औरत को इंसान होने का अहसास जगे तो

 -शैलेन्‍द्र सहगल

हमारे बुज़ुर्ग अक्सर यह कहते आए हैं कि बेटियां तो राजे महाराजे भी अपने घर नहीं रख पाए, शादी तो बेटी करनी ही पड़ेगी! गोया बेटियां बहू बनने के लिए ही पैदा होती हैं। जिस मां की कोख से वो जन्म लेती है उसके लिए भी अगर वो पराया धन ही रह जाएं तो इस जहां में कहां ऐसा कोना होगा जिसे वह “अपना घर” कह सकें? बाबुल के घर जो बेटी पराई अमानत समझी जाती है वो ससुराल वालों से निभा न पाए तो ‘पति के घर से’ भी निकाल बाहर कर दी जाती है। जन्म लेते ही मौत के घाट उतार दी जाने वाली यह ‘कथित केवल श्रद्धा’ अपनी बदनसीबी को सदियों से ढोती आ रही है।

बदनसीबी का दूसरा नाम अगर बेटी रख दिया जाए तो कहना होगा कि बहू बन कर भी उसके दिन नहीं फिरे। चूल्हे से लेकर चिता तक तिल-तिल जलने और मिटने वाली नारी इस जहान के ज़ुल्मो सितम सहते-सहते अब धीरे-धीरे यह जानने लगी है कि वह केवल बहू होने के लिए नहीं बनी है। किसी नामी गिरामी कवि का कहना है कि बेटी मां की कोख से निकल कर बाबुल के आंगन में पलती है, जवान होकर पति के घर गलती है और उसके बच्चे जनने और पालने में ही मर खप जाती है। अगर वो कहीं ज़िन्दा रहती है तो प्रेमियों के दिलों में शायद इसीलिए उन्हें प्रेमियों से दूर रखा जाता है कि जीने की कला कहीं वो भी सीख न जाएं। ईश्‍वर ने भी नारी से इन्साफ़ नहीं किया। उसे इतना कोमल बना दिया कि वो अपना भी बोझ उठा न सके। बाबुल के घर में पालन पोषण के दौरान केवल उसे ‘अगले घर’ जा कर कैसे रहना है और कैसे सब कुछ सहना है केवल इसी बात की ट्रेनिंग दी जाती है। यहां हमारी संस्कृति में बेटी जवान नहीं होती बल्कि ब्याहने लायक होती है। जहां तक ब्याहने लायक होने का सवाल है इसके बारे में भी कोई समय सीमा तय नहीं। हमारे देश में आज भी बिना ब्याहने योग्य हुए ही उसको ब्याहने की जल्दी होती है। गुड्डे-गुड़ियों के ब्याह के खेल हक़ीक़तन देश के अविकसित प्रदेशों में सरेआम खेले जा रहे हैं। भले ही कानून 18 वर्ष की आयु तक किसी कन्या के विवाह की अनुमति नहीं देता मगर उत्तर-प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में बाल विवाह की प्रथा आज भी बेटियों पर भारी है। जहां शिक्षा और विकास की रौशनी की किरणें पहुंची हैं वहीं आज की नए दौर की शिक्षित बेटियां यह भी सोचने लगी हैं कि शादी उनके जीवन की ज़रूरत तो हो सकती है मगर मकसद नहीं। शिक्षा ने बेटियों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि वो केवल बहू बनने के लिए पैदा नहीं हुईं और न ही वो किसी की महज़ मिसिज़ हो कर खुद को ख़त्म करने को तैयार हैं। अफ़सोस जनक पहलू इस संदर्भ में यह है कि ब्याहने लायक लड़की के ब्याह की चिन्ता घर वालों से कहीं अधिक अड़ोसियों-पड़ोसियों व रिश्तेदारों को होने लगती है। घर के अन्दर व घर के बाहर अर्थात् हर जगह हर वक्‍़त केवल ब्याहने योग्य बेटी को ब्याहने की बात ही चलेगी। इस संबंध में एक आस अगर उभर कर सामने आई है तो वो है बेटियों में कुछ बन कर दिखाने की लालसा का अंकुर फूट पड़ना। उनकी अपने बारे में जगी इस भावना के उत्साह वर्द्धक परिणाम भी नज़र आए हैं। कुछ बनने और बनकर कुछ कर दिखाने की होड़ में आज लड़कियों ने लड़कों को खदेड़ दिया है। हर क्षेत्र में लड़कियां बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। हमारे समाज के पुरुष वर्ग ने महिला जगत में आए इस बदलाव को खुशी-खुशी इस लिए स्वीकार भी कर लिया है क्योंकि इस बदलाव ने उनके कन्धों के आर्थिक बोझ को ही कम नहीं किया अपितु ‘घर की खुशहाली’ में बराबर का योगदान देने के बावजूद अपनी पूर्व निर्धारित ज़िम्‍मेदारियों का बोझ भी ढोया है। इसके लिए वह अपनी घरवाली को बराबरी का दर्जा देने की क़ीमत चुकाने को भी तैयार ही दिखता है। इधर इन दिनों एक नई भावना आर्थिक रूप से आत्म निर्भर महिलाओं में पनपने लगी है। कुछ शिक्षित, आर्थिक रूप से स्वावलम्बी युवतियों को अपने लिए, अपने घर व अपनी पहचान की चाहत ने आ घेरा है। वे अपनी ज़िन्दगी को अपने ढंग से अपने लिए जीना चाहती हैं। शादी के बन्धन उन्हें किसी भी रूप में गवारा नहीं है। अब वे सोचने लगी हैं कि ज़िन्दगी में और बहुत काम हैं शादी के सिवा। शादी के प्रति उत्पन्न हुई इस नई विरक्‍त भावना की पृष्ठ भूमि में शायद शादी के हो रहे मौजूदा हश्र में से पनपा वो भय है जिसने शादी के बंधन को एक रंगीन ख्‍़वाब की जगह संगीन जुर्म बना कर रख दिया है। आज की शिक्षित और जागृत नारी जान जोखिम में डाल कर इसका शिकार होने के लिए तैयार नहीं। दहेज़ दानव को मात्र अन्ध विश्‍वास के कारण वो अपना पति परमेश्‍वर मानने को तैयार नहीं। जीवन भर की दासतां के इस करारनामे पर हस्ताक्षर करना आज स्वीकार नहीं। उसके शादी से किए गए इन्कार ने उसके इर्द-गिर्द अनेकों सवालिया निशानों वाले तीरों को न्यौता भी दिया है। सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी है कि हम कह सकते हैं कि

जो लड़की अपनी इज्‍़ज़त से करे प्यार

वो शादी से कैसे करे इन्कार?

शादी की चरमराती व्यवस्था के चलते आज शादी से विरक्त हुई युवती यह सोचने पर विवश हो गई है।

जिस लड़की को स्‍वाभिमान से हो प्यार,

वो शादी को कैसे करे स्वीकार?

 असल बात तो यह है कि लड़की का इन्कार किसी को भी गवारा नहीं है वो बात अलग है कि घर के अभावों से लड़की, घर की बड़ी बेटी अपने भाई बहनों के भविष्य के लिए अपने सपनों की आहुति दे डाले या फिर कमाऊ बेटी की कमाई से घर चलाने वाले मां-बाप उसकी शादी करना ही भूल जाएं। एक बेटी का घर के लिए किया गया त्याग है तो उसका बिना शादी के ही जिए जाना समाज को क़बूल है मगर सीधा अपनी मर्ज़ी से शादी के लिए किया गया उसका इन्कार किसी को भी गवारा नहीं, न घर को और न ही समाज को। जो युवती इस शादी से इन्कार करती है उसे घर, समाज चैन से जीने नहीं देता। तरह-तरह के सवालों के तीर उसके इरादों को चकनाचूर करने के लिए छोड़े जाते हैं। बदनामी की कालिख के छींटों से लेकर उसकी सहजता को मनोरोग विशेषज्ञ से टेस्‍ट करवाने तक की नौबत खड़ी की जाती है। जादू-टोना, झाड़-पोंछ से लेकर मनोरोग विशेषज्ञ की सेवाएं लेकर उसके दिल में ब्याह की इच्छा की बुझी जोत जलाने के ठोस प्रयास तक किए जाते हैं। इन सभी अग्‍नि परीक्षाओं से गुज़र जाने के बाद भी तब तक समाज की कोशिशें जारी रहती हैं जब तक समाज उसे ब्याहने लायक समझता है। मुझे यहां एक ऐसी महिला की उदाहरण याद आ रही है जो बच्चों का स्कूल चलाया करती थी। उसे किसी ज्योतिषी ने बता दिया कि उसको उसका पति जलाकर मार देगा। यह भय बन कर उस के दिलो-दिमाग़ में छा गया। चालीस वर्ष की आयु तक वो शादी करवाने का दबाव झेलती रही मगर शादी करने को तैयार न हुई। फिर किसी ने उससे पूछा कि अगर शादी न करे तो क्या वो कभी मरेगी नहीं? आख़िर उसने शादी कर डाली और अच्छे भले पति के होते हुए भी स्वयं ही जल कर मर गई। ऐसा नहीं है कि भयभीत हो कर ही औरतों ने शादी के बिना ज़िंदगी बिताई है। समाज में बहुत सी ऐसी महिलाएं हैं जो आजीवन कुंआरी रहीं और अत्यन्त महत्वपूर्ण पदों का कार्यभार अत्यन्त निपुणता से निभाती रहीं। उन्हें कभी भी शादी न करने का अफ़सोस नहीं हुआ। उनकी ज़िंदगी में वीरानगी और सन्नाटा जैसी भी कोई अनुभूति कभी नहीं रही। पुरुषों के प्रति कोई अलगाव, दुराव और दुराग्रह भी नहीं रहा। अपनी मुक्‍त ज़िंदगी को स्वच्छन्द, अपनी अनुभूतियों के साथ जीते हुए अपने व्यक्‍तित्व का विकास भी कुछ इस तरह से किया कि वे वैवाहिक महिलाओं की अपेक्षा अपने समाज को कुछ बेहतर सहयोग भी दे पाने के संतोष से भरा पूरापन महसूस करती हैं। मां न बनने का भी उन्हें कोई अफ़सोस नहीं अलबत्ता अच्छा और बेहतर इंसान होने की नितान्त सहज कोशिश करने का संतोष उन्हें अवश्य है। एक इंसान होने के नाते अपना जीवन अपने ढंग से जीने का अधिकार तो सभी को होना ही चाहिए। अगर कोई बेटी किसी की बहू होना अपने जीवन का लक्ष्य नहीं मानती तो यह उसका अधिकार है। उसके इस अधिकार को अपनी कसौटियों पर जबरन परखने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। नारी देह वो मांस का पिंजरा है जिसे समाज के भय का न दिखने वाला ताला लगा हआ है। सदियों से लगे इस ताले को खोल कर कोई इन्सान औरत के लबादे से निकल कर बाहर आना ही चाहता है तो इस पर लकीरों के फ़कीरों द्वारा इतनी हाय तौबा क्यों? आख़िर एक इंसान की तरह ज़िंदगी जीने का हक़ तो औरत को भी हासिल होना ही चाहिए। जब पतियों के रूप में पिशाच मिलने लगें तो इंसान के रूप में मिले शैतान से दूर हट कर, अपने ही बूते पर तमाम रिश्तों के नक़ाब उतार कर एक इन्सानी ज़िंदगी जीने का तजुर्बा औरत को क्यों न करने दिया जाए?

अगर कोई बेटी किसी की बहू होना अपने जीवन का लक्ष्य नहीं मानती तो यह उसका अधिकार है। उसके इस अधिकार को अपनी कसौटियों पर जबरन परखने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। नारी देह वो मांस का पिंजरा है जिसे समाज के भय का न दिखने वाला ताला लगा हुआ है। सदियों से लगे इस ताले को खोल कर कोई इन्सान औरत के लबादे से निकल कर बाहर आना ही चाहता है तो इस पर लकीरों के फ़कीरों द्वारा इतनी हाय तौबा क्यों? आख़िर एक इन्सान की तरह ज़िंदगी जीने का हक़ तो औरत को ही हासिल होना ही चाहिए।

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