समय का सच

जो आज हमारे लिए सत्य है वो कल भी सत्य माना जाए, यह आवश्य‍क नहीं। सत्य को जानना, पहचानना और उसकी पहचान करवाना इतना आसान नहीं होता है। किसी सत्य को पहचान कर उसकी पहचान करवाने में एक लम्बा संघर्ष होता है। इसी संघर्ष का प्रयत्न किया है सरोपमा ने। एक सदी से दूसरी सदी में प्रवेश करते हुए सरोपमा ने समय के झरोखे से झांक कर देखा वही समस्यांएं, वही दुविधाएं ढोते हुए हम अगली सदी में प्रवेश कर गए। कैलेंडर की तारीख़ों में नई सदी के अंकों के अलावा कुछ भी तो परिवर्तन नहीं हुआ।

यह बात सोचनी होगी कि क्या इन समस्याओं को हम इस सदी में भी यूं ही ढोते रहेंगे? ग़रीबी, पिछड़ेपन, अनपढ़ता, भ्रष्टाचार इत्यादि की समस्याएं जो हम ज्यों की त्यों नई सदी में ले आए हैं, उसके बारे में सोचना होगा। आज स्वाधीनता के इतने वर्षों बाद भी फुटपाथों, गन्दी बस्तियों और टूटी छतों के नीचे हमारे देश का भविष्य भूख, बीमारी और ग़रीबी से बिलख रहा है, उसके बारे में विचार करना होगा। घपलों, घोटालों के आगे हम यूं ही नहीं समर्पण करते रहेंगे। हमें यह इन्तज़ाम करना होगा कि धर्म के नाम पर उन्माद न फैले। धार्मिक ग्रंथों, बीड़ी एवं गाय के सिरों पर होने वाले दंगे दोहराए न जाएं। आधुनिकता एवं पश्चिमीकरण के नाम पर डिस्को और केबल संस्कृति को अपना रहे युवा वर्ग, अपनी मर्यादा खो रहे युवा वर्ग पर भी दृष्टि डालनी है।

साहित्यकार सत्या को दृष्टव्य बनाता है। लेखकों ने, कवियों ने, कलाकारों ने सदा-सदा समाज के मुखौटे उतार कर चेहरे नंगे किए हैं। जहां साहित्यकार का कर्त्तव्य वर्तमान की ओर ध्यान दिलाना है वहीं उसका कर्म है भविष्य को संवारना। साहित्यकार समाज से सौ-सौ क़दम आगे का सपना लेता है। साहित्य ही है, जो समाज को सपने देखने लायक़ बनाता है। साहित्यकार सत्ता द्वारा बनाए ख़्वाबों के भ्रम ख़त्म कर वास्तविकता से अवगत कराता है और नए सपने सजाता है। वो आने वाले युगों के लिए चिंगारियां संभाल छोड़ता है, जो भविष्य में रौशनी दे सकें।

वर्तमान हमेशा-हमेशा ही आशा की चिंगारियों से जीवित रहता है। यही चिंगारियां भविष्य में आने वाले अन्धेरों को रौशनाती हैं।

आज तेज़ी से परिवर्तित हो रहे समाज में बहुत विविधता आई है, विशालता आई है। साथ ही साथ दुविधाएं भी बढ़ी हैं। चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत, नृत्य और कलाकारों की दुनिया में बहुत से नए द्वार खुले हैं। ऐसे समय में साहित्य के लिए भी नए आयाम खुले हैं। यही सही समय है साहित्यकारों के लिए। आज, इस समय में, आज के सत्य को पहचानना होगा और वास्तविकता के बारे में अवगत कराने के हौसले बनाने होंगे। कुछ नए सृजनात्मक क़दम उठाने होंगे। भविष्य के वारिस होने का सबूत हमें देना होगा। कुछ ऐसा कर गुज़रना होगा कि युगों-युगों तक संभाल कर रखने योग्य इस जहां को दे जाएं।

प्रत्येेक उपलब्धि के लिए कठोर परिश्रम करना होता है। इसके लिए निरन्तर प्रयत्न करना होता है। अपने उद्देश्य को लेकर चलने वाला व्यक्ति ही मंज़िल पर पहुंचता है। रोक लगाना, तोहमतें लगाना दुनिया का दस्तू‍र है। जब उद्देश्य स्पष्ट हों, पैर मंज़िल की ओर उठे हों, सत्य का साथ हो तो कोई रुकावट रास्ता नहीं रोक सकती।

हमने इस सदी में अभिलाषाओं की पूर्ति करनी है, सामायिक जिज्ञासाओं और बीती सदियों से उपजी ज्वलन्त समस्याओं का समाधान सोचना है। इक्कीसवीं सदी की ज़रूरतें, उसके प्रति संकल्प और उनकी पूर्ति को संभव बनाना है।

साहित्यकार के ख़्वाब ने, सत्य के प्रति निष्ठा ने आने वाले पड़ावों को विजय करते हुए भविष्य के स्वप्न-संसार को साकार करना है। हम इस दुनिया में सपने देखने और सोते रहने के लिए नहीं आए। जो भी होता है, उसे यूं ही नहीं होते रहने देना। कठोर परिश्रम से नए आयाम बनाने हैं। हमें अभी लम्बा संघर्ष करना है।

-सिमरन

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