दावेदार

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ज्‍वाला सिंह ने अपने घर और ज़मीन-जायदाद का बंटवारा अपने जीवन काल में कर देना उचित समझा। उसको जीवनपर्यन्त उन व्यक्‍तियों पर गुस्सा आता रहा जिन्होंने अपने ये फ़र्ज़ समझदारी के साथ नहीं निभाये थे और उनके आंखे मूंदते ही घर का सारा माहौल, सारा दस्तूर ही आंखें मूंद लेता था। घरों में बंटवारे से क्लेश, लड़ाई-झगड़े शुरू हो जाते थे। मरने वाले की चिता और कफ़न जैसी सांझी वस्तुओं के मूल्य उसने स्वयं बंटते देखे थे और कई बार ईर्ष्‍या बढ़ते-बढ़ते खून-ख़राबे तक पहुंच जाती थी।

घर के बड़े कमरे में ज्वाला सिंह पलंग पर बैठा था और उसके दोनों पुत्र, बहुएं और एक-एक बड़ा पौत्र उसके आस-पास बैठे थे।

उसने सभी के साथ मिल कर पांच बार ‘मूलमंत्र’ का पाठ दोहराया।

पाठ के उपरान्त उसने एक बुज़ुर्ग की तरह बड़े ही संयम के साथ कहा, ‘‘मेरे बच्चो हम पर परमात्मा की बड़ी कृपा है कि तीनों पीढ़ियां एक ही छत के नीचे बैठकर उसके नाम का जाप कर रही हैं।’’

इसके पश्‍चात् उसने अपने नौजवान पौत्रों को कठोरता के साथ बाहर जाने के लिए कहते हुए आदेशात्मक स्वर में कहा, ‘‘पास में ही रहना आवश्यकता पड़ने पर आपको बुलाया भी जा सकता है।’’

फिर उसने अपने पुत्रों के सामने घर तथा ज़मीन के बंटवारे के बारे में योजना को ज़ाहिर किया। नहर के समीप वाली भूमि को एकड़ों में बांट दिया था तथा बहरानी को भी। यह सब कुछ करके उसने पहला अधिकार अपने बड़े पुत्र को देते हुए कहा, ‘‘देखो, दरबारा सिंह, तुमने बड़े पुत्र होने के नाते इस घर के लिए बहुत कुछ किया है, इसलिए पहला अधिकार तुम्हारा है जो भी हिस्सा तुम्हें दोनों में से अच्छा लगे मुंह से मांग ले।’’ उसने भी अपने बड़े होने का फ़र्ज़ अपने पैतृक अंदाज़ में स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘मैं पहला अधिकार अपने छोटे भाई को देता हूं उसने मुझ से ज्‍़यादा उम्र बितानी है। उसने मुझसे अधिक ज़िम्मेदारियां भी निभानी हैं इसलिए पहला अधिकार उसका है।’’

छोटे ने भी हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर कहा, ‘‘न्याय पसंद घर के बुज़ुर्ग बैठे हों तो छोटों को बोलने की या मांगने की आवश्यकता नहीं रहती।’’ इतना कहते हुए उसने अपने कुर्ते की झोली आगे कर दी, ‘‘आप जो भी मेरी झोली में डाल दोगे मुझे मंज़ूर है।’’

ज्वाला सिंह अपने बच्चों का आपस में प्यार और इत्तफ़ाक़ देखकर बहुत खुश हुआ। वह इस बात से और भी अधिक खुश था कि हमेशा बंटवारे के समय आपस में लाठियां चलतीं, सिरों से सिर टकराते और खून बहाए जाते थे। यहां दोनों भाई मिलकर बैठे थे। उसने प्यार और मान के साथ पास बैठे दोनों पुत्रों को अपने आगोश में ले लिया।

लम्बे, चौड़े दो दरवाज़ों वाले आंगन में ज्वाला सिंह ने सोच-समझकर दो हवेलीनुमा घर पहले ही बना रखे थे। एक जैसे ही कमरे, आंगन और बरामदे। पशुओं के लिए एक जैसी शैड तथा नहलाने धुलाने के लिए दो मोटरें तथा दो ही बड़े हौज़।

परन्तु घर में पुश्तैनी तलवार एक ही थी जिसकी म्यान तो कई बार बदली जा चुकी थी परन्तु तलवार वही चली आ रही थी। बदले हुए छ: म्यानों को ज्वाला सिंह ने इस तरह संभाल कर संदूक में रखा हुआ था जैसे कोई नई ख़रीदी हुई ज़मीन की रजिस्ट्रियां संभाल कर रखता है।

जिन पुत्रों ने ज़मीन-जायदाद के बंटवारे के समय कोई हक़ नहीं जताया था। पुश्तैनी तलवार के बंटवारे का समय आया तो दोनों पुत्र ही उसके हक़दार बन बैठे। पहले बड़े पुत्र ने अपना हक़ पेश किया, ‘‘मैं आपका बड़ा पुत्र हूं शरीफ़ तथा समझदार भी हूं इस तलवार की इज़ज़त मैं हर तरह से बरकरार रख सकता हूं ……’’

पिता सोच में पड़ गया। बड़ा पुत्र ग़लत भी नहीं कह रहा था। उसको उसके ऊपर पूरा विश्‍वास था, परन्तु फिर भी जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं लेना चाहता था।

उसी समय दूसरे पुत्र ने भी तलवार पर अपना अधिकार जताया, ‘‘पिता जी, वैसे तो बड़ा भाई भी ठीक कह रहा है पर मैं सोचता हूं कि वह शराफ़त तथा समझदारी भी किस काम की जो मौक़े पर हथियार का भी प्रयोग न कर सके?’’ वह आगे बढ़ा और पिता के हाथ में पकड़ी तलवार को सिजदा करता कहने लगा, ‘‘हथियार के प्रयोग के लिए शराफ़त और समझदारी के साथ-साथ हिम्मत भी ज़रूरी है…..इस कारण पिता जी मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस तलवार की मान-मर्यादा मैं ही क़ायम रख सकूंगा।’’

पिता जी सोच में पड़ गए। उनको मालूम था कि उसके दोनों पुत्र बुद्घिमान और समझदार हैं। वे समय की नज़ाकत को समझकर अच्छे बुरे की पहचान कर सकते हैं। उसने इसी विश्‍वास के साथ कहा, ‘‘मुझे विश्‍वास है कि तुम कभी भी किसी के विरुद्घ शौक़ से हथियार नहीं उठाओगे। पर यदि प्यार, मुहब्बत या मज़लूम को बचाने के लिए किसी क्रूर व्यक्‍ति या अपनों के विरुद्घ भी उठाना पड़े तो हिचकिचाहट नहीं करोगे।

‘‘क्या प्यार, मुहब्बत को भी हथियारों की आवश्यकता होती है?’’ बड़े पुत्र ने जैसे पिता को ही सवाल किया।

पिता ने मुसकुरा कर बड़े पुत्र की ओर देखा और धीरे से कहा, ‘‘ज़रूरत हमेशा घुग्घियों, कूंजों और चिड़ियों को ही बचाने की होती है। बाघ तथा बाज़ तो अपनी रक्षा स्वयं ही कर लेते हैं।’’

पिता ने तलवार को म्यान में डालकर अपने सामने रख लिया और सोचने लगा कि उनके दोनों पुत्रों ने इस तलवार के द्वारा किए छ: कत्लों की कहानियां तो सुन रखी हैं। वे सभी क़त्ल परिवार की मान-मर्यादा को बढ़ाने वाले थे। शायद इसीलिए वे दोनों ही अपने पुश्तैनी हथियार को हर हालत में अपना लेना चाहते थे।

सारा परिवार इस तलवार के साथ इतना जुड़ा हुआ था कि वे पौष के महीने की सात तारीख़ को गुरुपुरब वाले दिन बड़ी श्रद्घा से इस तलवार के साथ गुरुद्वारे पहुंचकर इसको गुरू ग्रंथ साहिब के सामने माथा टिकवा कर लाते थे।

प्रत्येक क़त्ल के पश्‍चात् इस तलवार का म्यान बदल दिया जाता था। और अभी तक के सभी म्यान इस गुरुपुरब वाले दिन ही बदले थे। वे गुरु ग्रंथ साहिब की मौजूदगी में पुराना म्यान उतार देते तथा तलवार को कच्चे दूध में स्नान करवा के नये म्यान में बदल दिया जाता था।

‘‘इस तलवार से किये छ: क़त्लों की कहानी आप सुन ही चुके हो,’’ पिता ने एकदम चुप्पी को तोड़ा, ‘‘परन्तु आज मैं सातवें क़त्ल की कहानी आपको बताता हूं।’’ पिता अपने दोनों पुत्रों की ओर देख कर मुसकुराया।

पुत्र सातवें क़त्ल की बात सुनकर हैरान रह गये थे। येे उनके लिए बिल्कुल ही नयी बात थी। पिता ने अपना गला साफ़ करते हुए बात को शुरू किया।

‘‘संत्तालीस के विवादों के समय मैंने स्वयं इस तलवार के साथ किसी का सिर काट दिया था परन्तु अभी तक भी खुद को कभी क़ातिल नहीं समझा।

परन्तु हां, यह एकमात्र ऐसा क़त्ल था जिसके बाद इस तलवार का म्यान नहीं बदला गया था, कैसे बदलता इसका म्यान और क्या बताता किसी को?’’

वहां बैठे सभी की तरह हवेली की दीवारें भी चुप थीं, ‘‘अगर फिर कभी ऐसे अपने ही खून का क़त्ल करना पड़े तो बेशक तुम भी म्यान को न बदलना।’’

पुत्रों को ये बात सुनकर जैसे एक झटका-सा लगा था। सतयुगी पिता के कहे ये लफ्‍़ज़ सुनकर वे हैरान ही नहीं परेशान से भी हो गये। यह कितने बड़े गुनहगार का क़त्ल होगा जिसका क़त्ल करके भी उनका पिता अपने आप को क़ातिल नहीं समझ रहा था।

छोटा पुत्र हैरान सा होकर बोला, ‘‘पिता जी आपने जो भी किया होगा पूरा सोच-समझकर ही किया होगा परन्तु हम हैरान हैं कि क़त्ल करके भी अपने आपको…?’’

पिता जी सवाल सुनकर मुसकुराये और फिर बहुत ही गम्भीर होकर कहने लगे, ‘‘बच्चो जो भी इन्सान अपनी जमीर व हथियार को प्यार करता है वह इनके सामने कभी झूठ नहीं बोल सकता’’, फिर उसने तलवार दोनों हाथों से पकड़कर माथे से लगाते हुए कहा, ‘‘मैं हर रात बैठकर अपनी ज़िंदगी का हिसाब-किताब इस हथियार और अपने जमीर के सामने ऐसे ही सिजदे में झुककर करता हूं। अंधेरे में अगर मेरा जमीर या तलवार सूरज की तरह न चमके तो मैं खुद को गुनहगार समझूंगा परन्तु अभी तक ऐसा हुआ नहीं…..।’’

Kirpaan-movieफिर पिता जी बंटवारे के समय हुए विवादों की बातें सुनाने लग पड़े। ऐसे समय में वह प्राय: दु:खी तथा उदास हो जाते थे, ‘‘संत्तालीस के बंटवारे के समय मैं भरपूर जवानी में था। मेरे पिता जी अपनी ज़िंदगी के अन्तिम पहर में पांव रख चुके थे। हालातों को देखते हुए मेरे पिता जी ने एक दिन गांव के गुरुद्वारे में गुरू ग्रंथ साहिब के सामने माथा टिकवा कर इस तलवार की सौंपना मुझे करते हुए कहा, ‘‘इस तलवार की लाज रखना बेटा। हथियार सिर्फ़ दुश्मन का सिर काटने के लिए ही नहीं होते यह खुद को ज़लील होने से बचाने के लिए भी होते हैं।’’ वे अपने पिता को याद करके भावुक से हो गये थे। उन्‍होंने आह भरते हुए कहा, ‘‘मैंने इस तलवार के साथ कइयों को बचाया परन्तु धर्म में अन्धे हुए लोगों की भीड़ में से अपने पिता को न बचा सका…।’’ पिता की आंखें नम हो गईं पर उन्‍होंने अपनी बात जारी रखी, ‘‘…दरअसल मेरे पिता को सारा गांव इतना सांझा व्यक्‍ति मानता था कि हमें और उन्हें कभी किसी ख़तरे का अंदेशा ही नहीं हुआ था। परन्तु तब इंसान, इंसान नहीं रह गये थे। वे धर्मां में बंटे बहुत कुछ और ही बन गये थे। वे दिखते तो इंसानों जैसे ही थे लेकिन इंसानों जैसा उनमें कुछ भी शेष नहीं रह गया था।’’

पिता ने अपने सामने पड़ी तलवार को फिर अपने हाथ में पकड़ते हुए कहा, ‘‘मुझे नहीं मालूम आप में से कौन बनेगा इस तलवार का असली वारिस परन्तु जो भी बने उसको मेरी नसीहत याद रखनी पड़ेगी कि हथियार सिर्फ़ बाहर वाले दुश्मनों के लिए ही नहीं होते बल्कि इंसानियत के दुश्मन के लिए होते हैं और दुश्मन कभी भी अपना नहीं होता इसीलिए हथियार रखना, संभालना, दुश्मन की पहचान करके इसका सही इस्तेमाल करना बहुत मुश्किल कार्य है।’’

पिता की बातें सुनकर दोनों पुत्र चिंताग्रस्त हो गये। अपने जवान हो रहे पुत्रों की उड़ती ग़लत अफ़वाहें वे भी सुन चुके थे और वह सोचने लगे कि पिता तक भी वे अवश्य पहुंच गई होंगी। उनको अब यह भी खटकने लगा कि पिता जी ने क्या सोचकर कमरे में बैठे अपने पौत्रों को बाहर जाने के लिए कह दिया था। ऐसी बातें सोचकर उन्होंने आपस में कोई राय की और फिर बड़े पुत्र ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘पिता जी, तलवार रखने का फ़ैसला हम आपसी रज़ामंदी के साथ कर लेंगे परन्तु इससे पहले हम आपके हाथों हुए क़त्ल की कहानी अवश्य सुनना चाहेंगे।’’

पिता की पारखी नज़रों ने जैसे पुत्रों की बदलती मानसिकता को पढ़ लिया हो। उसने गहरी मुस्कान के साथ कहा, ‘‘इस तलवार की धार अब तेज़ नहीं रही और बिना धार की तलवार क़त्ल की कहानी सुनाती अच्छी नहीं लगती। पहले इसकी धार को तेज़ करवाने का वायदा करो।’’

दोनों पुत्रों ने सहमति भर दी। ज्वाला सिंह ने किसी रख-रखाव के बिना ऊंचे स्वर में कहा,‘‘ध्यान से सुनो, विवादों के दौरान मैंने इसी तलवार के साथ अपने ताए के बेटे को मारा था।’’ उसके दाएं हाथ में पकड़ी तलवार कांपने लगी और साथ ही उसके व्याख्यान से कमरे की चारों दीवारें गूंजी तथा कांपने लगी। उसके पुत्रों को यह बात अनहोनी लगी तथा असंभव भी। उन्होंने विवादों के दौरान हुए इस क़त्ल के बारे में तो सुना था परन्तु उसका क़ातिल उनके ही पिता, इस गुप्‍त रहस्य को निस्संकोच स्वीकार करे उनकी समझ से बाहर था। वे सोच रहे थे कि कैसे कोई कर सकता है अपनों का ही क़त्ल जबकि उस समय सभी लोग अपनों तथा बेगानों में प्रत्यक्ष रूप में बंट गये थे परन्तु पिता का ब्यान जारी था जब मैंने अपने ताए के बेटे को नंगी तलवार लेकर मुहम्मद शेख के घर जाते देखा तो मैं भी शंकित सा उसके पीछे भाग गया पर मेरे पहुंचने तक वह शेख तथा उसकी पत्‍नी को काट चुका था। वह शेख की बेटी हसीना को अपने क़ब्‍ज़े में लेने की कोशिश कर रहा था।

हसीना पहले घबरा कर आंगन के बीच वाले कुएं की तरफ़ भागी तथा फिर मुझे आगे से आता देखकर वह कुएं के पास वाले पीपल के पेड़ पर चढ़ गई। मुझे देखकर शायद वह और भी बुलंद हो गया था। उसने ज़ोर से चिल्लाते हुए कहा, ‘‘भाई, तगड़ा हो… इसको मारना नहीं पर बचनी नहीं चाहिए यह मुस्ली। बताते हुए पिता की आंखें नम हो गईं। परन्तु उसने कहानी जारी रखी। हसीना इतना घबरा गई कि उसने वृक्ष की टहनी के साथ लटकते अपनी तरफ़ से कुएं में छलांग लगा दी। परन्तु बिल्कुल कुएं की मुंडेर के पास गिर पड़ी। उसके पीछे ही वहशी हुए मेरे भाई ने छलांग लगा कर उसको बाजू से पकड़ लिया और उसको अन्दर की ओर खींचने लगा हसीना की आंखों में पता नहीं कैसी याचना थी कि मुझे उसके मरे हुए मां-बाप की लाशें भी उनमें तैरती हुई नज़र आईं। मैं एकदम ही इतना कठोर तथा ठोस बन गया और पूरे गुस्से एवं ज़ोर के साथ मैंने अपने भाई को धक्का मार दिया। उसका सिर कुएं की दीवार के साथ टकराया। वह फिर एक बार हिम्मत के साथ उठा और हसीना की बांह छोड़ते हुए तलवार पूरे ज़ोर के साथ मेरी तरफ़ उछाली। और तलवार का वार रोकते हुए मैंने एक ही झटके में उसी को झटका कर रख दिया और अपने हाथों से उसका सिर और धड़ उसी कुएं में फेंक दिया।’’

उसके पुत्र हैरानी के साथ सुन रहे थे और यह भी देख रहे थे कि पिता के चेहरे के ऊपर कोई भी शिकन या पश्‍चाताप नहीं था। उसने बात जारी रखी।

मैंने हसीना को इसी तलवार के पहरे में उन्हीं के शरीकों, भाइचारे के घरों में पहुंचाकर अपने आप को कर्त्तव्य से विमुक्‍त किया। पिता ने अपने हाथों की हथेलियों को ऊपर सिर तक उठाते हुए जैसे अपनी आप बीती का अन्त किया। फिर उसने म्यान वाले बक्से को खोला और उसमें से रुमाल में बंधी ढेर सारी मौली के धागे निकालकर अपने पुत्रों को दिखाते हुए बोला, ‘‘ये वही मौली के धागे हैं जो हर राखी पर हसीना मुझे अभी तक भेजती है।’’

दोनों पुत्रों के सिर अदब के साथ अपने पिता के सम्मान में झुक गये। उन्होंने अनुभव किया कि जैसे उनके पिता सत्य ही कहते थे कि क़त्ल करके भी उन्होंने कभी अपने आपको क़ातिल नहीं समझा था। पिता ने पुत्रों को बहुत ही धैर्यपूर्वक पूछा कि इस हक़ीक़त को सुनने के बाद बताओ कौन बनना चाहेगा आप में से इस तलवार का वारिस?

बड़े पुत्र ने अपने भाई के साथ की राय के मुताबिक़ हिचकिचाते हुए अपना फ़ैसला सुना दिया। हम बारम्बार छ:-छ: महीने यह तलवार अपने पास रखने के लिए तैयार हैं। हमारी योग्यता को परखते हुए आप पक्के तौर पर जिसको भी इसे सौंपना चाहोगे हमें मंज़ूर होगा।’’

ज्वाला सिंह को दोनों भाइयों का यह फ़ैसला दावे से बेमुख होकर बेदावे की तरफ़ मुंह घुमाता हुआ दिखाई दिया। उसके होंठों पर एक रहस्यमयी मुस्कराहट फैलती-फैलती सिकुड़-सी गई। वह उनकी पेशकश के साथ जैसे सहमत नहीं लग रहा था। वह फिर अपने ही अंदाज़ में जैसे उन्हें समझाने लग पड़ा, ‘‘हथियार उपयोग करने के लिए कायरता बिल्कुल ही नहीं चाहिए किन्तु संयम भी बहुत ज़रूरी होता है। हथियार प्रयोग करने वाले हाथों को अपने-बेगाने की पहचान से बढ़कर अच्छे-बुरे की पहचान करनी बेहद लाज़िमी हो जाती है।

ज्वाला सिंह म्यान वाले सन्दूक में से तीन-तीन म्यान दोनों पुत्रों को पकड़ाते हुए बड़े ही दु:खी मन के साथ कहने लगा, ‘‘पुश्तैनी जायदाद की तरह आप इसके भी स्वभावत: हक़दार हो परन्तु अगर आपको यह तलवार चाहिए तो इसका मूल्य चुकाना पड़ेगा।

दोनों पुत्रों ने बहुत हताश से होकर एक-दूसरे की तरफ़ देखा। पिता कह रहा था…‘‘परन्तु मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि इतनी बड़ी क़ीमत शायद आप कभी भी चुकाने के लिए तैयार नहीं होंगे।’’ वह ज़ोर-ज़ोर से हंसने लगा। ‘‘यह तलवार तो अपनों का खून भी नहीं बख्‍़शती।’’

पिता की बात सुनकर दोनों पुत्रों ने अपनी आंखें झुका लीं या शायद पिता के शब्दों के भार तले वे स्वयं ही झुक गईं।

ज्वाला सिंह पहले से भी ऊंची आवाज़ में हंसा, ‘‘मुझे पहले ही पता था……’’

‘‘बस अन्तिम बात’’ अब उसकी हंसी गायब थी और वह उदास सा हो गया। जैसे अपनी वसीयत में लिखी किसी नसीहत को दोहरा रहा हो। अगर सही इस्तेमाल करना न आए तो तेज़ धार हथियार से बिना धार वाला हथियार ही कहीं अच्छा है।

इतना कह कर उसने तलवार को सन्दूक में रखते हुए अपनी आंखें बंद कर लीं।

शर्मसारी में जैसे पुत्रों की आंखें नीचे झुक गईं।

दोनों पुत्र पिता की बन्द आंखों की तरफ़ देख कर सोच रहे थे कि बंद और झुकी आंखों में सच में ही बड़ा अन्तर होता है।

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