अपना घर

इक्कीसवीं सदी की दहलीज़ पर ठिठक गया विश्‍व पुरानी परम्पराओं के नूतन नाम सोच निकालने की कशमकश में जकड़ा हुआ लगता है। अपने घर से बाहर क़दम रख चुकी भारतीय नारी इन परम्पराओं को बदलने के भ्रम में जी रही है। बाहर की दुनिया में जूझने को निकली ये नारी अभी तक अपने घर के बारे में ही भ्रमित है। ‘अपना घर’ एक ऐसा नाम जो आज तक भारतीय नारी के लिए रहस्य मात्र से बढ़कर कुछ नहीं। अभी बचपन खेलने कूदने में मशग़ूल था कि पाबंदियों का जाल फैलना शुरू हो गया। “लड़कियां ऐसे उछलती कूदती अच्छी नहीं लगतीं। ‘अपने घर’ में भी क्या ऐसे ही करोगी?” जवानी की दहलीज़ में क़दम रखा, हसरतों ने अंगड़ाई ली। आज पहली बार मां की सुर्खी उठा होंठों पे लगाई। मां ने लाड़ से समझाया, “यह बनाव सिंगार तो अपने घर जा कर ही करना। यहां यह सब शोभा नहीं देता।” फिर हुआ एक कठिन परीक्षा का प्रशिक्षण शुरू- “यूं पल्लू संभालो, यूं सिर ढांपो, यूं चलो, यूं बैठो, यह करो, वह न करो। अपने घर में भी क्या ऐसे ही करोगी? यहीं से सब सीख कर जाओ।” इस तरह से लड़की के ख्यालों में, ख्वाबों में, ‘अपने घर’ की अनेकों रेखाकृतियां, अनेकों रंग बनते मिटते रहे। मायका तो मानो एक सराय हो गया या फिर कोई ट्रेनिंग सैंटर। जहां पर बस कुछ समय रहना है, सीखना है और प्रशिक्षण समय पूरा हो जाने पर उस जगह चले जाना है, जो वास्तव में उसका ‘अपना घर’ है यानि ससुराल। सजी संवरी आंखों में अनेकों सपने संजोए लड़की ने नई दहलीज़ पर क़दम रखा और सोचा, “आख़िर मैं ‘अपने घर’ आ ही पहुंची।” दो चार दिन शगुन हुए, सास-ससुर ने चाव दिखाए, ननद-देवर ने शरारतें कीं, लाड़ जताए और फिर एक नया सिलसिला। कानों में कुछ ऐसे स्वर गूंजे कि दिल-दिमाग़ में बिजली कौंध गई। स्वर कुछ यूं थे, “क्या यही सीख के आई है अपने घर से? यह नख़रे अपने घर दिखा आई है, पर यहां नहीं चलेंगे। अपने घर में भी क्या ऐसे ही करती थी?” सर चकराया, “तो क्या यह घर भी अपना नहीं?” वहां दिन बीते थे, अपने घर के सपनों में और यहां दिन बीतेंगे, अपने घर की यादों में। जबकि अपना तो कोई भी न हुआ। यही तो दुविधा है। ज़िन्दगी के पहले चंद सावन बेचारी अपने घर की कल्पना में जीती रहती है और शेष ज़िन्दगी इस उलझन में बिता देती है कि आख़िर ‘अपना घर’ कौन-सा है ? यूं इस प्रश्न का उत्तर तो सदियों पहले भी रहस्य ही था और आज भी रहस्य ही है।

कितनी हैरतअंगेज़ बात है कि ‘शादी’ शब्द को लेकर इतने सारे भावनात्मक प्रतिद्वंद्व होने के बावजूद यह एक ऐसा नाम है, जो प्रत्येक तरुणबाला के मन-मस्तिष्क पर अनेकों सुनहरे स्वप्न, अनेकों रंगीन छवियां व अनेकों तिलिस्मी ख्याल छोड़ जाता है। ऐसा क्या है इस नाम में कि प्रत्येक क़िस्म के प्रतिबंधों के बाद भी वो इस नाम पे शर्माती है, सकुचाती है, भावविह्वल हो जाती है, किसी स्वप्न लोक में खो जाती है।

कितनी सुखद है यह कल्पना कि प्रत्येक युवती विवाहोपरान्त वे सारी खुशियां हासिल कर सके, वे सारे सपने सच कर सके, वे सारे वादे निभा सके, वे सारे इरादे परवान चढ़ा सके, जिनकी कल्पना उसने विवाहपर्यंत की थी। क्यों न उसे एक ‘अपना घर’ पहचानने की दुविधा में न डाल, दोनों ‘अपने घर’ वरदान में दे दिए जाएं।

-सिमरन

One comment

  1. Gurcharan Badhan

    बहुत बडीया सीख व समाज को सवाल भी,सोच समाज को बदलनी ही पडेगी ,सवाल िफर वही पहल कौन करेगा? पहल हमे ही करनी होगी ! लडकी तो दोनो घर रौशन करती है िफर कयो उसका कोई घर नही? यह ही ऐक बडा सवाल है????????????

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