क्यों होता है प्यार अंधा

सुरेन्द्र सिंह चौहान काका

मैं वह रात कभी नहीं भूल सकती, जब मैं हाथों में चाय का प्याला लिए घड़ी की सुइयों को देख रही थी। मैं हाल ही में चंडीगढ़ से मुम्बई आई थी। आज की शाम मैंने अपने प्रेमी चेतन के साथ गुज़ारी थी। मुझसे विदा लेने के बाद वह एक अन्य युवती के साथ फ़िल्म देखने चला गया था, जो उसके ऑफ़िस में ही काम करती थी।

इस समय सुबह के पांच बज रहे थे। मैं सोच रही थी, क्या वह सुबह नौ बजे अपनी कार को लेकर आ जायेगा? क्योंकि मुझे अपनी नई नौकरी के इंटरव्यू के लिए जाना था। बस के झंझट से बचने के लिए मुझे उसकी कार की ज़रूरत थी। मैंने सोचा, बहरहाल अभी तो मुझे कुछ देर के लिए अवश्य सो जाना चाहिए, ताकि सुबह तरो-ताज़ा रहूं, पर सोने के लाख प्रयास के बावजूद भी आंख, हर आने वाली कार की आहट से चौंक जाती। मैं सोचती चेतन आ गया है, पर नहीं। हर बार यह मेरा भ्रम ही निकलता। सुबह मेरा इन्टरव्यू ख़राब हो गया। सवालों का मैं जवाब उल्टा सीधा दे बैठी। बाद में जब चेतन आया तो उसने तरह-तरह का बहाना बनाया, पर मैं जानती थी कि रात भर वह अपनी नई माशूका के साथ था। कुछ वर्ष बीत गए पर स्थिति में बहुत अधिक फेर बदल नहीं आया। अन्तत: मैंने चेतन को छोड़ दिया।

अब प्रश्‍न यह आता है चेतन को क्यों छोड़ा? अगर छोडऩा ही था, तो क्यों इतनी देर कर दी? इसी बात पर एक सवाल और उठता है कि क्यों बहुत-सी औरतें मर्दों को इतनी अहमियत देती रहती हैं कि उनमें तमाम ख़ामियां होते हुए भी अपना दामन उनसे छुड़ा नहीं पाती हैं? मर्दों की बेवफ़ाई के बावजूद भी उनके झूठे प्रेम के मक्कड़जाल में क्यों उलझी रहती हैं? आख़िर यह औरतों का कैसा मनोविज्ञान है?

मेरी भी जो समस्या थी, वह यह कि मैं चेतन की बेवफाई के बावजूद उसे अपने से परे नहीं झटक पा रही थी। उसकी झूठी सफाई पर भी विश्‍वास कर लेती थी। उसकी दूसरी ग़लतियों को भी नज़र-अंदाज़ कर देती थी, उसके ताने-मारने पर भी और वचन पर क़ायम न रहने के बाद भी मेरी सहेलियां मुझे बार-बार कहती रहीं, पर वाक़ई प्यार अंधा होता है।

प्यार में इतनी अंधी क्यों हो जाती हैं औरतें? बाद में मैंने देखा कि बहुत-सी युवतियां खुद को ही छलती रही हैं। एक मनोवैज्ञानिक के अनुसार औरतों के अवचेतन में कुछ ऐसा भय होता है कि कुछ चीज़ें वे नहीं कर सकतीं, इसलिए उन्हें किसी सहारे की बेहद आवश्यकता होती है।

महिलाओं को सबसे बड़ा भय यह होता है कि अकेली होती हैं वे और अकेलापन एक विपदा की तरह है, जबकि वे अच्छी तरह जानती हैं कि किसी भी स्थिति से वे अच्छी तरह निपट सकती हैं पर निपटने की सोच मात्र से वे घबरा उठती हैं। वे सोचती हैं, किसी झगड़े के बाद उन्हें मनाएगा और हंसाएगा कौन? सुनहरी चांदनी रात में किसी पार्क में उनके हाथों में हाथ डालने वाला कौन होगा? उनकी गृहस्थी का भार कौन संभालेगा या उठायेगा। उसी तरह मेरे मन में भी यही था कि अगर मैं चेतन को नहीं चाहती थी तो फिर किसे चाहती थी और वह कौन होता? ऐसा लगता है कि अकेलेपन और दूसरी अनिश्‍च‍िताओं से बेहतर है कि चेतन के जाने-पहचाने शोषण को सहन कर लिया जाए।

बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि प्रेम का यह दीवानापन या अंधापन मन में गहरे तक बैठे उद्वेग से निजात पाने का परिणाम है पर अकेलेपन का यह भय समाज की योजना बद्धता का परिणाम है।

अगर कोई पुरुष किसी स्त्री को छोड़ देता है तब उसके सामने एक भय खड़ा हो जाता है, कैसे वह अपने भोजन का प्रबंध करेगी? अपनी सुरक्षा और बच्चों की सुरक्षा और देखभाल सभी एक साथ में कैसे कर सकेगी? यद्यपि आज स्त्रियां अपनी देखभाल करने में भली-भांति से सक्षम हैं, फिर भी किसी पुरुष के बिना साथ रहने की कल्पना भी उन्हें पसंद नहीं।

इसमें आत्मसम्मान की कमी भी एक कारण माना जाता है, जो स्त्रियों की साथ रहने की मजबूरी को बढ़ावा देता है। यह एक आम तथ्य है कि कुछ औरतें नकारात्मक आत्मसम्मान के कारण अपने भागीदार से चिपकी रहती हैं। वे विश्‍वास ही नहीं कर पाती कि उससे भी बेहतर उन्हें किसी चीज़ की ज़रूरत है।

यहां तक कि जो औरतें अपने कैरियर में सफल होती हैं, उनके भी कभी-कभी ऐसे असन्तोषप्रद संबंध बने होते हैं और बार-बार घुटने के बाद भी ऐसे सम्बंधों को एक चुनौती समझकर झेलती रहती हैं। परिवार ही वह क्षेत्र है, जहां पर स्‍त्रियां नारीत्व स्पर्धा के कारण, अपने को सफल पत्‍नी या प्रेमिका सिद्ध करने में जुटी रहती हैं।

रजनी इसका एक सच्चा उदाहरण है वह आत्म निर्भर है और अच्छे व्यवसाय में संलग्न है, फिर भी वह अपने प्रेमी की आवाज़ सुनकर उस तक भागी जाती है, चाहे काम कितना भी ज़रूरी हो, भूल जाती है। उसका प्रेमी ऐसा शख्‍़स है जो उसको कोई ख़ास अहमियत नहीं देता, जो बुनियादी तौर पर आलसी है, काम करने से उसे गुरेज़ है। सबसे बड़ी परेशानी की बात यह है कि वह यदा-कदा उसको मार भी बैठता है। आख़िर कोई हद होती है। एक दिन दोनों अलग हो गए, पर इतनी यातना और दु:ख सहने के बाद भी उसके दिल में प्रेमी के साथ रहने की ललक और कसक बाक़ी रही, पूछने पर उसने बताया कि मैंने अपनी ओर से पूरी तरह यह साबित करने की कोशिश की कि मैं बहुत अच्छी हूं। सब कुछ किया मैंने। उसे फिर अपने साथ चाहती हूं और पुनर्मिलन की मरते दम तक कोशिश करती रहूंगी।

दूसरी ओर कुछ औरतें अपने पति या प्रेमी को परमेश्‍वर समझती है, इसी मानसिकता के कारण वे अपनी इच्छाएं और ज़रूरतों को भूल जाती है। रीना ने बताया कि शादी के बाद मैं अपने पति को पूरी तरह समर्पित हो गयी हूं। उनकी पसंद उनका विश्‍वास मेरा अपना है।

हम इतनी जल्दी अपने उद्देश्य और दृष्‍टिकोण को क्यों भूल जाते हैं? यह समझ से परे की बात है। पति या प्रेमी कैसा भी हो सिर आंखों में समाया होता है। एक मनोवैज्ञानिक के मतानुसार इस तरह के प्यार और समर्पण के पीछे आत्मिक भूख की संतुष्‍टि पाने का उद्देश्य होता है। बहुत-सी औरतें साथी या पति को पाकर सोचती हैं कि स्नेहात्मक समर्पण का अनुभव करने के लिए हमने ईश्‍वर को पा लिया है, जो सिर्फ़ भावनात्मक उद्वेग और प्यार का अंधापन ही है।

औरतें सक्षम हैं कि वे अपनी जीविका और ज़िंदगी की गाड़ी को खींच सकती हैं। फिर ऐसी त्रासदी से जूझने का क्या फ़ायदा? प्यार में अंधा होना जीवन में अंधकार भर देता है और हर औरत इस तथ्य को नहीं समझेगी तो सदियों तक प्यार में छली जाएगी और प्यार अंधा कहलाता रहेगा।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*