दीपावली सप्‍त दीपों का प्रकाश पुंज है।

                   

         –चित्रेश

दीपावली अपने आदि रूप में सात अनुषंगिक पर्वों का प्रकाश-पुंज था। समय के साथ जीवन में आई व्यस्तता ने हमें अपने पर्वों और उत्सवों को लघु आकार देने के लिए विवश किया, जिसके फलस्वरूप विभिन्न पर्वों से जुड़े कई कर्मकांड और अनुष्ठान लोक-जीवन में अपनी पहचान खोते चले गए।

यह दीपावली के साथ भी हुआ। वर्तमान समय में दीपोत्सव मुख्य रूप में धनवंतरि-त्रयोदशी, नरक चतुर्दशी, बलि-प्रतिपदा, भ्रातृ-द्वितीया तक सीमित हो चुकी है। आरम्भ के दो पर्व-कार्तिक कृष्ण पक्ष एकादशी की ‘देवपूजा’ और ‘गोवत्स द्वादशी’ की मान्यता का जनाधार अत्यंत क्षीण हो गया है।

देवपूजा से दीपावली का मंगलाचरण होता था। गांव-जवार की संस्कृति में अलौकिक शक्‍ति सम्पन्न दुष्टात्माओं की मान्यता की पैठ अत्यंत गहरी है। यह दुष्टात्माएं धार्मिक और सामाजिक अनुष्ठानों में बाधक बनती हैं। दीपोत्सव की लक्ष्मी-पूजा में दुरात्माएं बाधा न डाल सकें, इसके लिए एकादशी की संध्या में देवताओं के नाम पर प्रथम दीप ‘गोवत्स पूजा’ आर्ष चिंतन और वैदिक संस्कृति से आलोकित है। यह पर्व द्वादशी को गोधूलि बेला में वट-वृक्ष के नीचे गाय-बछड़े की पूजा के साथ सम्पन्न किया जाता था। ऋग्वेद के अंतर्गत ‘श्री सूकत’ में ऐश्‍वर्य की अधिष्ठात्री ‘श्रीदेवी’ मूलत: भूदेवी है। तत्कालीन कृषि से जुड़ी अर्थव्यवस्था में भूदेवी ही समृद्धि का आधार थीं। मानव को उद्योगपूर्वक भूमि के विलोहन हेतु गोवत्स यानि बैल का साधन और कृषि में परिश्रम करने के लिए शक्‍ति अर्जित करने का स्रोत दूध, दोनों गायों से प्राप्‍त होते थे इसलिए गाय और बछड़े पूज्य थे। आर्ष चिंतन और दर्शन में वन और वृक्ष अत्यन्त समादृत हैं। वट-वृक्ष के नीचे सम्पन्न होने वाली गोवत्स पूजा इसी समादर का प्रतीक थी। वह अपने बृहत्तर अन्वितार्थ के अंतर्गत मानव, पशु और वृक्ष के अन्योन्याश्रित सम्बन्ध और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक थी।

हरिवंश पुरान की कथा के अनुसार समुद्र मंथन से कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को धनवंतिर महाराज अमृत-कलश के साथ अवतरित हुए थे। इसी की स्मृति में धनवंतरि त्रयोदशी का पर्व अस्तित्व में आया। धनवंतरि आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं और आयुर्वेद आरोग्य का विज्ञान है। अपने आरंभिक काल में यह आयुर्वेद की मान्यचर्या और चिकित्सा के माध्यम से स्वास्थ्य प्राप्‍ति की कामना और संकल्प का पर्व था।

धनवंतरि के अमृत-कलश की अनुप्रेरणा से इसके साथ पात्र-क्रय की परम्परा जुड़ गई थी, जो अब दीपावली से पूर्व स्थिर लक्ष्मी के नाम पर धातु निर्मित वस्तुएं-बर्तन, आभूषण, सिक्के आदि ख़रीदने का पर्व बन चुका है। वैद्य लोग अब भी इस अवसर पर धनवंतरि पूजा का विशेष आयोजन करते हैं। सामान्य गृहस्थ अपनी देहरी पर दक्षिणाभिमुख होकर यम के नाम का एक दीपक जलाते हैं। यह दीप यम से असामयिक मृत्यु और रोग-आपदा से मुक्त रखने की कामना का प्रतीक होता है। ज्योति-पर्व का यह तृतीय दीप लोक मानस में ‘धनतेरस’ के रूप में समादृत है।

दीप-पर्व की आलोकमयी परम्परा का चतुर्थ दीप है। नरक चतुर्दशी ! इस पर्व का सम्बन्ध द्वापर में श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ा है। नरक का अभिप्राय मलिनता, रोग, अपवित्रता, क्लेशपूर्ण जीवन से है। जीवन में शुचिता, स्वास्थ्य, चैतन्या के आलोक की स्थापना से नरक को स्वर्ग बनाया जा सकता है। इस दिन अरुणोदय बेला में मांगलिक स्नान का विधान है। ऐसा न करने पर लोक मान्यता के अनुसार वर्ष पर्यन्त किए गए पुण्य नष्ट हो जाते हैं। इस पर्व पर यम के नाम का एक चतुर्मुखी दीप भी आलोकित करने का विधान है। यम धर्म के देवता हैं, उन्हें समर्पित यह दीप अपने चार आलोक से जीवन की चारों दिशाओं को प्रकाशमान करता है। जीवन में पवित्रता और धर्म की स्थापना के पश्‍चात ही लक्ष्मी से दिव्य विभूतियों की याचका सार्थक है। यही चिंतन इस पर्व के मूल में निहित है।

इसके पश्‍चात् आती है- अमावस्या, जगमगाती दीपावली….साक्षात् समृद्धि, ऐश्‍वर्य, सौन्दर्य, शील, दिव्यता, भव्यता की प्रतिरूप स्वर्ग से अवतरित होती शुभ-लक्ष्मी….इस दिन व्यापारियों का नया वर्ष शुरू होता है। पुराने बही-खाते बदले जाते हैं। नए बही-खातों की लक्ष्मी के साथ पूजा की जाती है। सामान्य गृहस्थ भी लक्ष्मी-पूजा का आयोजन करते हैं। लक्ष्मी के साथ गणेश की पूजा भी होती है। गणेश विष्णु के अंशावतार हैं, बुद्धि के देवता हैं।

चंचला लक्ष्मी नारायण के सानिध्य और विवेक के संबल से ही स्थिर रह सकती हैं यही हैं गणेश और लक्ष्मी के एक साथ पूजित होने का संदेश इस दिन चतुर्मार्ग, नदी, पर्वत, वन, श्मशान, खेत, बाग़, घर, देवालय, गाय के गोष्‍ठ आदि सर्वत्र दीप आलोकित करके लक्ष्मी के आह्वान का विधान है।

पौराणिक कथाओं में समुद्र मंथन से लक्ष्‍मी का अवतरण तथा रावण वध के पश्‍चात राम के अयोध्या लौटने पर नगरवासियों द्वारा हर्ष की अभिव्यक्ति हेतु सम्पूर्ण नगर को दीप मालाओं से आलोकित करने के संदर्भ इस महापर्व से जुड़े हैं। एक अन्य पौराणिक सूत्र के अनुसार आज के दिन माता पार्वती ने धूतक्रीड़ा में शिवजी को पराजित किया था इसलिए दीपावली की रात्रि में जुआ खेलने का प्रचलन है। मान्यता है, इस अवसर पर जो जीतता है, उसका पूरा वर्ष लाभकारी और कल्याणमय होता है। दीप-पर्व की रात्रि ‘काल-रात्रि’ के रूप में भी संज्ञापित की जाती है। इस रात्रि में तांत्रिक लोग तंत्र साधना क विविध अनुष्‍ठान करते हैं। बंगाल में दीपावली के अवसर पर महाकाली की पूजा का भव्य आयोजन होता हैं। भारतीय ऋषियों के चिंतन में दीप साधना का प्रतीक है और प्रकाश ज्ञान का सूचक ज्ञान और साधना के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन में शील, सौन्दर्य और समृद्धि की अधिष्ठात्री लक्ष्मी को प्रतिष्ठित कर सकता है- यही इस पर्व के पंचम दीप का मर्म है।

दीपावली का अगला दिन ‘बलि प्रतिपदा’ के रूप में मान्य है। बलि विष्णुभक्‍त प्रहलाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र था। वह अप्रतिम दानी था, किन्तु अपने पितामाह हिरण्यकश्यप की तरह विष्णु विरोधी था। विष्णु ने वामन रूप धारण कर, दान में तीन पग भूमि की याचना की थी। बलि के सहमत होने पर उन्होंने दो पग में उसका सम्पूर्ण राज्य नाप लिया और तीसरे पग से उसे दबाकर पाताल में पहुंचा दिया था। इस प्रकार पृथ्वी से दैत्य वंश सदैव के लिए समाप्‍त हो गया। इसी स्मृति का संवाहक है ज्योति पर्व का यह षष्टम दीप बलि-प्रतिपदा ! इस अवसर पर बलि के चित्र पर अर्ध्‍य समर्पित करने की परम्परा है, जो मूलत: जाति, वंश, सम्प्रदाय की संकीर्णता से ऊपर उठकर गुण और चरित्र की पूजा का घोतक है। इस दिन उत्तर भारत में गोवर्धन पूजा का प्रचलन है, जो द्वापर युगीन कृष्ण लीला का एक अंश है।

दीपोत्सव का सप्‍तम दीप ‘भ्रातृ द्वितीय’ के रूप में युगों-युगों से दीपित चला जा रहा है। यह भाई-बहन के अमर प्रेम का पर्व है। भविष्येत्तर पुराण में वर्णित है कि सूर्य की संतति यम और यमुना में बड़ा प्रेम था, किन्तु राज्य-कार्य में व्यस्त हो जाने पर यम अपनी बहन को भूल गए। इस पर यमुना ने कार्तिक शुक्लपक्ष द्वितीया के दिन यम को अपने यहां आमंत्रित किया। यम के आने पर यमुना ने भाई का टीका किया और सुस्वादु भोजन कराया प्रसन्न होकर यम ने कुछ मांगने को कहा तो यमुना ने याचना की- ‘‘आप ऐसा वरदान दें कि जो भाई आज के दिन बहन से टीका कराए, वह वर्ष पर्यन्त सुखी रहे।’’

इस प्रकार यह पर्व अस्तित्त्व में आया। इस दिन काशी में रामघाट पर यमेश्‍वर के पूजन एवं यम तर्पण की परम्परा है। मूलत: बहन के रूप में प्रत्येक नारी का सत्कार इस पर्व के मूल में निहित। अपने समेकित प्रभाव के अंतर्गत दीपोत्सव अपने समस्त अनुषंगिक पर्वों के माध्यम से जीवन को एक अनुशासन देता है, जिसका आरंभ श्रद्धा से होकर जीव-जगत जगत के अंतर्सम्बन्धों को समेटता स्वास्थ्य, स्वच्छता, साधना, ज्ञान, ऐश्‍वर्य और चरित्र-निर्माण का प्रेरक बनता है।

 

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