बदलते मौसम

परिवर्तन संसार की रीत है। इतिहास साक्षी है जब-जब भी परिवर्तन हुए हैं इनके आगे रुकावटें भी आती रही हैं, तोहमतें भी लगती रही हैं पर परिवर्तन तो हो कर ही रहे हैं। कोई खोज अंतिम नहीं, कोई सच अंतिम नहीं। प्रयत्न भी होते रहेंगे, परिवर्तन भी होते रहेंगे। थके-हारे व्यक्ति ही पुराने विचारों के साथ जुड़े रहते हैं। कमज़ोर व्यक्ति परिवर्तन से आने वाली चुनौतियों से डरते रहते हैं। अब जब युग बदला है तो हवाएं भी बदलने लगी हैं। कुछ ऐसे परिवर्तन आए हैं जो अपने साथ लाए हैं तड़प, कसक, तमन्नाएं, इच्छाएं, विद्रोह।

इस खूबसूरत ज़मीन में हव्वा का अधिकार बराबर था पर आसमान की तरह फैलने की चाह में पुरुष ने बहुत-सी ज़मीन पर खुद ही क़ब्ज़ा कर लिया। बहुत-सी आंखों की नमी तड़पती मुसकुराहटों में छिपाने की कोशिश होती रही है। इच्छाओं को अपने अन्दर ही दफ़न करके होंठ सी लिए गए क्योंकि ऊंची आवाज़ पुरुष प्रधान समाज को क़बूल न थी। लेकिन जब दबी हुई चिंगारियां धधकने लगती हैं तो ज्वालामुखी फटता है, ज़लज़ले आने लगते हैं जब बरसों की चुप्पी टूटती है तो गूंज देर-देर तक, दूर-दूर तक सुनाई देती है। अब औरत की चुप्पी टूट चुकी है। सीख चुकी है वो अन्याय के ख़िलाफ़ बोलना, अत्याचार के ख़िलाफ़ खड़े होना। जानने लगी है वो कानून की किताबों में क़ैद अपने अधिकार। अपने अधिकारों को जानना चाहती है और जितना जाना है उतनी ही उसकी तड़प और बढ़ी है, क्योंकि ‘उसने गर जाना तो सिर्फ़ इतना जाना है कि उसके अधिकार उसके नहीं हैं, उसके हक़ उसके नहीं हैं।‘

क्यूं ? आख़िर क्यूं ……….???

ज़िम्मेदारियां, फ़र्ज़ जैसे बहुत शब्द सुनते रहे हैं अपने हिस्से के सभी फ़र्ज़ सदा निभाते रहे हैं। अब हम अपने हक़ों की बात करेंगे। जो हक़ हैं हमारे वो ले के रहेंगे।

आजकल महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद की है। कई आंदोलन चलाए गए हैं लेकिन क्या ये आंदोलन पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को बदल पाएंगे? पिता की संपत्ति में बराबर की हक़दार कितनी बेटियां इस कानून का फ़ायदा उठा पाई हैं? मायके और ससुराल में ‘एक अपना घर’ तलाशती औरत ने घर वालों को श्रद्धा भी दी, पति को मासूम प्यार भी दिया। मगर खुद अपने वजूद की तलाश अभी जारी है।

अपनी शख्सियत को संवारने के लिए, अपने व्यक्तित्व को निखारने के लिए उसने जब-जब घर से बाहर क़दम बढ़ाए उसे जगह-जगह भेड़िये मिले। दुस्शासनों ने उसका राह रोका। जब भी वो घर से बाहर आई उसके रहे-सहे हक़ भी छीनने के प्रयत्न हुए। कामकाजी औरतें अपने पक्ष में कितने ही कानून होने के बावजूद अकसर अपने अधिकारों से वंचित ही रह जाती हैं।

अन्याय सहना भी अन्याय करने के समान ग़लत है। इसलिए नारी को हर अन्याय का डट कर मुक़ाबला करना होगा। हम विकास के मार्ग पर अपनी संस्कृति को साथ लेकर बढ़ेंगे।

अब समय ने करवट बदली है। समय ने बदलते-बदलते बहुत समय लगाया, लेकिन बदलाव आया ज़रूर है। अब उतनी बंदिशें नहीं हैं न ही उसमें जीने की किसी की चाह है पर सदियों से चली आ रही रिवाज़ों की रिवायतों को एकदम तोड़ पाना सही नहीं और संभव भी नहीं। संस्कारों को निभाते हुए अपनी ख्वाहिशें पाने की कोशिश ज़रूर होगी। कर्त्तव्यों से हटना नहीं अधिकारों को छोड़ना नहीं।

-सिमरन

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