रिश्तों के रंग

कहते हैं इन्सान इसी दुनिया में स्वर्ग और नर्क के दर्शन कर लेता है और हमने यह दर्शन किए हैं अलग-अलग रिश्तों के रूप में। कभी मां की ममता के रूप में स्वर्ग देखा है तो कभी बहन-भाई के निश्छल प्यार के रूप में, कभी दोस्ती के निर्मल प्रेम के रूप में, तो कभी दो दिलों की पाकीज़ा मुहब्बत के रूप में। यह खूबसूरत रिश्ते ही तो हैं जो दुनिया को रहने लायक़ बनाते हैं। खूबसूरत रिश्तों का मीठा अहसास ही हमें इसी दुनिया में अलौकिक आनंद की अनुभूति कराता है।

बदलते ज़माने में जहां हर तरफ़ बदलाव आया है, वहां रिश्तों में भी बदलाव आया है। इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी ने छीन लिए हैं मासूम बचपन, मासूम हंसी, निश्छल दोस्ती, मुहब्बत और प्रेम के पाकीज़ा रिश्ते। कहने वाले तो कहते हैं कि बदलाव ऐसा भी नहीं आया – वही इन्सान, वही नाते, वही मज़हब। हां सच ही तो है अब भी वैसे ही इन्सान धरती पर जन्म लेते हैं, अब भी उतने ही रिश्ते बनते हैं, अब भी मज़हब बरक़रार हैं बस अंतर तो केवल इतना ही आया है कि ईमान चला गया है।

जहां खूबसूरत रिश्ते मन को तृप्त करते हैं वहीं कुछ रिश्ते इतने घिनौने होते हैं जो मन में कटुता भर देते हैं। हमने देखे हैं कुछ ऐसे रिश्ते जिन्होंने हंसती-खेलती ज़िन्दगियों को नारकीय जीवन जीने को मजबूर किया है। ऐसी जननियां जिन्होंने अपनी कोख में ही अपनी औलाद का खून होना गवारा किया, ऐसे बाप जिन्होंने अपनी बेटियों को हवस का शिकार बनाया। ऐसे भाई जिन्होंने अपने हाथों भाई का खून कर दिया या बहन के प्रेमी का क़त्ल कर दिया। हमने भाभी की तरफ़ उसकी गोद में पले देवर की हवस भरी उठती निगाहों को भी देखा है। ऐसी नारकीय ज़िन्दगी जीने को मजबूर होने वालों के लिए तो रिश्तों के मायने ही समाप्त हो गए और वह हर रिश्ते को शक भरी निगाह से देखा करते हैं। हमने ऐसे इन्सान भी देखे हैं जिनके सभी सगे-संबंधी किसी न किसी त्रासदी का शिकार हो गए और वे अकेले बिना किसी रिश्ते के भी ज़िन्दगी जिए जा रहे हैं। उनके पास उनके घर, उनकी दीवारें ही रह गई हैं जो उनके सुख-दु:ख की संगी-साथी हैं।

लेकिन कुछ इन्सान ऐसे भी हैं जिनके रास्ते कोई त्रासदी, कोई विपत्ति रोक नहीं पाए। जो अकेले ही चल पड़े हैं और ऐसे एकाकी लोगों का हाथ थाम कर उनको भी फिर चलना सिखाया, दूसरों के दु:ख दर्द को अपना लिया। यहां कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने तमाम दुनिया के दु:खों से अपना रिश्ता जोड़ रखा है। वो जिधर भी चलते हैं लोगों की मुहब्बत, लोगों के दर्द उनके साथ चलते हैं। उनके लिए रिश्तों के मायने बहुत बड़े हो जाते हैं। उनका रिश्ता समस्त संसार से जुड़ जाता है। सारे देश, सारे धर्म सभी उनके अपने हो जाते हैं।

ऐसे ही इन्सानों के कारण आज भी दुनिया में इन्सानियत क़ायम है। इस बदलते युग में भी हमारी ज़िन्दगियां खुशगवार हो सकती हैं। ज़रूरत है अपने अंदर भगवान् द्वारा बख़्शी इन्सानियत की ज्योति को पहचानने की। हम भटक ज़रूर गए हैं। लेकिन फिर भी यह सत्य है कि हमें भगवान् ने इन्सानियत से नवाज़ा है। किसी शायर ने सच ही तो कहा है:-

आदम को खुदा मत कहो, आदम खुदा नहीं,
लेकिन खुदा के नूर से, आदम जुदा नहीं।

-सिमरन

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