विज्ञापन कला की लेखन प्रकृति

-जसबीर चावला

‘मीडिया और विज्ञापन’ पर आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठि में विद्वानों ने कई तरह से इस विचारोत्तेजक मामले को उठा-पटक कर देखा है। कभी मीडिया में विज्ञापन, कभी विज्ञापन में मीडिया। भारत की आज़ादी के बाद ख़ास तौर पर, जब हमारे देश की औद्योगिक प्रगति के लिए यह निर्णय लेने आवश्यक थे कि नई तकनीकों को अपनाया जाए या अपनी सांस्कृतिक विशिष्टताओं को अक्षुण्ण रखने के लिए इनसे कतराया जाए, तो प्रजातंत्रीय व्यवस्था ने इसका उत्तर हां में देकर अपने दरवाज़े खोल दिए। मीडिया की हर क़िस्म पूरे ज़ोर-शोर से हमारे देखते-देखते चारों ओर व्याप्‍त होने लगी। दुनिया भर के अख़बार और रेडियो-केन्द्रों की भरमार से मीडिया की मार शुरू हुई और संचार ही संचार पूरे परिवेश में गुंजायमान हो गया। पुरानी पीढ़ी को याद है तब “विज्ञान- अभिशाप है कि वरदान” उनका प्रिय निबन्ध होता था जिसे पढ़ाते- बताते हुए वे मीडिया के गुणगान करते न थकते थे। इतने बड़े भू-खण्ड को आपस में जोड़े रखने के लिए दूर-संचार के माध्यमों को अत्यावश्यक माना जाना बहुत बड़ी ज़रूरत थी जो ‘आकाशवाणी’ की प्रभात धुन बनकर देशवासियों की दिनचर्या नियंत्रित करने लगी। आकाशवाणी के समाचार बुलेटिन और ख़बरें, क्या युद्ध, क्या शान्ति, हर हाल में जनता के चहेते बनकर उसके साथ चल रहे थे। गांव में मुखिया के घर बड़े रेडियो को सुनने वाला जमघट का दृश्य कृप्या अपने मन में लाएं तो आपको साफ़ नज़र आएगा- लेखक जो यह सब लिख रहा था और उसे पढ़ने को दे रहा था- रेडियो पर समाचार वाचक उसे अपने ख़ास अंदाज़ और लहज़े मे पढ़ रहा था। यह पढ़ने की कला बन रही थी। इसके मानदंड बन रहे थे, विकसित हो रहे थे। जसदेव सिंह की कमेंटरी को कौन भूल सकता है। रेडियो सीलोन पर बिनाका टॉप के गानों के साथ अमीन सयानी की आवाज़ आज भी पुराने लोगों को कचोटती है तो इस श्रव्य मीडिया की वह घटना भी याद आएगी कि अमिताभ बच्चन ऑडीशन टेस्ट में फेल हो गए, कला के मानक ऊंचे साबित हुए। तब तक दूर संचार की तकनीकों में पचासों सुधार हो चुके थे और हमारे मुल्क में भी रेडियो वाल्वों वाले बड़े-बड़े फिलिप्स के सेटों की जगह छोटे आयतन वाले रेडियो (ट्रांजिस्टर वाले) घर-घर सज रहे थे। अब पूरे गांव को मुखिया के घर इक्ट्ठा होने की बजाय शहर से कमाकर लौटे अपने बेटे के हाथ ट्रांज़िस्टर का इंतज़ार मंज़ूर था और क्रिकेट की कमेंटरी के लिए पान की दुकानों पर जमघट वाले दृश्य आम क़स्बों में नज़र आने लगे। चाय वाले जिस नुक्कड़ में ट्रांज़िस्टर की सुविधा होती वहां की ग्राहकी बढ़ जाती, जो बात अब तक अख़बार वाली दुकान के साथ सच थी।

       यह सब मैं इस लिए बता रहा हूं कि इनके पीछे का लेखक अब तक साफ़-साफ़ नज़र आ रहा है। आप भी देख पाएंगे कि बड़े-बड़े साहित्यक दिग्गज रेडियो से जुड़े हुए हैं। रेडियो नाटक और फ़ीचर बन रहे हैं। क्या तब विज्ञापन नहीं थे ? प्रिंट मीडिया में ख़बरों के साथ क्या सरकारी, ग़ैर-सरकारी, नौकरी-पेशा, खोया पाया, मरणे परणे, विवाह-पगड़ी आदि के विज्ञापन नहीं होते थे ? क्या बिनाका कम्पनी के साथ-साथ और भी छोटी-बड़ी कई कंपनियां अपने माल की मशहूरी इन माध्यमों से नहीं कर रही थी ? क्या तब विज्ञापन कला पर पाठ्यक्रम नहीं बन रहे थे ?

‘हां भई हां’ वाले विज्ञापनी अंदाज़ में आप जवाब देंगे, पर सामने से मैं कोई दवाई की गोली बढ़ाकर नहीं कहूंगा कि लीजिए फ़लां चीज़ और सारे दर्दों से छुटकारा….. या कि फ़लां-फ़लां फ़ायदे।

फ़ायदे तब हो रहे थे और नुक़सान भी क्योंकि यह पूरा विश्‍व. द्विगुणात्मक है-धनात्मक ऋणात्मक दोनों चीज़ें साथ-साथ मिलेंगी। नई तकनीक आयेगी, नई बातें होंगी-अच्छी भी….बुरी भी। विष भी, अमृत भी। वहां काम आता है लेखक-साहित्यकार। वह विषपायी जीव शिव का उपासक होता है- सिर्फ़ कल्याण मांगता है। अत: फ़ायदे वाली चीज़ें मीडिया को भी देता गया, नुक़सान खुद पचाता गया। जनता में संतुलन बना रहा। पर अगर लेखक का अपना अस्तित्त्व ही ख़तरे में पड़ जाए तो यह सब वह कैसे कर पायेगा ? आप इतिहास उठा कर देख लें मीडिया जब तक स्वतंत्र लेखन को ज़िन्दा रख पाया, तब तक विज्ञापन कला से समाज को आशा बनी रही और किसी असुविधा- अशांति का अहसास नहीं हुआ, स्थिति नियंत्रण में रही। धन और ऋण के बीच संतुलन बना रहा, फ़ायदे नुक़सान से अधिक। मुझे याद है 1977 में जब आकाशवाणी कलकत्ता से मज़दूरों के लिए एक वार्ता लिखने का- “ज़्यादा रही उत्पादकता में बाधक” या ऐसा ही कुछ शीर्षक था-अनुबंध मिला तो 40/- (चालीस रुपये) मिले थे। आज भी मेरे लिए वह सबसे खुशी का दिन महसूस होता है। वहीं अब लेखक जसवीर चावला को तीन हज़ार रुपए टी.डी.ए. मिलाकर बनते हैं, तो भी वह दो बार तुलना करता है। क्या लेखक की निष्‍ठा में कमी आई है ? या उसे अब पैसों की ज़रूरत नहीं रही, उसके पास इतनी दौलत आ गई है ? नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हुआ बस… परिप्रेक्ष्य बदल गया है। तब आयु वर्ग, बाज़ार में उत्पाद का स्थान, आमदनी वर्ग, दूसरी कंपनियों की रण-नीति इत्यादि कारक अगर प्रमुख हो जाएं तो सिर्फ़ विचार अकेला खड़ा रहकर क्या कर लेगा ? उसे समझौता कर अपनी प्रकृति में बदलाव लाना पड़ेगा अन्यथा कूड़े में डाल दिया जाएगा। यह ख़तरा लेखक के सिर पर चढ़कर बोलता है। उसकी मानसिकता बदलती है, प्रकृति बदलती है और वह भी बाज़ार में शामिल हो जाता है। आज हैरी पौटर का किरदार रचने वाली जे. के. रॉलिंग जब पता चलता है कि दुनिया की सबसे धनी हस्तियों में से एक है तो विधानगर के आम लेखक पर क्या बीतती है, उसे क्या प्रेरणा मिलती है ? वह अपनी निष्ठा को विचार से जोड़े कि बाज़ार से ? यह बात उसे विज्ञापन सिखाते हैं कि उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे, उसे यह किसी कंपनी का बाज़ार-तंत्र सिखाता है कि जो नमक वह खा रहा है उसमें ऑयोडीन होना चाहिए जो उसे सिर्फ़ इसी ब्रांड में मिलेगा तब तक होड़ में लगा विज्ञापन आकर बताता है कि ब्रश में लगे रोयें कैसे होने चाहिए, उन्हें दांतो में कहां-कहां पहुंचना चाहिए नहीं तो क्या होगा और उपमा में जंग लगकर ढहे मकान देखने को मिलते हैं और कई बार वैज्ञानिक माप-दण्डों को धत्ता बताकर धर्मेंद्र की मुहर दाता की मेहर से मिलकर स्टील ख़रीदने वाले लेखक को सरिए का ब्रांड खोजने को बाज़ार भेज देती है। चाहे वह विज्ञापन का लेखक है पर खुद भी तो ग्राहक है, बाज़ार का हिस्सा है और इसलिए उन सारे ख़तरों की जद में है जिसमें एक आम उपभोक्ता है जिसकी तरफ़ विद्वानों ने यहां अपने पर्चों में इशारा किया है-: स्मृति-भ्रंश, सांस्कृतिक अपभ्रंश, अपसंस्कृति फूहड़ता आदि-आदि। तो हमारा विज्ञापन लेखन भी इन ख़तरों से बचा नहीं रहता और न ही लेखक अपने को इतने अंतर्द्वन्द्वों और संघातो में संतुलित रख पाता है। बाज़ार की मार स्वाभिमानी, निरपेक्ष और स्वतंत्र लेखक को भी विज्ञापन लेखन की तरफ़ आमादा कर देती है। यह और बात है कि बेरोज़गारी का मारा न होने की वजह से संवेदनशील विज्ञापनों के बाज़ार में नहीं घुसा। पर जिस तरह विज्ञापन लेखन का परमोद्देश्य सुप्‍त इच्छाओं को जगाना, दमित इच्छाओं को उकसाना और एक ख़ास उत्पाद को इंद्रिय-जगत में घुसेड़ देना और फिर पैसे बटोरना, मुनाफ़ा कमाना बनता जा रहा है वहां लेखन की प्रकृति भी अपनी साख शब्दों के सहारे नहीं बचा सकती। किसी ऐश्वर्या की देह-यष्‍टि को अब विज्ञापन लेखक के शालीन से शालीन शब्द अभिव्यक्‍त नहीं कर सकते, न बढ़िया सा रैपर परिधान। यहां तो सौंदर्य सौष्‍ठव को खुद उछलना होगा, कमर को डोलना होगा। मेरे एक पूर्व वक्‍ता ने कल आंकड़े भी दिए थे किसी सर्वेक्षण के आधार पर कि दर्शक यही चाहते हैं। ऐसे विज्ञापन सुप्‍त इच्छाओं-दमित इच्छाओं को जबकि हवा देकर मांग में तबदील कर रहे हैं-देखना यह है कि ऐश्‍वर्या ग्राहक को हीरे की अगूंठी ख़रीदने पर मिलती है कि लक्स साबुन। पर मानव के मन का यही विज्ञान है पहचानना, तुलना करना, प्रत्यारोपण करना, संतुष्‍टि-बोध करना और फिर इच्छाओं का बदल जाना। बुलबुलों पर रंगों का मचलना, एक पतली झिल्ली पर झिलमिलाना अगर आपने देखा हो तो इच्छाओं की दुनिया को समझ लेंगे जो चित् पर अनेकानेक तरंग-दैर्ध्यों में प्रकट होती, मिटती रहती है। काश! विज्ञापन का लेखन इतनी तेज़ सृष्‍टि कर सके। कोशिश कर रहा है। पर इससे सस्ता तरीक़ा पूंजी के पास है- बारंबार दिखाओ, बार-बार बताओ, बार-बार उसी इच्छा को उकसाओ। क्या होगा ? या तो चाहत पैदा होगी या फिर मर जाएगी (बोरियत होगी)। चाहत पैदा हुई तो ठीक मांग बन जाएगी। चाहत मर जाए ऐसा तो होगा नहीं क्योंकि बीवी, बच्चे, कुत्ते और सारा ताम-झाम बीच में सम्मिलत है। कहीं से असर उठेगा तो ब्रेक में चलने वाले विज्ञापन हैं वह थोड़ी देर की इजाज़त या कहें मोहलत देते हैं कि बाकी ज़रूरी चीज़ें भी कर लें पर वे ऐसे छोड़ने वाले नहीं। पचासों चैनल हैं और अगर कुछ देखना है, जो मनपसन्द है तो केबल का शुल्क जैसे भरते हो वैसे यह हर्जाना भी भरो। इसलिए बार-बार आने वाली बलात्कार की ख़बरें या दृश्य, दुर्घटनाओं और विकृतियों के चित्र, हिंसा और दुष्‍टता के कांड बार-बार दिखने पर संवेदना शून्य बना देंगे, आपकी संज्ञा पर स्थायी नहीं होंगे परन्तु बार-बार इच्छा को ज़रूर उकसा देंगे। क्या यही वजह नहीं यौन अपराधों और बच्चों में बढ़ रही कामुकता तथा हिंसक प्रवृत्ति के प्रसार की ? विज्ञापन लेखन शब्दों के ज़रिए कैसे इसे रोकें, शब्द दृश्यों के सामने हार मानते नज़र आते हैं । वरना ‘ऐयरटेल’ के बंदर द्वारा मोबाइल चोरी वाले विज्ञापन में कौन से शब्द इस्तेमाल हुए हैं ? विज्युल्स ज्‍़यादा-शब्द कम यही मंत्र बनता जा रहा है सफल विज्ञापनों का। तो ज़ाहिर है विज्ञापन लेखन की प्रवृति भी बदल रही है, बदलती रहेगी। जैसे साइबर मीडिया में पाया जा रहा है। विज्ञापनों की सेंध इंटरनेट पर भी होनी है। वह तो स्वत: सिद्ध है क्योंकि वैश्‍वीकरण संचार के इस अति सक्षम माध्यम के बिना असंभव है तो ब्लॉग का लेखन कैसा हो ? क्या उन्हीं शब्दों और शैली से यह संभव होगा ? मोबाइल के एस.एम.एस लेखन ने तो अंग्रेज़ी बदल दी, अंग्रेज़ी की धार बदल दी तो मोबाइल पर जो विज्ञापन-संदेश आयेंगे उनकी प्रवृत्ति वही कैसे रह सकती है ? नये आविष्कार- नई शैली, नई धार। ज़रूरत है: तेल भी देख, तेल की धार भी देख।

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