मुक्‍ति नहीं अधिकार

बदले समय, बदले परिवेश में बदली है पुरुष मानसिकता भी। पुरुष की शिकायत पर यदि ग़ौर करें तो-समय की नब्ज़ को पहचानते हुए अपने क़दम उठाने के बावजूद, औरत के लिए सहयोगी रवैया अपनाने के बावजूद आज भी उसे शंका से देखा जाता है।

दुविधा में है समाज आज। समय-समय पर स्त्री -पुरुष संबंधों पर विचार मंथन होता आया है। यह गुत्थी जितनी विचारों के अधीन होती है सुलझती नहीं उलझती जाती है।

औरत कई रिश्तों के साथ मर्द के अंग-संग चलती है। मर्द-औरत के सभी रिश्तों की खूबसूरती अपने आप में इस कुल जहान की मुक़म्मलता है। ये खूबसूरत रिश्तें सुगंधित माहौल का सृजन करते हैं। लेकिन इन्हीं रिश्तों की खुशबू जब अलोप हो जाती है, जब इन रिश्तों के बीच की पवित्रता, मुहब्बत, संवेदना समाप्त हो जाती है तो यही रिश्ते संताप सहते हैं।

स्त्री को एक लम्बे समय से शंकाओं के घेरे में रखा जाता रहा है। उसकी समझदारी को कम करके आंका जाता रहा है। यही नहीं उसके गुणों को भी उसके अवगुण माना गया। ऐसी दुविधा में फंसी नारी हमेशा जूझती रही।

आज औरत ने पुरुष के अवगुणों पर उसकी बुराइयों पर अंगुली उठा दी। महिलाओं ने आंदोलन चलाए पुरुष के असली चेहरे को नंगा करने के लिए ऊपर चढ़े नक़ाब को उघाड़ फेंका। पुरुष को बदलने को मजबूर कर दिया। परिस्थिति से समझौता कर पुरुष बदला भी। उसके औरतों के और समय के अनुसार ढलने के प्रयत्न के बावजूद औरत की नकारात्मक धारणा बदल नहीं पाई। पुरुष के बारे में महिलाओं ने आम धारणा क़ायम कर ली है कि वो कठोर होते हैं, धोखेबाज़ होते हैं। जबकि सभी पुरुष एक समान तो नहीं होते लेकिन अति संवेदनशील पुरुष को भी इस नकारात्मक रवैये का शिकार होना पड़ता है। जबकि वो सदा महिलाओं के सहयोग के लिए तत्पर रहते हैं।

आज तेज़ी से बदल रहे समय में बहुत विविधता आई है, विशालता आई है। साथ ही साथ दुविधाएं भी बढ़ी हैं। आज असमंजस की स्थिति है। आज एक ओर तो पुरुष असमंजस की स्थिति में है। बदले समय में कोई पुरुष तो अपने को बदल पाया है कोई अपने पुरुष होने के अहं से बाहर ही नहीं निकल पाया। नारी के बदले तेवर और नारी की नित दिन की नई उपलब्धियां उसके लिए चुनौती बन गई। आज जब नारी की समस्याओं, मांगों और अधिकारों की ओर तवज्जों दी जानी शुरू हुई है। ऐसे वक़्त में पुरुष की समस्याएं गौण होती जा रही हैं। ऐसी स्थिति में उसका तिलमिलाना ज़ाहिर-सी बात है।

वहीं दूसरी ओर नारी का संघर्ष कम नहीं हुआ, बढ़ा ही है। आज आर्थिक ज़रूरत होने के कारण या फिर अपने व्यक्तित्व के निखार के लिए उसका घर से बाहर निकलना आवश्यक हो गया है। लेकिन एक सत्य यह भी है कि जब-जब उसने घर से बाहर क़दम बढ़ाए उसे जगह-जगह भेड़िए ही मिले। दुस्शासनों ने उसकी राहें रोकी। अब तो उसके जीने के रहे-सहे अधिकार भी छीनने के प्रयत्न होने लगे हैं। नौकरीशुदा होने के बावजूद घर की पूरी की पूरी ज़िम्मेदारी उसे स्वयं उठानी पड़ती है। मशीन की तरह दिन-रात खटने के बावजूद उसे घर और बाहर अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाता। अपनी इस हालत पर तिलमिलाती है वो, ऐसी अवस्था के बारे में सोचती है वो कि स्वतंत्रता के नाम पर उसे क्या मिला? क्या यही है आर्थिक स्वावलंबी होना?

आज बहुत-सी ऐसी बातें हैं जिन पर सोचने को विवश हैं हम और जिन पर ध्यान दिलाना ज़रूरी है। दुविधा की, असमंजस की स्थिति है। सबसे पहली बात तो यह कि कानून की किताबों में क़ैद नारी के अधिकार नारी के क्यूं नहीं? उसके हक़ उसे मिलते क्यूं नहीं? दूसरी बात यह है कि वो अधिकार चाहती है मुक्ति नहीं। मुक्ति के नाम पर मुक्त संबंधों की कोई वकालत नहीं। एक और बात जो नारी अधिकारों को पेचीदा बनाती है वो है स्वतंत्रता के ग़लत मायने निकालना। बेहूदा कपड़े पहनना, बेहूदा बोलना, नाजायज़ संबंध स्वतंत्रता के सही मायने नहीं हो सकते। यदि महिलाओं को मिलने वाले हक़ों का ग़लत फ़ायदा उठाकर पुरुष पर अत्याचार होते हैं तो उन्हें नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन यहां यह भी सोचना होगा कि ऐसे मसले जहां पुरुष समाज के लिए समस्या है वहीं सही दिशा में कार्य में लगी औरतों पर भी अंगुली उठती है। उनके लिए बहुत बड़ी बाधा है।

इसके इलावा हमारे समाज में यदा-कदा, चाहे-अनचाहे और भी ऐसे कई मसले उठते रहते हैं जिनके कारण महिलाएं अचानक शक के घेरे में आ खड़ी होती हैं। अभी पिछले दिनों लड़कियों की सेक्स में बढ़ती रुचि पर सर्वे किया गया। किसी भी सर्वे का लीगल होना, उसकी मान्यता किस बात पर आधारित होती है? हल्की पब्लिसिटी के लिए किए गए ऐसे सर्वे जो सत्य की कसौटी पर सही हैं या नहीं कहना नहीं चाहूंगी। लेकिन यह गांवों की या साधारण घरों की लड़कियों की प्रगति में बड़ी बाधा हो सकती है। यह सही है या नहीं यह सोचने का विषय है। यहां मैं एक बार फिर से कहना चाहूंगी कि कुछ एक ग़लत रास्ते पर चल निकली सो कॉलड-बोल्ड महिलाओं के कारण बाक़ी सब की राहों को पेचीदा न बनाया जाए।

जहां ऐसी बातें महिलाओं को शंकाओं के घेरे में लाती हैं वहीं यहां एक और बात भी बार-बार दिमाग़ में कौंधती है जो पुरुषों पर शंका करने को मजबूर करती है वह है औरतों के उत्पीड़न की घटनाओं में बढ़ोतरी। कथित प्रेमियों के क्रूर मसले, दहेज़ के मसले, बलात्कार के मसले दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं। इस बात पर बहुत बार सोचा, बार-बार सोचा, एक बात जो दिमाग़ में आती है कि क्या ये मसले बढ़े हैं या अब प्रकाश में आने लगे हैं? ख़ासतौर पर यदि बलात्कार के मामलों पर ध्यान दें। बलात्कारी बढ़ रहे हैं या पहले पर्दाफ़ाश नहीं होता था? क्या अब औरतें इस बारे में बोलने का साहस करने लगी हैं? हम सही दिशा में जा रहे हैं या दुविधाएं बढ़ रही हैं। क्या कहूं क्या न कहूं? अजीब कशमकश में हैं आज।

औरत के साहस के बारे में तो बार-बार कहा गया है यह एक अच्छा संकेत हो सकता है लेकिन बावजूद इसके यह सब कहीं कम होता दिखाई नहीं देता।

आज बहुत-सी बातें जैसे दहेज़ का मसला, हर मसले पर औरत की निर्भरता, पतियों की बेवफ़ाई, कोख का क़त्ल, ससुराल वालों व पति से प्रताड़ना, घर व बाहर से अपमान, प्रेमियों की क्रूरता और इस सबसे बढ़कर अपनों परायों द्वारा नित दिन बलात्कार की शिकार-बच्चियां, युवा, प्रौढ़, और वृद्ध औरतें। इन सब बातों पर सोचोगे तो पाओगे पुरुष शंका से मुक्त क्यों नहीं? मर्द को शंका की दृष्टि से देखने का औरत का कोई शौक़ नहीं। पर ये नित दिन की घटनाओं के कारण खुद-ब-खुद नारी को शंकाएं घेर लेती हैं। उसके लिए भी हर वक़्त शंका ग्रस्त रहना कोई खुशी की अवस्था नहीं। जब तक यह मसले क़ायम रहेंगे पुरुष-स्त्री संबंध शंका के कटघरे में रहेंगे। जब तक औरत को अपेक्षित सम्मान नहीं मिलेगा, उसका अस्‍तित्त्व स्वीकार्य नहीं होगा पुरुष अहं पर अंगुलियां उठती रहेंगी। आज शिक्षित पुरुष व्यवहार कुशल होने के बावजूद बेशक बाहरी तौर पर औरतों के अधिकार का समर्थक नज़र आता है। पर यह सब बातों तक ही सीमित है। वास्तविकता तो यह है कि उनका अहं पुरुष के समान स्तर पर नारी के आने का विरोध करता है। पर फिर भी उनकी सोच में अंतर तो आया ही है। आने वाला समय रही सही धुंध को भी साफ़ करेगा। यदि प्रयत्न दोनों ओर से समझदारी और ईमानदारी से हो सकें। आमीन…….।

-सिमरन

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