राष्ट्र निर्माण में महिलाओं का योगदान

संदीप कपूर

भारत का नवनिर्माण इसकी आज़ादी के साथ हुआ। राष्‍ट्र निर्माण के विभिन्न स्तरों पर भारतीय नारी का असीम योगदान रहा है। महिलाओं ने न सिर्फ कड़े संघर्ष से मिली स्वतंत्रता को बनाए रखा बल्कि हर क्षेत्र में अपने देश का नाम मेहनत, लगन और आत्मविश्वास के साथ बुलंदियों तक पहुंचाया।

राजनैतिक और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में महिलाओं ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। विजय लक्ष्मी पंडित ने 1946, 1947, 1950 और 1963 में संयुक्तराष्‍ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1953-54 में वह संयुक्तराष्‍ट्र महासभा की सदस्य भी रहीं। 1962-64 में महाराष्‍ट्र की राज्यपाल और 1964-66 तक लोकसभा की सदस्य रहीं। कुल्सुम जे. सायानी ने 1957 में यूनेस्को के तत्वावधान में हुए प्रौढ़ शिक्षा सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्हें 1959 में समाज सेवा के लिए पद्‍मश्री तथा 1969 में नेहरू साक्षरता पुरस्कार से सम्‍मानित किया गया। जैनब बेगम 1972 में विधानसभा की सदस्य निर्वाचित हुईं तथा कई वर्षों तक ज़िला कांग्रेस कमेटी श्रीनगर की अध्यक्षा रहीं। उन्होंने पिछड़ी हुई जातियों के लिए 27 वर्ष तक निरंतर कार्य किया। वह इनके बीच रहीं, इनके दुख-दर्द को समझा और बराबर जन कल्याण में जुटी रहीं। उन्होंने युद्ध विधवाओं को बसाने के लिए बहुत-सी योजनाएं बनाईं जिससे वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें। अहिंसा आंदोलनों में सहभागिता करने वाली अनुसूया बाई स्वतंत्रता के बाद केन्द्रीय विधान सभा की सदस्या चुनी गईं।

इंदिरा गांधी ने देश की प्रथम महिला प्रधानमंत्री के तौर पर शासन व्यवस्था बखूबी संचालित की। उनके नेतृत्व में भारत राजनीतिक मोर्चे पर ही आगे नहीं बढ़ा बल्कि आर्थिक, वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्रों में उसने उल्लेखनीय प्रगति की है। बैंकों में राष्‍ट्रीयकरण से समाजवाद तथा पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से देश के आर्थिक विकास को नई दिशा दी। विज्ञान के क्षेत्र में भी उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। अपनी सूझ-बूझ और दूरदर्शिता से उन्होंने भारत की विदेशी नीति को नए आयाम दिए। बंगला देश के स्वतंत्रता आंदोलन और पाकिस्तान से युद्ध के दौरान उन्होंने अद्वितीय भूमिका निभाई। राजधानी में एशियाई खेलों का सफल आयोजन तथा मार्च, 1983 में नई दिल्ली में गुट निरपेक्ष राष्‍ट्रों का शिखर सम्मेलन आयोजित कर उन्होंने अन्तर्राष्‍ट्रीय जगत में भारत का मान बढ़ाया। गुट निरपेक्ष आंदोलन की अध्यक्षा के रूप में उन्होंने युद्ध की विभीषिका को कम कर विश्‍व शांति की स्थापना के लिए अथक प्रयास किए। उनके देश की बागडोर संभालने के वक़त देश गंभीर आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा था। 1962 के चीनी हमले और 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के कारण आर्थिक स्थिति गड़बड़ाई हुई थी। 1965 में सूखे ने हालात और भी भयावह कर दिए थे। निर्गुट राष्‍ट्र सम्मेलन में भारत का बोलबाला कम हो रहा था। ऐसी अनेक समस्याओं को धैर्य से हल करके इंदिरा गांधी ने भारत की प्रतिष्‍ठा और लोकप्रियता में शानदार वृद्धि की।

शांतिदूत मदर टेरेसा ने विदेशी होते हुए भी भारत को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। कलकत्ता में ‘द सोसाइटी ऑफ द मिशनरीज़ ऑफ चैरिटी’ नामक संस्था के माध्यम से उन्होंने ग़रीबों, दीन-दुखियों, लाचारों की सेवा का बीड़ा उठाया। उन्होंने करुणा तथा प्रेम को नया अर्थ प्रदान किया। अनेक अंतर्राष्‍ट्रीय व राष्‍ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित मदर टेरेसा अपनी पूरी ज़‍िन्दगी दया का फ़रिश्ता बनी रहीं। उन्होंने दया, प्रेम, सेवा, मानवता के संदर्भों को भारत के परिप्रेक्ष्य में पूरी दुनिया में वितरित किया।

दुर्गाबाई देशमुख ने महि‍लाओं के कल्याण के लिए केन्द्रीय समाज कल्याण बोर्ड की स्थापना की। 1953 से 1965 तक वह इसकी चेयरमैन रहीं। उन्होंने अखिल भारतीय महिला परिषद् की कार्यकता के नाते व्यापक सामाजिक कार्य किए। वह महिला शिक्षा की राष्‍ट्रीय कमेटी, आंध्र महिला संघ, विश्‍ववि‍द्यालय महिला संघ, नारी रक्षा समिति तथा नारी निकेतन से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। महिला व समाज कल्याण पर उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं। 1975 में उन्हें पद्‍म भूषण की उपाधि प्रदान की गई।

पद्‍मजा नायडू ने 1956-67 तक पश्चिम बंगाल की प्रथम महिला राज्यपाल के तौर पर उल्लेखनीय कार्य किया। 1968-74 तक वह नेहरू मैमोरियल एंड म्यूज़ियम की अध्यक्षा भी रहीं। पदम भूषण डॉ. मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी ने मद्रास में कैंसर अस्पताल की स्थापना की। वह मद्रास स्टेट सोशल वेलफेयर एडवाइज़री बोर्ड की 1957 तक अध्यक्षा रहीं। दिल्ली की सुविख्यात समाज सुधारक रुस्तमजी फरीदोनजी ने महिलाओं के लिए नागरिक एवं राजनीतिक दोनों अधिकारों के लिए संघर्ष किया। वह अंत तक इंडिया ऐजूकेशन फंड एसोसिएशन की अध्यक्षा रहीं। उन्होंने दिल्ली के ‘लेडी इरविन कॉलेज फॉर वुमन’ की स्थापना भी की। दक्षिण भारत की समाज सुधारक लक्ष्मी मेनन 1952 में राज्य सभा हेतु निर्वाचित हुईं। 1952-57 तक संसदीय सचिव, 1952-57 तक डिप्टी मिनिस्टर, 1957-62 तक राज्य मंत्री तथा 1962-67 तक विदेश मंत्रालय में रहीं। उन्हें 1957 में पद्‍म भूषण से सम्मानित किया गया। 1967 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से अवकाश ग्रहण कर अपना सारा समय महिलाओं के सांस्कृतिक व सामाजिक कार्यों को समर्पित कर दिया। वह ऑल इंडिया वुमेंस कान्फ्रेंस की फाउंडर मेंबर थीं। पद्‍मश्री से सम्मानित दिल्ली की सविता बेन 1946-53 तक दिल्ली प्रदेश सेविका दल की जनरल ऑफिसर कमांडिंग रहीं। उन्होंने हरिजन व मज़दूर बच्चों के लिए तीन स्कूल खोले। दिल्ली में हरिजन प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र, महिलाओं के लिए ट्रेनिंग तथा व्यावसायिक प्रशिक्षण केन्द्र तथा दो केन्द्र शरणार्थी महिलाओं के लिए खोले। 1956-57 में वह दिल्ली पालिका केन्द्र की प्रथम महिला उपाध्यक्ष रहीं। 1972 में वह राज्य सभा हेतु निर्वाचित हुईं उपरोक्त के अलावा भी असंख्य अन्य महिलाओं ने देश की राजनीति में सक्रिय भाग लेकर इसके विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

1972-73 में महाराष्ट्र व उत्तराखंड में महिलाओं ने शराब विरोधी अभियान छेड़े। उत्तराखंड में महिलाओं ने वृक्षों से चिपककर बिगड़ते हुए पर्यावरण के प्रति अपनी चिंता जताई, इन्हीं वर्षों में महाराष्ट्र में महिलाओं का बढ़ती महंगाई के खिलाफ़ अभियान शुरू हुआ। 1975 में वामपंथी महिलाओं ने पुणे में पुरोग्रामी स्त्री संगठन तथा मुंबई में स्त्री मुक्ति संगठन स्थापित करके दलित महिलाओं व देशवासियों के उत्थान की दिशा में काम किया। 1975 में प्रगतिवादी महिला संगठन ने हैदराबाद में पहला दहेज़ विरोधी मोर्चा निकाला। 80 के दशक में महिला दक्षता समिति, कर्मिका, नारी रक्षा समिति, सहेली ने मिलकर दहेज़ के ख़िलाफ़ आवाका बुलंद की और इस सामाजिक बुराई के ख़िलाफ लोगों में चेतना पैदा की। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गांधी जी ने जिस सत्याग्रह को अपनाया था उसे उन्होंने इस देश की साधारण महिलाओं से ही सीखा था। बातचीत द्वारा समस्या का हल निकालना, वार्तालाप करना, धीरे-धीरे विरोधी को अपने अनुकूल ढालना-यह सब तरीके महिलाओं ने अपने अनुभवों से ही विकसित किए हैं।

वर्तमान में भी महिलाएं दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों में महापौर, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्य मंत्री और सांसदों के पद पर आसीन हो देश की प्रगति के लिए कार्यशील हैं। देश के विभिन्न राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायतों में भी महिलाएं विभिन्न पदों पर आसीन हैं। अनेक सामाजिक संगठनों के बल पर राष्‍ट्र की छवि निखारने का बीड़ा महिलाओं ने उठाया है, उनका यह कार्य श्‍लाघा योग्य है।

किसी भी राष्‍ट्र के निर्माण में साहित्य की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रही है। विशिष्‍ट साहित्य समाज के नागरिकों में उत्तम गुणों का संचार करता है तथा राष्‍ट्र को अंतरर्राष्‍ट्रीय स्तर पर मान दिलाता है। भारतीय साहित्य क्षेत्र में महादेवी वर्मा, सुभद्रा कुमारी चौहान से लेकर नई पीढ़ी की महिला रचनाकारों में भी राष्‍ट्र के प्रति ग़ौर, आस्था के भाव व नागरिकों के लिए चेतना के स्वर प्रस्फुटित होते आए हैं। कहानी के क्षेत्र में मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, उषा प्रियंवदा, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी पुष्पा, कवियित्रियों में कीर्ति चौधरी, शकुंत माथुर, इंदु जैन, स्नेहमयी चौधरी, अनामिका कात्यायनी के अतिरिक्त समग्र साहित्य के क्षेत्र में अमृता प्रीतम, अजीत कौर, अनिता देसाई, कमला दास, शशि देशपांडे, मंजीत कौर टिवाणा, पदमा सचदेव, प्रतिभा दे, लिली मिश्रा दे, राजम कृष्णन, प्रभजोत कौर, कुर्रतुल-एन-हैदर, तारा मीरचंदानी, मालती चंदर, महाश्वेता, कला प्रकाश, आशापूर्णा देवी, कुंदनिका कपाड़िया, सुनेत्र गुप्ता, इंदिरा गोस्वामी, नवनीता देव सेन सहित अनेक महिला रचनाकारों ने विभिन्न भाषाओं में अपनी रचनाओं में भारतीय जन-जीवन, मानवीय संवेदनाओं का गहन चित्रण कर के देश-विदेश में भारत का मस्तक ऊंचा किया। अरुंधती राय को उनके उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्माल थिंग्स’ के लिए बहुप्रतिष्ठित बुकर पुरस्कार मिला।

आज मीडिया, पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में भी महिलाओं का वर्चस्व क़ायम है। सेना, वायुयान उड़ाना, पर्वतारोहण आदि विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं ने अपनी भागीदारी करके लैंगिक असमानता को दूर कर दिखाया है। शिक्षा, विज्ञान, खेल-कूद, व्यवसाय, सूचना-प्रौद्योगिकी, चिकित्सा आदि सभी क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों से अधिक योग्य सिद्ध हो रही हैं। 9 मई, 1984 को कुमारी बछेंद्रीपाल एवरेस्ट चोटी पर विजय पताका फहराने वाली प्रथम भारतीय महिला बनीं। 5 अक्तूबर, 1989 को केरल उच्च न्यायालय की भूतपूर्व न्यायाधीश एम. फातिमा बीवी ने सर्वोच्च न्यायालय की प्रथम महिला न्यायाधीश के पद को सुशोभित किया। गीत-संगीत के क्षेत्र में महिलाओं ने आकाश की बुलंदियों को स्पर्श करके विदेशियों को भी मोहित किया है। एम. एस. सुब्बलक्ष्मी ने अपनी मीठी वाणी से कर्नाटकीय संगीत को पश्चिम के लोगों में लोकप्रिय कर दिया। स्वर कोकिला लता मंगेशकर तथा आशा भोंसले की मीठी तान सुनकर भारतीय ही नहीं सुदूर देशों में बसे विदेशी भी झूम उठते हैं। प्रथम महिला आई.पी.एस. किरण बेदी ने भारत की सबसेे बड़ी तिहाड़ जेल में कैदियों को सुधार कर अपने प्रयास शुरू किए। उन्हें वांछित सफलता के साथ-साथ मैगासेसे पुरस्कार और जोसफ बियुस पुरस्कार मिले, साथ ही विश्वव्यापी प्रसिद्धि भी। कमला देवी चट्टोपाध्याय भारतीय संस्कृति, कला रंगमंच और साहित्य की प्रमुख हस्ताक्षर रहीं हैं वह समाज सेवा और राजनीति में भी अग्रणी रहीं। उन्होंने भी मैगासेसे पुरस्कार हासिल कर भारत का मान बढ़ाया।

मीरा नायर, कल्पना लाजमी, पूजा भट्ट जैसी महिलाओं ने बतौर निर्देशक रजत पट का स्पर्श किया है तो अभिनेत्रियों के दौर पर अभिनय कला को समृद्ध करने वाली महिलाओं की फेहरिस्त काफ़ी लंबी है तथापि देविका रानी, नरगिस, मीना कुमारी, मधुबाला, वैजयन्ती माला, वहीदा रहमान, ललिता पवार, शर्मिला टैगोर, हेमा मालिनी, माधुरी दीक्षित, ऐश्वर्या राय, तब्बू सरीखी अभिनेत्रियों ने देश-विदेश के दर्शकों के दिलों पर राज करते हुए भारतीय सिनेमा की पहचान विश्व भर में बनाई है।

 आर्थिक स्तर पर महिलाओं ने स्वयं उद्यमी बनकर राष्‍ट्रीय विकास करते हुए अपनी जगतव्यापी पहचान बनाई है। सौंदर्य जगत में शहनाज़ हुसैन ऐसा नाम है जिसने भारत के कोने-कोने में मौजूद जड़ी-बूटियों को लेकर छोटा-सा व्यवसाय शुरू किया और सफलता के शीर्ष पर सौंदर्य जगत में कीर्तिमान स्थापित कर दिया। फै़शन के नभ पर दैदीप्यमान आशिमा-लीना सिंह ने एक सिलाई मशीन से कपड़े सिलने की शुरूआत कर फैशन की दुनिया में तहलका मचा दिया। आज विभिन्न तकनीकी संस्थानों में महिलाएं बढ़-चढ़ कर प्रवेश ले रही हैं। उनमें आत्मगौरव, आत्मविश्वास व साहस का संचार हुआ है और देश के आर्थिक विकास में योगदान दे रही हैं। इसी प्रकार अनेक निजी महिला संगठनों के अलावा महिला मंडल, सोसायटी फॉर प्रोफैशनल इंस्टीट्यूशन, वाई. डब्ल्यू. सी. ए., महिला पॉलिटेक्निक जैसी तमाम संस्थाओं के माध्यम से आज हज़ारों महिलाएं देश के आर्थिक विकास की दिशा में अहम भूमिका निभा रही हैं।

राष्‍ट्र के समग्र विकास तथा उसके निर्माण में महिलाओं का लेखा-जोखा और उनके योगदान का दायरा असीमित है तथापि देश के चहुंमुखी विकास तथा समाज में अपनी भागीदारी को उसने सशक्त ढंग से पूरा किया है। अपने अस्तित्त्व की स्वतंत्रता क़ायम रखते हुए वह पुरुषों से भी चार क़दम आगे निकल गई हैं। संकीर्णता, जात-पात, धार्मिक कट्टरता, भेदभाव, मानसिक गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़कर महिलाओं ने देश को एक नई सोच, नया विचार प्रदान किया है।

उन सभी नेताओं का राष्‍ट्र ऋणी रहेगा जिन्होंने सच्चे अर्थों में राष्‍ट्र को गुलामी के बंधनों से मुक्त कराया और स्वतंत्रता के उपरांत नि:स्वार्थ भाव से इसका नवनिर्माण करते हुए विश्व के शिखर तक पहुँचाया। राष्‍ट्र और आज़ाद भारत के हम सभी नागरिक उन सभी जानी-अनजानी महिलाओं के प्रति भी कृतज्ञ हैं जिन्होंने हमें मुक्त हवा में सांस लेने की स्थिति प्रदान की हमें प्रकाश प्रदान करके खुद गुमनामी के अंधेरों में खो जाने वाली उन अज्ञात वीरांगनाओं को भी।

हम हृदय की असीम गहराइयों से श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। राष्‍ट्र निर्माण में महिलाओं के अभूतपूर्व योगदान को स्मरण कर मन स्वत: ही कह उठता है नारी तुम महान हो!