चूड़ी खनक भी सकती है

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चूड़ियां पहन तो लेती हूं मैं

पर खनकने नहीं देती

आंसू आंखों में आ भी जाएं

पर टपकने नहीं देती।

कामकाजी औरतों के लिए तमाम राहें खुलने के बाद उसकी बढ़ती हुई मुश्‍कलात यदा-कदा बेपर्दा होती रहीं हैं। आंसुओं को अंदर दबा कर मुसकराने का हुनर सीख चुकी है आज की नारी। हर हाल में अपने स्‍वाभिमान को ज़िन्‍दा रखना और नई मंज़िलें सर करते जाना उस‍का एकमात्र लक्ष्‍य हो गया है। आने वाली पीढ़ियों के लिए नई राहें खोलने वाली इन नारियों के रास्‍ते विकट हैं फिर भी वे कहतीं हैंजिस राह को चुन लूं मैं वो कैसे नहीं मिलेगी। कांटों भरी राहों पर आज चलना ज़रूरी है, कैसी मजबूरी है। उस पार भी जाना है उस पर मुसकाना है।

   बुलंद इरादे लेकर घर से बाहर निकली नारी की समस्‍याएं तो सभी को मालूम हैं लेकिन घर रहने वाली महिलाएं महिलाओं के लिए खुलने वाली तमाम राहों को लेकर कैसी कुंठा पाल लेती हैं इस पर शायद ही किसी का ध्‍यान जाता हो। बहुत सी महिलाओं को तो नौकरी करने की या कोई काम करने की इजाज़त आज भी नहीं मिलती या फिर समय रहते उन्‍हें चेताया नहीं जाता। धीरे-धीरे उनके मन में एक कसक पैदा होती है। यहां मैं गत वर्षों में हुए एक मिसिज़ इन्‍डिया मुक़ाबले की उदाहरण देती हूं। वहां पर जब महिलाएं अपना परिचय देती थीं तो बड़े नम्र तरीक़े से अपने बारे में बताती थीं कि ‘मैं डिज़ाइनर हूं, मैं एडवोकेट हूं, मैं मॉडल हूं,’ इत्‍यादि। तक़रीबन सभी अच्‍छी पोज़ीशन पर लग रहीं थीं। लेकिन जब एक घरेलू महिला ने अपना परिचय दिया तो उसका कहना था ‘मैं एक घरेलू महिला हूं और मैं घरेलू होने पर गौरवान्‍वित हूं।’ यह कहने की आवश्‍यकता एक घरेलू महिला को ही क्‍यूं पड़ी। यह सोचने का विषय है। मैं यहां ग़लत हो सकती हूं लेकिन जहां तक मैंने देखा है अपनी इन्‍हीं भावनाओं के कारण वे कामकाजी महिलाओं को कई बार नीचा दिखाने की कोशिश से भी बाज नहीं आतीं।

   ऐसा नहीं कि यह बात हर घरेलू महिला के संदर्भ में सही है और ऐसा भी नहीं कि घरेलू महिला की ज़िन्‍दगी खूबसूरत नहीं हो सकती। परन्‍तु यह शत-प्रतिशत सत्‍य है कि खूबसूरत ज़िन्‍दगी के खूबसूरत एहसास व्‍यक्‍ति के बरताव को बदसूरत नहीं होने देते। ऐसा नहीं कि घरेलू महिलाओं की समस्‍याओं पर चर्चा नहीं होती लेकिन जहां तक मेरा मानना है उनकी इस समस्‍या की ओर ध्‍यान शायद कम ही किसी का गया है। मन में कुंठा पनपना, हीन भावना का पनपना अपने आप में एक बड़ी समस्‍या है।

   मैंने बहुत सी घर ही में रहने वाली महिलाओं को भी बड़ी खूबसूरती से अपनी ज़िन्‍दगी बिताते हुए देखा है। घर में रहते हुए भी कुछ ख़ास मक़सद, कुछ ख़ास दिलचस्‍पियां बनाई जा सकती हैं जिन पर आप नाज़ कर सकें। कई बार देखा जाता है कि पढ़ी-लिखी महिलाएं या आदमी भी किसी गांव की अनपढ़ औरत के तजुर्बों के, समझदारी के क़ायल होते हैं। पर ऐसा स्‍थान वही महिलाएं बना पाती हैं जो हमेशा हर एक की समस्‍या सुलझाने के लिए तत्‍पर रहती हैं। प्रत्‍येक के काम आना इनकी आदत में शुमार हो जाता है। अपनी इन्‍हीं आदतों की वजह से वे समाज में अपना रुतबा बना पाती हैं। इस सब के लिए उन्‍हें कोशिश नहीं करनी पड़ती। बस एक स्‍वाभाविक सकारात्‍मकता और आत्‍मविश्‍वास उनमें होता है।

   यदि आप वाक़ई में घरेलू होने पर गौरवान्‍वित हैं तो यह कहा नहीं जाता। स्‍वयं को बड़ा कह कर नहीं बनाया जाता इसके लिए स्‍वयं का दिल बड़ा करना पड़ता है, काम बड़े करने पड़ते हैं, दूसरों की प्रशंसा करनी पड़ती है। महिलाओं ने यदि रुतबे हासिल किए हैं, यदि वे कोई अच्छा काम कर रही हैं तो उन्‍हें इज्‍़ज़त देनी होती है, उनकी तारीफ़ करनी चाहिए। बेवजह उन पर कटाक्ष कसते रहना, उनकी पीठ पीछे या सामने भी बुराई करना और खुद की बड़ाई करना आपकी कमज़ोरी के प्रमाण हैं। ईर्ष्‍या, कुंठा जैसी नकारात्‍मक चीज़ें आपको छोटा बनाती हैं। विनम्रता, खुशमिज़ाजी, दूसरों को इज्‍़ज़त देने जैसी सकारात्‍मक बातें आपको बड़ा करती हैं।

   वक्‍़त से सीखो, ज़माने को समझो, अपने अंदाज़ बदलो, अपनी ताक़त को पहचानो। महिला होने के नाते अपने अंदर की खूबसूरती को यूं ही खो न जाने दो। तुम भी किसी से कम नहीं हो। बस अपने व्‍यवहार पर थोड़ा सा काम करना पड़ेगा। सकारात्‍मकता आपके अन्‍दर की ताक़त को बाहर लाएगी और आप सीख पाएंगी जीना और वो भी खूबसूरती से जीना। विनम्रता आपके क़द को बड़ा करती जाती है।

   मैं यहां दावे के साथ कहती हूं कि घरेलू हो कर भी खूबसूरती से जिया जा सकता है। बड़ी बात तो यह है कि अपने स्‍वाभाविक एहसासों को आप ज़िन्‍दा रख सकती हैं। चूड़ी खनका भी सकती हो, पायल छनका भी सकती हो, आ जाएं आंखों में आंसू उन्‍हें बहा भी सकती हो।

   जीओ खूबसूरती से, संजो लो अपने अहसासों को, यूं ही बह न जाने दो। गर तमन्‍ना है घर से बाहर क़दम बढ़ाने की तो अपने में ताक़त पैदा करो- घरवालों को समझाने का, मनाने का हुनर पैदा करो। आशा है और तमन्‍ना भी है कि महिलाओं की ये आरज़ुएं पूरी हो पाएं। वो अपनी शख़्सियत को बुलंद कर पाएं। हर क़दम, हर रास्‍ता उन्‍हें स्‍वाभिमान से जीना सिखा के जाए और उसे स्‍वाभिमान से जीने के सभी मौक़े उपलब्‍ध हो पाएं।         

-सिमरन

One comment

  1. NITU SUDIPTI NITYA

    BAHUT BAHUT BADHAIYA SIMRAN JI ….

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