकी नाजायज़ हरकतों पर रोक लगाए। टी.वी., फ़िल्म के पर्दे पर अश्‍लीलता की सभी सीमाएं पार कर काम भावना उकसाने वाले चित्र एवं क्रियाएं दिखाने पर पाबंदी होनी चाहिए। समाज एवं कानून ने जैसे इन्हें पुरुष के पौरुष की परीक्षा लेने की ठान रखी है। ऐसी फ़िल्में, विज्ञापन, तस्वीरों एवं पहरावे द्वारा भड़काई गई कामवासना का शिकार होती हैं मासूम, भोलीभाली बच्चियां एवं औरतें। ऐसी मासूम लड़कियों की ज़िंदगी बर्बाद करने वालों को बेक़सूर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन हर पहलू पर नज़र डालनी भी आवश्‍यक है।

आज उच्चवर्ग की सभ्य कही जाने वाली औरतें आधुनिकता एवं पुरुष की बराबरी के नाम पर सार्वजनिक स्थानों पर भी शराब पीने और सिगरेट नोशी करने लगी हैं। ऐसे में नशे में चूर कोई व्यक्‍ति कथित तौर पर किसी से छेड़-छाड़ कर बैठे तो हैरानी वाली बात नहीं होनी चाहिए। अन्तत: दोषी पुरुष ही होता है, औरत समाज के तरस का पात्र।

नित्य समाचार पत्रों में बलात्कार की चटपटी गर्मागरम ख़बरें प्रकाशित होती हैं। यदि इन में सभी की बारीकी से छान-बीन की जाए तो कुछ एक सहमति से किए सौदे भी नज़र आएंगे, जो पकड़े जाने पर बलात्कार घोषित कर दिए जाते हैं। कई केसों में तो औरतों द्वारा पुरुषों को जाल में फंसा कर उन्हें ब्लैकमेल करने की घटनाएं भी घटती हैं, जो उद्देश्य की पूर्ति न होने पर बलात्कार की श्रेणी में ला दी गई।

इसी प्रकार घरों में होने वाली छोटी-मोटी नोक-झोंक, झगड़े घर-घर की ही कहानी हैं। कुछ औरतें बहुत अधिक मुंह ज़ोर होती हैं, बिना सोचे समझे ज़ुबान चलाने में माहिर होती हैं। पल भर में बात का बतंगड़ बना देना उनके बाएं हाथ का खेल होता है। न उन का जु़बान पर क़ाबू होता है न आंसुओं पर। इन हथियारों से जहां वे मर्द के हृदय को ज़ख़मी करती हैं वहीं समाज की हमदर्दी प्राप्‍त करने में भी सफल हो जाती हैं। चुप रहने वाला मर्द समाज की निगाहों में क़सूरवार सिद्ध हो जाता है। ऐसी औरतें एक बार अपने प्रपंच में सफल होने के बाद घर में मनमानियां करने लगती हैं। उनके अत्याचार को चुपचाप सहने के अतिरिक्‍त कोई चारा नहीं रह जाता ।

कई औरतों पर धार्मिकता इतना अधिक रंग जमा लेती है कि वे अपने घर की ज़िम्मेदारियों से आंखें मूंद कर धार्मिक स्थानों में सत्संग, र्कीतन, दूर-दूर की धार्मिक यात्राओं पर भी जाती रहती हैं। पति पीछे से घर गृहस्थी एवं जवान बेटियों की सुरक्षा करता फिरे। प्रतिरोध करने पर, मैंने तो अपना आगा संवारना है, मैं धर्म कर्म करती हूं आवारागर्दी नहीं, जैसे हृदयवेधी वचन सुन कर पति मन ही मन दु:खी हो कर रह जाते हैं और अपनी क़िस्‍मत पर रोते हैं।

पुरुषों की तरह औरतों द्वारा भी अनैतिकता पर उतारु हो कर अवैध संबंध बना लेना भी पुरुष पर अत्याचार के नए शिखर स्थापित करता है। ‘भाई’ जैसे पवित्र रिश्ते की आड़ में कथित भाइयों के साथ रंगरलियां मनाना, उन के साथ घूमना या घर बुलाना, इतनी सफ़ाई से अंजाम देती हैं कि पति को इस बात का अहसास तक नहीं होने देती और अगर पति को इन संबंधों का पता चल जाए तो उसे जिस मानसिक पीड़ा से गुज़रना पड़ता है उस का अनुमान लगाना मुश्किल होता है। उसकी हालत सांप के मुंह में छिपकली वाली हो जाती है, न तो निगलते बनता है न छोड़ते। दिन-रात पत्‍नी, बच्चों व परिवार हेतु मेहनत मज़दूरी, चोरी-रिश्‍वतख़ोरी, क्या-क्या पापड़ नहीं बेलता। जब उसे पत्‍नी द्वारा धोखा देने या अवैध संबंधों की भनक मिलती है तो ऐसे में उस के पौरुष को चोट पहुंचती है। फिर वह चुप कैसे बैठ सकता है। मर्द द्वारा कोई क़दम उठाने पर उसे शक्की या नामर्द कह कर समाज में उस का मज़ाक उड़ाया जाता है।

नि:संदेह दहेज़ समस्या एक सामाजिक कुष्‍ठ है। नैतिकता से गिरे लालची लोगों द्वारा सचमुच ही दहेज़ की मांग पूरी न होने पर मासूम ज़िंदगियों को निर्ममता से मौत के घाट उतार दिया जाता है। ऐसे लोग समाज के लिए कलंक है। समाज द्वारा उनका बहिष्कार एवं कानूनी सज़ा मिलनी चाहिए। लेकिन कई बार यह भी देखने में आता है कि मूल समस्या कोई और ही होती है लेकिन उसे दहेज़ की रंगत दे दी जाती है। पति को वश में करने, ससुराल वालों को डराने, उन पर अपना आधिपत्य स्थापित करने, अपनी ग़लतियां छिपाने या ग़लत बात मनवाने के लिए औरतें दहेज़ उन्मूलन कानून की आड़ लेती हैं। विशेषकर जब मायके में कोई पुलिस विभाग, अदालत या उच्च पद पर आसीन हो, आर्थिक रूप से सम्पन्न हो। ऐसे घरों की औरतें दहेज़ के लिए तंग करने, आत्महत्या की धमकी या कई बार तो आत्महत्या तक करके ससुराल वालों पर दहेज़ मांगने का इल्ज़ाम लगा देती हैं और ऐसा करने में बेक़सूर भी सज़ा की चक्की पिसते नज़र आते हैं।

औरतों द्वारा मर्दों पर ही नहीं औरतों पर भी अत्याचार की उदाहरण मिलती है। सास, ननद, जेठानी, देवरानी आदि औरतें होते हुए भी बहू को दहेज़ कम लाने पर जली-कटी सुनाने से बाज़ नहीं आतीं। कई बार तो इस से भी आगे बढ़ कर अपने हाथों ज़हर देने अथवा जलाने जैसे घिनौने कार्य भी कर डालती हैं।

कुछ औरतें पति के साथ अंतरंग क्षणों में सौदेबाज़ी पर उतर आती हैं। आनंददायक पलों में पति के समक्ष अनुचित मांग रख कर रंग में भंग डालती हैं। कई प्रकार के तनावों से ग्रस्त दिन भर का थका-हारा पति जब उस की आगोश में कुछ पल सकून के तलाशता है तो पत्‍नी का यह व्यवहार उसे पत्‍नी सुख प्रदान करने की बजाए दु:ख और तनाव प्रदान करता है। पति की सेक्स सुख की मांग पर सौदेबाज़ी की लम्बी सूची थमा देना, पति को पीड़ा के साथ-साथ भटकने के लिए भी प्रेरित करती है। फिर इसे भी पुरुष अत्याचार की संज्ञा दे दी जाती है।

उपरोक्‍त चर्चा से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि समाज में स्त्रियों पर अत्याचार होते हैं, यह सत्य है लेकिन अधूरा। यह सत्य है कि औरतों पर वर्षों से हो रहे अत्याचारों के लिए आवश्यक क़दम उठने चाहिए। कुछ एक ग़लत औरतों के कारण हम अन्य महिलाओं के साथ नाइन्साफ़ी होते रहने तो नहीं दे सकते। लेकिन हमें आंखें मूंद कर औरतों का पक्ष ही नहीं ले लेना चाहिए। इस के दूसरे पहलू को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।

स्त्रियों पर होते अत्याचारों को काफ़ी प्रचार मिला है, लोगों की सहानुभूति भी। लेकिन पुरुषों पर होने वाले अत्याचार घर की चार दीवारी में ही दफ़न हो कर रह जाते हैं। वे स्वयं की इज्‍़ज़त की खातिर एवं मज़ाक का पात्र बनने से बचने के लिए इस ज़हर को चुपचाप पी जाते हैं और घुट-घुट कर जीते हैं। औरतें मर्द की इस मजबूरी का फ़ायदा उठा कर अपने पर हुए अत्‍याचार का बढ़ा-चढ़ा कर बखान कर लेती हैं।

इस लेख का तात्पर्य स्त्रियों पर हो रहे अत्याचारों को नकारना कदापि नहीं बल्कि इस तस्वीर का दूसरा रुख़ दिखाने का प्रयास भर है। न तो सारे पुरुष ही अत्याचारी होते हैं और न सारी स्त्रियां ही, यह सत्य भी ध्यान में रखना होगा।

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