पैग़ाम-ए-मुहब्बत

ज़िन्दगी एक इबादत है। पूज्य है इन्सानियत। आदमीयत के लिए दिलों में मुहब्बत ज़िन्दगी को जीने लायक़ बनाती है। दुनिया बनाने वाले ने कितनी खूबसूरत दुनिया का, कितनी हसीन ज़िन्दगियों का तसव्वुर किया होगा।

जहां लोगों में एक दूसरे के लिए स्नेह हो, श्रद्धा हो, वहीं तो पूज्यस्थल है।

स्नेेह, श्रद्धा और मुहब्बत का वास्ता समर्पण से है लेकिन आज मानव भौतिकवादी हो चला है। जैसे-जैसे वो तरक्क़ी करता गया साधनों में इज़ाफ़ा होता गया और मानव पदार्थवाद की ओर बढ़ता गया। समर्पण का स्थान लिया स्वार्थ ने। निज का स्वार्थ पूरा करने में अंधा हुआ इन्सान इन्सानियत से दूर होता गया। असीम आनन्द की प्राप्‍ति के साधन तो प्राप्‍त हुए। लेकिन स्नेह, श्रद्धा और मुहब्बत का स्थान लिया घृणा, स्वार्थान्धता, उग्रवाद, साम्प्रदायिकता और युद्ध ने। विश्व बन्धुत्व की आवाज़ को धुंधला करते हैं गड़गड़ाते हुए बम, धरती को रौंदते टैंक और छलनी करती गोलाबारी।

बस ज़रा इतना सा बता दो
फ़ायदे में कहां कौन रहा
बम हम पर गिरा या उन पर
नस्ल-ए-आदम का खून बहा
अमन-ए-आलम का खून बहा

जब विनाश की लीला समाप्‍त होती है तो बमों की गड़गड़ाहट और बारूद की गंध से राहत मिलती है धरती को। लेकिन पीछे छूट जाते हैं मरने वालों का मातम मनाने वाले कुछ लोग, बच जाते हैं कटे-फटे लोग जो मजबूर हो जाते हैं आधी-अधूरी ज़िन्दगी जीने को और बचते हैं भूख से बेहाल लोग। हार के सोग में इन्सानियत तिलमिलाती है, परन्तु जीत के जश्‍न भी कहां शहीदों की विधवाओं के आंसू सोख पाते हैं।

आज नफ़रत के बादल गहराए हैं लेकिन कल फ़िज़ा कुछ और होगी। हमें विश्‍वास है नया ज़माना आएगा। जब दुश्मनी के प्रेम से जवाब दिए जाएंगे। इस पावन धरती पर नया मधुर संगीत पैदा होगा जो संपूर्ण मानवता को नई बहार देगा, नई दिशाएं देगा। पूरा संसार विश्‍व बंधुत्व की भावना से संलिप्‍त दिखाई देगा।

भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है कोई नहीं जानता। होनी को कौन टाल सकता है। हमारा पैग़ाम तो सिर्फ़ मुहब्बत है।

-सिमरन

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