कंटीली राहें

कितनी ही आंखें रोई होंगी। कुछ आंसू नज़र आए, कुछ चार दीवारियों में घुट के रह गए जिन को कोई न देख पाया।

“तुम औरत हो, त्याग सहनशीलता तुम्हारे गुण हैं। सदियों से औरत त्याग करती आई है। तुमने अपने लिए नहीं जीना दूसरों के लिए जीना है। तुझमें असीम शक्ति है सब कुछ सहन करने की। त्याग की मूर्ति, प्रेम की प्रतिमा हो तुम।’’ उसे देवी की गद्दी पर बिठा दिया गया। उसे बहुत उंची होने के भ्रम में डाल, उसको सपनों से महरूम कर दिया। उसे महान कह कर उस पर सितम पे सितम कर डाले। देवी बनी वो सितम सह कर भी मुसकुराती रही। कभी इच्छाओं ने मां-बाप की, भाई की इज़्ज़त का सवाल बन कर दम तोड़ दिया तो कभी आकांक्षाएं पति की आबरू की बलि चढ़ गईं। उसकी इच्छाएं सिसकती रहीं, तड़पती रहीं। उसकी क़ाबिलीयत को इज़्ज़त वालों ने दफ़न कर दिया। अपनी इच्छाएं दबा कर अपने सपनों से महरूम होकर भी वो अपने अधिकार न मांग सकी। आज कानून ने औरतों को कितने ही अधिकार दिए हैं। लेकिन कितनी औरतों को अपने अधिकार मिल पाए हैं। अपने घर से अपनी जायदाद से अधिकार मांगने वाली बहन भाइयों की सगी नहीं रहती और वे देवियां भाई से बनाए रखने की ख़ातिर अपना अधिकार न मांग पाईं। कितनी ही औरतें पति की मौत के बाद अपने पति के घर से निकाल दी गईं।

सदियों से अपने महान होने का बोझ ढोया है औरत ने। लेकिन अब वो देवी नहीं इन्सान बनना चाहती है। वो भी अपने अधिकार मांगने लगी है।

इससे पहले कि वो अधिकार मांगने की बजाय छीनने लगे, सोचना होगा।

 क्यूं न अपनी बेटी को बेटे के बराबर के अधिकार दे दिए जाएं ताकि कल पति के साथ कोई हादसा होने पर या पति की तरफ़ से उसकी रुसवाई होने पर आपकी इज़्ज़त को अपना सर ढांपने के लिए कोर्ट कचहरियों के धक्के न खाने पड़ें। क्यूं न आप अपनी पत्नी को अपने हाथों इतने अधिकार दे दें कि आपके साथ कभी कोई हादसा होने पर आपका सिर ऊंचा रखने वाली आपकी आबरू को आपके भाई-बन्धुओं द्वारा रुसवा न किया जा सके। इसी तरह के कितने ही अधिकार हैं जो कानून होते हुए भी हम अपनी बेटी, बहन को या पत्नी को देने को तैयार नहीं होते।

पुरुष को हर पहलू में अपना आधिपत्य जमाने की, स्त्री पर राज्य करने की लालसा ने उसे अत्याचारी, निरंकुश व अन्यायी बना दिया है। नि:सन्देह इस सब कुछ में स्त्री स्वयं का भी भरपूर हाथ है व सब बातों के साथ एक सत्य: यह भी है कि औरतें खुद अपनी बर्बादी के लिए ज़िम्मेवार रही हैं। सबसे पहले तो इनको खुद मज़बूत होना होगा। अपनी सुरक्षा के लिए अपनी स्थिति को बेहतर करने के लिए खुद ही प्रयत्न करने होंगे।

कांटों भरी डगर है, लम्बा बहुत सफ़र है,
फिर भी चलना होगा।‍

-सिमरन

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