ज़िंदगी चलने का नाम

नहीं चलना चाहती लगातार।
कभी-कभी रुकना चाहती हूं।
ठहरना चाहती हूं।
कहते हैं कि यदि आप अच्छा सोचते हैं अच्छा करते हैं या अच्छा करने की ओर क़दम बढ़ता है तो कभी थकते नहीं।
लगातार चलते हैं। कभी भी मन खिन्न नहीं होता सदा प्रसन्न चित्त रहता है।
लेकिन मैं तो थक भी जाती हूं मन भारी भी होता है। लगातार चल भी नहीं पाती।
कभी-कभी सोचती हूं तो पाती हूं कि जो कभी थका नहीं क्या वो वास्तव में चला भी होगा?
जो कभी दु:खी नहीं हुआ क्या वो ज़िंदगी की असलियत से वाक़िफ़ है।
ज़िंदगी का अर्थ ही है सुख, दु:ख, आशाएं, निराशाएं, तकलीफ़ें।
जब चलोगे तो थकोगे भी। कहीं-कहीं मन भारी भी होगा।
भगवान् ने हमें संवेदनाएं दी हैं। यह कैसे होगा कि हम किसी दु:ख को, परेशानी को महसूस ही न करें।
खुद की तकलीफ़ नहीं तो किसी दूसरे की तकलीफ़ भी कभी-कभी आहत कर जाती है।
ज़िंदगी चलते जाने का नाम बेशक है लेकिन अगर मन भारी हो तो रुकना भी चाहिए।
थोड़ा ठहराव, थोड़ा विश्राम।
ठहरो लेकिन ठहरने के लिए नहीं दोबारा चलने के लिए।
कुछ भूलना पड़ता है, कुछ छोड़ना भी पड़ता है।
कभी-कभी दिशाएं ही बदलनी पड़ती हैं।
यदि बीच रास्ते पर भी लगे कि ग़लत रास्ते पर जा रहे हैं तो दिशा बदलना बेहतर होता है।
दोबारा चलने से पहले ऐसा सब छोड़ दो जो मन में रखने के क़ाबिल ही नहीं। जो मन को बार-बार बोझिल करे।
कभी-कभी छोड़ना मुश्किल हो जाता है। पर फिर भी छोड़ना तो है।
मन में नई ताक़त भरो, नई ऊर्जा ताकि पहले से अधिक तेज़ी से बढ़ सको।
आपकी पूरी ताक़त आपके मन में ही होती है।
किसी भी बात से, किसी भी असफलता से, निराशा से उबरने के लिए मन को मज़बूत करना होता है।
कभी-कभी दोस्तों का, मां-बाप का, भाई-बहन का सहारा मिलने से आसान हो जाता है।
लेकिन फिर भी मन को मज़बूत करने के लिए खुद ही कोशिश करनी पड़ती है।
सिद्ध पुरुषों द्वारा कही बात कि मन में भगवान् निवास करते हैं सुनती थी तो अजीब लगता था।
लेकिन आज जैसे समझ में आने लगा है उनका आशय।
मन में भगवान् होने का अर्थ यह नहीं कि वो हमारे मन में बैठे हुए हैं हमने उनसे वार्तालाप करनी है।
मन में भगवान् होने का अर्थ शायद मन की ताक़त से है।
जब आप अपने अंदर छुपी हुई ताक़त को पहचान पाते हैं, जगा पाते हैं तो हर निराशा से, हर असफलता से उबरना आसान हो जाता है।
तुम निराश हुए, हताश हुए, असफल हुए तो कुछ अजीब नहीं हुआ, कुछ ग़लत नहीं हुआ।
यह इन्सानियत की, ज़िंदगी की पहचान है।
लेकिन इस सब से उबरना तुम्हारे अन्दर की ताक़त पर निर्भर है।
तुम्हारे लिए नहीं है यह कालिमा, यह अंधेरा। जब जागो तभी सवेरा।
उठो नई राहें हैं, नए सफ़र, नई प्रभात, नया उजाला।

-सिमरन

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