उड़ान के लिए फड़फड़ाते पंख

   अरमां मचले तो थे तड़प कर रह गए।
   होंठ हिले तो थे पर  शब्द दम तोड़ गए।
वो तड़पती हुई मुसकराती गई पर उफ़ न की –    वह औरत थी।
इज़्ज़त का सवाल है।  दोनों कुलों की लाज है वो। बदनामी होगी…. श……..श………

ये फ़र्ज़ हैं तेरे, ये कर्त्तव्य हैं तेरे। औरत मां है, बेटी है, बीवी है। पर इस सब से पहले औरत एक इन्सान भी तो है। प्रकृति की अनुपम व अद्वितीय रचना है नारी। सृ‍ष्टिकर्त्ता भी पशेमान होता होगा, सोचता तो होगा अपनी खूबसूरत कृति सौन्दर्य की प्रतिमा के बारे में। सृजनहार ने नारी को अनेकों गुणों से परिपूर्ण बनाया। कितनी विविधता धारण किए हुए है नारी। कहीं वो प्रेम की मूरत है तो दूसरी ओर साहस की प्रतिमूर्ति। आज तो नारी प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती दे रही है, हर क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ रही है। हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही है पर फिर भी बहुत बार बहुगुण सम्पन्न नारी सदियों से चली आ रही पुरुष प्रधानता के आगे असहाय लगती है।

आज हवाएं बदली तो हैं सब कुछ धीरे-धीरे बदल रहा है। आधुनिक नारी अब आधुनिक वातावरण में सांस ले रही है। आज की नारी पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शिक्षित है, प्रतिभावान है। उसको प्रतिभा दिखाने के अनेकों-अनेक अवसर भी मिल रहें हैं। कानून से भी उसे सुरक्षा के तथा जीवन बेहतर बनाने के बहुत अधिकार मिल रहे हैं। सरकार ने महिलाओं की सहायता के लिए विशेष सैल, विशेष सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं लेकिन इतना सब कुछ होते हुए भी वो पूरा लाभ नहीं उठा पा रही।

क्यों अभी भी दहेज़ रूपी दानव उनको निगलता जा रहा है? क्यों अब भी एक शिक्षित लड़की हर छोटे-बड़े निर्णय के लिए अपने आप को दूसरों पर निर्भर पाती है? क्यों संपत्ति के अधिकार से अपने को वंचित करने के लिए मजबूर हो जाती है? पति के परस्त्री से सम्बन्धों पर पत्नी चुप क्यूं रह जाती है? दूसरों की इच्छा के लिए अपनी कोख में बेटियों का क़त्ल क्यूं गवारा करती है? बेटा न जन पाने के कारण क्यूं प्रताड़ना का शिकार होती है? एक शिक्षित, नौकरीशुदा दोहरी भूमिका निभा रही नारी घर व बाहर दोनों जगह अपना अपमान आख़िर क्यूं स्वीकार करती है?

इतिहास साक्षी है कि बड़ी-बड़ी मुसीबतों के आगे हमेशा नारी डटी है, उसमें साहस की कभी कमी नहीं रही, पर वो अपने साहस का प्रदर्शन किसी बड़ी मुसीबत के समय ही करती है। आमतौर पर तो वो सहम, डर, झिझक से दबी रहती है। वास्तव में उसका लालन-पालन ही इस प्रकार से होता है कि यह सब कुछ स्वभावत: ही उसमें प्रवेश कर जाता है। बस केवल पति के घर जाने के लिए तैयार की जाने वाली लड़कियों से क्या आशा? अपनी सुरक्षा के प्रति भय से ग्रसित, भावनात्मक और आर्थिक तौर पर निर्भर लड़की अपने अधिकारों को क्या जान पाएगी? वो अपने सम्मान के प्रति जागरूक कैसे हो पाएगी?

हम अपनी बेटियों को खुद ही कमज़ोर बनाते हैं। क्यूं उनको स्वावलम्बी बनने ही नहीं देते? बेटी की विदाई के वक़्त उसे दोनों घरों की लाज की दुहाई दी जाती है। क्यूं उसे मायका भूलने की सीख दी जाती है? हर अत्याचार को, हर बुराई को सहने तक की सीख दी जाती है। दहेज़ के लालची हाथों में बेटी के पहुंच जाने पर भी उसे क़िस्मत के सहारे छोड़ दिया जाता है। कानून का सहारा तब लिया जाता है जब देर हो जाती है।

औरतें लड़कियों को अपनी सहनशीलता के क़िस्से सुना-सुना कर ससुराल जाने के लिए तैयार करती हैं। अपनी सहनशीलता पर इस प्रकार गौरवान्वित होती हैं जैसे दासी बन कर रहना, ज़ुल्म सहना ही नारी जीवन की सार्थकता हो। महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन बनती है। उन्हें ज़ुल्म व अन्याय का सामना करने की शक्ति कदापि नहीं दी जाती। केवल भाग्य के सहारे बैठे रहने से तो काम नहीं चलता।

लम्हा-लम्हा मरते हुए ज़िन्दा रहना, ज़िन्दगी से क्यूं इस तरह शर्मिंदा रहना।

नारी हमारे समाज की सर्वशक्तिमान सत्ता है। उसकी सहनशीलता का ग़लत फ़ायदा उठाया जाता है। नारी को अपने अधिकारों का हनन होने पर आवाज़ उठानी चाहिए। वो किसी की दासी नहीं उसे हर तरह से बराबर अधिकार है उसे अपने अधिकारों के बारे में सजग होना होगा। हक़ कोई किसी को देता नहीं, हक़ अपने साहस के बल पर खुद लेने पड़ते हैं। निराशा ही भारतीय नारी की नियति न रहेगी। ग़ुलामी की जड़ें तो टूट चुकी हैं, रास्ते मिल चुके हैं फिर भी अभी कई काम बाक़ी हैं, कई संग्राम बाक़ी हैं। झूठे सम्मान की बलि चढ़ती जा रही ये सोने के पिंजरों में क़ैद नारियां पिंजरे के दरवाज़े तक तो आ पहुंची हैं बस इक उड़ान भर की देरी है। कुछ करने की चाह हो तो वक़्त से इजाज़त नहीं मांगी जाती। न घरवालों से, न बाहरवालों से सहयोग की आशा। मंज़िलें उन्हीं को मिलती हैं जो सफ़र को पैरों की तक़दीर बना लेते हैं। आंच से डरा नहीं करते आग को हाथों पे टिका लेते हैं। चांद-तारे उन्हीं को सजदा करते हैं जो आसमानों को झुकाने की जुर्रत करते हैं।

तमन्नाएं हैं हौसले हैं राहें भी साथ ही तो हैं
मंज़िल है बहुत दूर फिर भी पास ही तो है
गुम हुई मुस्कराहटों को ढूंढ़ लाएंगे
अकेले नहीं है चलना कारवां बनाएंगे।

-सिमरन

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