भारतीय नारी

                                                                                                                                                           

 –सत्‍यपाल ‘निश्‍चिन्‍त’

भारतीय नारी के बारे में हम विचार करें तो हमें स्पष्‍ट होगा कि हम भारतीय नारी का आदर्श सीता, सावित्री, दम्यन्ती एवं मीरा को भूल गये हैं। हम भूल गये हैं उपास्य सर्वत्यागी उमानाथ शिवशंकर को। हम शायद यह भी भूल गये हैं कि हमारा समाज उस विराट महामाया की छाया मात्र ही है। भारतीय नारी के आदर्श के सामने तो विश्‍व आज भी नतमस्तक है क्योंकि नारी तो पवित्रता का प्रतीक रही है। मातृत्व तो भारतीय नारी का आभूषण रहा है। भारत वर्ष में माता लक्ष्मी, सरस्वती व दुर्गा को निहित माना गया है। माता लक्ष्मी धन, सौन्दर्य एवं उदारता का प्रतीक है। माता सरस्वती का रूप विद्या, बुद्घि एवं विवेक का प्रतीक है तथा दुर्गा का रूप शासन व शक्‍ति का प्रतीक माना जाता है। जब माता में तीनों शक्‍तियों का निवास होता है तो स्वत: ही माता का स्थान इन तीनों देवियों से उच्च हो जाता है। कवि गोर्की ने कहा है कि लोगों को दुनिया भर की चीज़ों की आवश्यकता होती है, किन्तु माता प्यार के अतिरिक्‍त कुछ नहीं चाहती है।

नारी का स्थान कोई भी नहीं ले सकता। वह अति पूजनीय है। नारी इस सृष्‍टि, समाज एवं मानव जीवन की आधारशिला है इसलिये यह न केवल जननी अपितु शिक्षक, रक्षक व निर्देशक भी है। भारत की पवित्र भूमि में नारियों ने न जाने कितने आदर्शों से लोगों के मन में उनके प्रति श्रद्घा उत्पन्न कर दी है उन्हीं आदर्शों में सीता का यह महान् त्यागमय व कष्‍ट सहिष्णुता का आदर्श सामने आता है। माता सीता ने घोर विपत्तियों और दु:खों में भी आह तक का उच्चारण नहीं किया। वे सदा अपने पति की हर स्थिति में अनुगामी रहीं। सीता मां अग्नि परीक्षा में भी सफल रहीं क्योंकि वे सच्ची पतिव्रता थीं। गान्धारी ने भी अपने पति की नेत्रहीनता के कारण स्वयं के नेत्रों का उपयोग नहीं किया और अन्धों जैसा जीवन व्यतीत किया। धन्य हो ऐसी नारी जिसने इस पवित्र भारत भूमि पर जन्म लेकर इसकी महत्ता को और अधिक प्रशस्त किया।

नर की जननी होने के कारण वस्तुत: नारी उससे कहीं अधिक श्रेष्‍ठ एवं पवित्र है। उसका स्थान संभवत: बहुत ऊंचा है। माता का पूज्य स्थान पिता एवं उससे भी ऊंचा है। पुरुष की अपूर्णताएं नारी के स्नेह सिंचन से ही दूर होती हैं। इसलिए यदि नारी के रूप में हमारा उपास्य इष्‍ट हो तो वह एक औचित्य ही है। अनादिकाल से ही भारतीय धर्म में ऐसी ही मान्यता चली आ रही है जिसके अनुसार माता को ही नहीं, पत्‍नी को भी पति से अधिक एवं प्रथम सम्मान मिला है। पति-पत्‍नी के सम्मिलित युग्म में पत्‍नी को प्राथमिकता है। लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधे-श्याम, उमा-महेश, शची-पुरन्दर, माता-पिता, गंगा-सागर आदि नामों में नारी को ही प्राथमिकता मिली है। कारण उसकी वरिष्‍ठता ही है।

कहा जाता है कि हर सफल व्यक्‍ति के पीछे एक नारी की भूमिका होती है। नारी एवं बच्चे सभी मिलकर एक परिवार बनाते हैं। गृहस्थ एक तपोवन है जिसमें प्रेम, संयम एवं सहिष्णुता की साधना की जाती है। यदि परिवार के साथ सम्बन्ध मज़बूत हैं, पारिवारिक सहमिलन बड़े सौहार्दपूर्ण ढंग से नियमित रूप से होता है। पारिवारिक पंचशीलों का पालन होता है तो समझिये मानव को सफल बनने की दिशा में एक क़दम बढ़ा लिया गया है। इक्कीसवीं सदी नारी सदी के रूप में आयी है। हम उपेक्षा करेंगे तो बहुत कुछ खोयेंगे। परिवार निर्माण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे हर सफलता के इच्छुक व्यक्‍ति को जीवन का अंग बनाना ही होगा। गाड़ी के दोनों पहिये बराबर हों तो जीवन की गाड़ी भी ठीक चलेगी। इसके लिये प्रतिवर्ष पति-पत्‍नी को विवाह की वर्षगांठ पर इन शर्तों को पुन: याद कर लेना चाहिये जिसके माध्यम से पति-पत्‍नी आपस मेें जुड़े हुये हैं। जिससे प्रेम तो बढ़ता ही है, साथ ही बच्चों के विकास में दोनों का योगदान भी हो जाता है।

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्‍च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

प्रार्थना में जिन सम्बन्धों को गिनाया गया है, उनमें माता का सम्बन्ध सर्वप्रथम होता है क्योंकि माता से बढ़कर नि:स्वार्थ करुणा एवं वात्सल्यमय रिश्ता हो ही नहीं सकता। जब हम भगवान् को माता मानकर चलते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया किसी सहृदय माता के वात्सल्य के रूप में उपलब्ध होती है। पिता से माता का दर्जा सौ गुना अधिक बताया है। यूं तो पिता भी बच्चों को प्यार करते हैं, पर उस प्यार का स्तर माता के प्यार की तुलना नहीं कर सकता। इसलिए सब में भगवान् को माता मानकर चलना अपने हित में ही है। इसमें अपने को भी अधिक लाभ होता है।

नारी के प्रति मनुष्य में एक वासनात्मक दुष्‍टता की प्रवृत्ति जड़ जमाये रहती है। यदि इसे हटाया जा सके, नर-नारी के बीच काम-कौतुक की कल्पना मिटायी जा सके तो विष को अमृत में बदलने जैसी भावनात्मक रसायन बन सकती है। नारी के रूप में माता का ध्यान करके हम नारी के प्रति वासनात्मक दृष्‍टि हटाकर पवित्रता का दृष्‍टिकोण जमाने का अभ्यास करते हैं। इसमें जितनी सफलता मिलती है, उतनी ही बाहरी जगत में भी हमारी नारी के प्रति वासनात्मक दृष्‍टि हटती जाती है। इस प्रकार नर-नारी के बीच जिस पवित्रता की स्थापना हो जाने पर अनेक आत्मिक बाधाएं, कुंठाएं एवं विकृतियां दूर हो सकती हैं, उसका लाभ सहज ही मिलने लगता है।

आज भारतीय नारी की दशा दयनीय है। त्याग और सेवा की सजीव मूर्ति नारी आज उपेक्षित है। समाज में उसे सम्मानपूर्वक स्थान प्राप्‍त नहीं है। उसे नर के समान स्तर पर नहीं रखा गया है। समाज में नारी को कड़े बंधनों में जकड़े रखा है। उसे न्यायोचित अधिकारों से वंचित रखा गया है। माता-पिता की प्यार भरी दृष्‍टि और स्नेह भरे हृदय पर सबसे भयंकर वज्रपात दहेज़ होता है। ग़रीब माता-पिता दहेज़ के नाम से घबराते हैं। जैसे-जैसे लड़की की उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे उसके ग़रीब माता-पिता के माथे पर चिन्ता की लकीरें आने लगती हैं परिणामस्वरूप उनके जीवन में अशान्ति, भय और उदासी घर कर जाती है। कई पिता दहेज़ जुटाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं। यहां तक कि रिश्‍वत, गबन जैसे अनैतिक कार्य करने से भी नहीं चूकते। दहेज़ का राक्षसी रूप हमारे सामने तब आता है जब दहेज़ के लालच में बहुओं को परेशान किया जाता है। उन्हें अपशब्द सुनने पड़ते हैं, उनके प्रति दुर्व्‍यवहार होता है। कैसी विडम्बना है यह ? इस व्यथा से मुक्‍ति पाने के लिए वे अपने जीवन का अन्त कर लेती हैं। दहेज़ दानव पर अपने प्राणों की बलि चढ़ा देती हैं।

दहेज़ प्रथा राष्‍ट्र के समष्‍टिगत रूप के लिए सबसे घातक शत्रु है। दहेज़ की बुराई को दूर करने के सच्चे उपाय देश के नवयुवकों के हाथ में है। वे वधू के रूप-स्वरूप या धन को छोड़कर उसके गुणों को महत्त्व दें। विवाह प्रेम के आधार पर करें, दहेज़ के आधार पर नहीं। कन्याएं भी दहेज़ के लालची युवकों को दुत्कारें तो यह समस्या तुरन्त हल हो सकती है, इसीलिए गांधी जी ने कहा था-‘‘जो युवक दहेज़ के पाप से अपने हाथ गन्दे करे उसे समाज से बाहर निकाल देना चाहिए।’’ जब समाज नारी के अभिशाप से मुक्‍त हो जायेगा, तभी हमारे राष्‍ट्र में सुख-शान्ति का संचार होगा और वह प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा।

स्वतंत्रता प्राप्‍ति के बाद भारत में अगर कोई परिवर्तन क्रांतिकारी माना जा रहा है तो वह है महिलाओं में प्रगति एवं विकास के प्रति बढ़ती जागरूकता। वर्तमान जनसंख्या आंकड़ों ने भी महिला शिक्षा में बढ़ोतरी के संकेत स्पष्‍ट हैं। अत: स्पष्‍ट है कि बदलाव हमारे सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया का अभिन्न अंग बन चुका है। महिला पुरुष को न केवल परिवार से बल्कि समाज से भी जोड़कर उसके अस्तित्त्व को पूर्णता प्रदान करती है। अगर एक पुरुष एवं महिला के आपसी संबंध खुशनुमा हैं तो किसी प्रकार की कोई भी समस्या उत्पन्न होने की गुंजाइश ही नहीं रहती। सामाजिक समस्यायें पैदा होने की संभावना अपने आप ही कमज़ोर हो जाती है। आज ज़माना बदल गया है तथा आर्थिक आत्म-निर्भरता सबसे महत्वपूर्ण है। चाहे वह पुरुष से सम्बन्धित हो या महिला से। अत: महिलाओं के लिए भी शिक्षा एक महती आवश्यकता है। यहां शिक्षा का अर्थ केवल विद्यालय या महाविद्यालय भेजना ही नहीं है अपितु उसमें शिक्षा के द्वारा महिलाओं में एक नई सोच का विकास व कार्य-कौशल भी शामिल है। सामूहिक स्तर पर कौशल सम्बन्धी जैसे फ़ैशन डिज़ाइनिंग, कम्प्यूटर शिक्षा आदि कार्य करके महिला समाज अपनी भूमिका निभा सकती हैं परन्तु यह भी आवश्यक है कि प्रत्येक महिला यह संकल्प करे कि वह विकास की दौड़ में पूर्ण निष्‍ठा से भाग लेगी और दूसरों को भी इसके लिए प्रोत्साहित करेगी।

आज आवश्यकता है कि नारी अपनी विचारधारा को परिवर्तित करने की सकारात्मक सोच रखे और अपने आपको पहचाने। नारी के भीतर अदम्य शक्‍ति है। इसे सकारात्मक सोच के साथ ही सही दिशा में लगाइये। आज का दौर निजीकरण का दौर है, जहां काम की महत्ता है। निजी क्षेत्र में हमारे लिये असीमित क्षेत्र है, नारी के पास मज़बूत शरीर एवं सुविकसित दिमाग़ है। आवश्यकता है तो केवल अपने आप को पहचानने की, आत्मनिर्भर बनने की। जॉर्ज हर्बर ने कहा है कि सभी प्रकार से आत्मनिर्भर बनो, अपना आत्मसम्मान करो तब आप पाओगे कि आपके भीतर क्या है? सफलता पाने के विश्‍वास को आगे बढ़ाने और इच्छा शक्‍ति को दृढ़ रखने में ही सफलता मिलेगी। नारियों को यह नहीं भूलना चाहिये कि दु:ख की प्रत्येक काली घाटी के पीछे आशा का सूर्य भी सदैव चमकता रहता है। नारी का व्यक्‍तित्व व चरित्र ही सफलता का आधार है। धन तो केवल एक साधन मात्र है। अपने आत्मविश्‍वास एवं चरित्र के बल पर साधन रहित व्यक्‍ति भी कितनी महान् विजय प्रदान कर सकता है। इसके उज्ज्वल उदाहरण इतिहास में मिलते हैं।

अन्त में बस यही कहा जायेगा कि भारत की नारी महान् तो है लेकिन अपनी इच्छा शक्‍ति, आत्म-ज्ञान और आत्म कौशल का उपयोग न करके हमेशा मन में डर भर लेती है। इसी के कारण वह समाज में अपने आप को शोषित और असहाय महसूस करती है। अगर आत्मविश्‍वास को बढ़ाकर हर क़दम आत्मा की आवाज़ पर उठायें तो प्राचीन नारियों जैसी प्रगतिशील व समाज में प्रतिष्‍ठित वर्चस्व होने वाली बन सकती हैं। यही लेखक का आज की नारी को शुभ संदेश भी है।

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