भारत की प्रथम महिला पुलिस अधिकारी-किरन बेदी

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          भारत की पहली महिला प्रधान मंत्री स्व. इन्दिरा गांधी के कार्यकाल में ही 1972 में डाॅ. किरन बेदी भारतीय पुलिस सेवा में नियुक्‍त होने वाली प्रथम महिला पुलिस अधिकारी बनी। अपने कार्यकाल के दौरान वे एक सुपर कोप-परम पुलिस कर्मी के रूप में विश्‍व प्रसिद्ध हुईं। जब 26 जनवरी, 1973 को गणतन्त्र दिवस के अवसर पर दिल्ली पुलिस के पुरस्कृत दस्ते द्वारा मार्च पास्ट के दौरान किरन बेदी द्वारा किये नेतृत्व से श्रीमती इन्दिरा गांधी इतनी प्रभावित हुई थी कि उन्होंने इस महिला अधिकारी में विशेष रुचि दिखाते हुए अगली सुबह अपने साथ नाश्ते के लिए आमंत्रित किया था।

          इसी प्रकार 5 नवम्बर, 1979 को जब विशेष धर्म के सैंकड़ों हथियार बंद लोगों का जत्था तलवारें लहराता राष्‍ट्रपति भवन की ओर बढ़ रहा था, धार्मिक उन्माद ग्रस्त लोगों को रोकने हेतु किरन बेदी पुलिस दल का नेतृत्व कर रही थी, पुलिस दल पर आक्रमण होते ही उनके सिपाही तो मैदान छोड़ कर भाग निकले थे, लेकिन अकेली किरन बेदी ने हैलमेट और बेटन के सहारे उनका मुक़ाबला किया, उनका साहस देख कर सिपाही भी लौट आए और इन्होंने विस्फोटक स्थिति पर नियन्त्रण पा लिया, फलस्वरूप इस अद्वितीय पराक्रम एवं कर्त्तव्यनिष्‍ठा हेतु उन्हें 1980 में राष्‍ट्रपति द्वारा पुलिस पदक से सम्मानित किया गया। डाॅ. किरन बेदी के विलक्षण व्यक्‍तित्व पर कई टी.वी. धारावाहिक एवं टैली फ़िल्में बन चुकी हैं।

          9 जून, 1945 को पिता प्रकाश पेशावरिया एवं माता प्रेमलता की कोख से जन्मी दूसरी बेटी किरन जन्म से ही प्रतिभाशाली विद्यार्थी और खिलाड़ी रही हैं। सैक्रेड हार्ट कान्वेंट स्कूल अमृतसर से स्कूल शिक्षा, गवर्नमेंट काॅलेज फॉर विमेन अमृतसर से अंग्रेज़ी (ऑनर्स) तथा पंजाब विश्‍वविद्यालय से राजनीति शास्‍त्र में स्नातकोत्तर स्तर की शिक्षा प्राप्‍त करने के बाद अमृतसर में ही खालसा काॅलेज फॉर विमेन में दो वर्ष तक प्राध्यापिका के रूप में काम किया। फिर 16 जुलाई, 1972 को भारतीय पुलिस सेवा में प्रथम महिला अधिकारी के रूप में भर्ती हुई तो भारत भर के लिए यह अचम्भे वाली बात थी।

          लान टेनिस खेल की शौक़ीन किरन ने अन्तर विश्‍व विद्यालय, जूनियर राष्‍ट्रीय लानटेनिस, एशियाई लान टेनिस चैंपियन शिप जीतते हुए कई अन्तर्राष्‍ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत का नेतृत्व करते हुए देश के लिए ख़िताब जीते। 1980 में ही किरन बेदी को सातवां जवाहरलाल नेहरू राष्‍ट्रीय एकात्मकता पुरस्कार मिला एवं वर्ष की सर्वश्रेष्‍ठ महिला घोषित हुई।

          प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी रहने वाली समानता के स्तर पर सोचने की भावना से ओत-प्रोत किरन बेदी ने अपने कार्यकाल में न किसी से ग़लत मूल्यों पर समझौता किया और न ही किसी को रियायत दी। इसकी उदाहरणस्वरूप, किरन बेदी ने डी.सी.पी. ट्रैफ़िक के पद पर कार्य करते हुए जब ग़लत पार्किंग के विरुद्ध अभियान चलाया तो 5 अगस्त, 1982 को श्रीमती इन्दिरा गांधी की एम्बैस्डर कार (डी.एच.आई. 1817) का कनाट सर्कस में ग़लत जगह खड़ी करने के कारण चालान काट दिया था, मीडिया ने इस ख़बर को जन-जन तक पहुंचा कर किरन बेदी की कार्य शैली से अवगत करा दिया था। उन्हीं दिनों ग़ैर कानूनी तौर पर पार्किंग की हुई गाड़ियों को क्रेन द्वारा उठवा कर थाने भिजवाने के कारण किरन बेदी, क्रेन बेदी के नाम से जानी जाने लगी थी।

          खिलाड़ी बृज बेदी से विवाह उपरान्त किरन पेशावरिया से किरन बेदी बनी किरन ने एक-दम साधारण बिना किसी तामझाम के विवाह कर के समाज को एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया। किरन बेदी ने अपने कार्यकाल के दौरान ही एल.एल.बी. तथा पी.एच.डी. की उच्च डिग्रियां भी प्राप्‍त की। उन्होंने दिल्ली में नीले-सफेद रंग के पुलिस सहायता केन्द्र बनवा कर, नागरिकों की सहायता हेतु सिपाही तैनात किये। आवश्यक कर्ज़ एवं सहायता का प्रबंध कर अवैध शराब बनाने वालों को यह धन्धा छोड़ कर ईमानदारी से जीविकोपार्जन करने के लिए प्रेरित किया। आस-पड़ोस में मैत्रीभाव विकसित करने के उद्देश्य से महिला शांति समितियां स्थापित की। समाज के सहयोग से अपराधों की गिनती को घटाया। नशा मुक्‍ति केन्द्रों की स्थापना कर लोगों को नशीले पदार्थों के सेवन से रोकने का सफल प्रयास किया। 1982 की एशियाई खेलों के दौरान यातायात व्यवस्था की अध्यक्ष के रूप में ऐसी योजनाएं तैयार करके क्रियान्वित की कि यातायात निबन्धित रूप से चलता रहा जिसकी सर्वत्र सराहना हुई।

          1993 में प्रसिद्ध तिहाड़ जेल की महानिरीक्षक बनने के उपरान्त उन्होंने 8500 से ज्‍़यादा क़ैदियों वाली जेल का कायाकल्प करते हुए उसे बंदीगृह के स्थान पर सुधार गृह का स्वरूप देकर एक मिसाल प्रस्तुत की। क़ैदियों को पढ़ना-लिखना सिखाने से लेकर, कई कार्यों का प्रशिक्षण देकर जेल हेतु आमदन पैदा की और उसे जेल के सुधार के लिए लगाया। क्रियात्मक एवं अाध्यात्मिक रूप से उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा कर सकारात्मक जीवन शैली अपनाने हेतु प्रेरित किया।

          अनुशासन, आत्मविश्‍वास एवं प्रतियोगी भावना, व्यवस्था में परिवर्तन हेतु अधीर, प्रत्येक क्षेत्र में करने की शक्‍ति, काम करवाने की शक्‍ति तथा सुधारने की शक्‍ति की प्रबल संभावनाओं से भरपूर रहने वाली इस प्रथम महिला पुलिस अधिकारी को उसकी उत्कृष्‍ट सेवाओं हेतु 1994 के रैमन मेगसेसे से पुरस्कार से नवाज़ा गया तथा तिहाड़ जेल के 9100 क़ैदियों ने जेल परिसर में ही इस खुशी में एक विशेष समारोह आयोजित किया।

          डाॅ. किरन बेदी ने दिल्ली पुलिस द्वारा संचालित संस्था नवज्योति की स्थापना की जिसके द्वारा 10,000 से अधिक नशेड़ियों का उपचार हो चुका है। यह संस्था झुग्गी-झोंपड़ी क्षेत्र में नि:शुल्क प्राथमिक पाठशाला चला कर साक्षरता एवं व्यवसायिक प्रशिक्षण भी दे रही है। इसी प्रकार प्रगति कार्यक्रम चलाने हेतु इंडिया वीजन फाउन्डेशन की स्थापना भी की है।

      566    डाॅ. किरन बेदी ने हमेशा नदी के बहाव के विरुद्ध तैरना पसंद किया है। भले ही यह प्रतिकूल धारा कितनी भी तेज़ क्यों न हो। वह मानती है कि ऐसे में आप फिर भी कम से कम वहां पहुंच सकते हैं जहां कोई दूसरा नहीं पहुंच सकता। अपनी विशिष्ट, पारदर्शी, सुधारात्मक एवं समानता के स्तर पर कार्य करने वाली इस महिला अधिकारी को कई अवरोधों को पार करना पड़ा, कई वरिष्‍ठ अधिकारियों, केन्द्रीय मन्त्रियों के अप्रत्यक्ष कोप का भाजन बनना पड़ा। भ्रष्‍ट एवं कर्त्तव्य से जी चुराने वाले अधिकारियों के लिए वह अभिशाप बनी है तो कइयों के गले की हड्डी जिसे ने निगला जा सकता है, न उगला जा सकता है। उसे कई प्रकार से दबाने की कोशिश की गयी लेकिन वह हर बार हर अन्याय एवं शोषण के विरुद्ध चट्टान की तरह डट गयी और विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी। उनकी बेटी के बीमार होने पर छुट्टी मंज़ूर न करना और मां की ममता के वशीभूत गोवा से दिल्ली बेटी के पास आने को मीडिया में किरन बेदी को फरार प्रचारित करना, उसी बेटी के एम.बी.बी.एस. प्रवेश के विरोध में मिजोरम में युवा आन्दोलन को हवा देना, ऐसी कई मुश्किलों एवं कष्‍टों से गुज़रना पड़ा है इस महिला पुलिस अधिकारी को। लेकिन सच्चाई पर अडिग खड़े रहना और प्रतिकूल परिस्थितियों में बिना घबराए अपने साथ हो रहे अन्याय के विरोध में आवाज़ बुलन्द करना तो कोई किरन बेदी से सीखे। उसे चापलूसी, गुटबाज़ी, स्वार्थीपन, अहम-भाव, राजसी दख़ल, कामचोरी और शोषण से सख्‍़त नफ़रत है।

          कार्यकाल के अंतिम वर्षों में किरन बेदी की वरिष्‍ठता को नज़र अन्दाज़ करके उनसे जूनियर अधिकारी को पदोन्नति देने के खिलाफ़ भी किरन ने राष्‍ट्रपति और प्रधानमन्त्री के समक्ष आवाज़ उठाई । लेकिन उनकी आवाज़ न सुनी जाने के कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने स्वाभिमान को सर्वोपरि रखा। हालांकि बाद में उन्होंने इस बात को तूल न देते हुए मौन रहना ही बेहतर समझा।

          महिलाओं के विषय में किरन बेदी के विचार हैं कि जब तक महिलाएं देने की नहीं, पाने की ही स्थिति में बनी रहेंगी, उन पर अन्याय होता रहेगा। सामर्थ्‍य हासिल कर महिलाओं का कठिन या ग़ैर-परंपरागत पदों पर पहुंचना, सोचे-समझे विकल्प का चुनाव होता है। भारतीय महिला जन्मजात प्रतिबंधों को अपने दृढ़ संकल्प एवं इच्छा शक्‍ति से ही तोड़ सकती है। फिर पुरुष भी उसके समर्थन एवं सहयोग हेतु आगे आते हैं। अधिक से अधिक महिलाओं के कार्यक्षेत्र में आने से स्थिति परिवर्तन सम्भव है। महिला धन-सम्पदा से सामर्थ्‍य सम्पन्न नहीं होती, बल्कि अपने निर्णय स्वयं करके उनके परिणामों को झेलने वाली महिला सामर्थ्‍य सम्पन्न होती है। इसके लिए परिपक्व मस्तिष्क, आत्मगौरव तथा स्वयं को हीन न समझने की क्षमता ज़रूरी है। महिलाएं अपनी अर्न्तात्मा की नियन्त्रण व्यवस्था में विश्‍वास रखें, ऐसे व्यक्‍ति आसानी से नहीं भटकते, यदि भटक भी जाए तो उसके नैतिक मार्ग पर लौट आने की संभावना अधिक होती है। महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों के लिए न लड़ने पर उनकी उपेक्षा होती है।

          डाॅ. किरन बेदी को साड़ी अथवा परम्परागत महिला परिधानों से नफ़रत क्यों है ? तब उनका जवाब होता है कि बिना शक ये अति गरिमापूर्ण महिला परिधान हैं, जिन से नारी में नारीपन का बोध बढ़ता है। लेकिन मुझे इस सब की आदत नहीं है, मेरे  ख्याल में यह मेरी व्यक्तिगत पसंद या कह सकते हैं मनोवृत्ति की स्पष्ट झलक।

          जब प्रथम नियुक्ति के समय आई.जी भवानीमल ने किरन को आॅफ़िस में साड़ी पहनने की सलाह दी थी तो किरन का उत्तर था, “सर, यदि कोई चीज़ मुझे नौकरी से दूर कर सकती है तो वह है साड़ी पहनने की मजबूरी।” ऐसे विवादों और अपवादों के चलते भी डाॅ. किरन बेदी आज लाखों-करोड़ों युवतियों-युवकों के लिए आदर्श एवं प्रेरणा स्त्रोत बनी हुई है। उनके जीवन पर पंक्तियां एक-दम सटकी उतरती हैं –

         “मैं राहों पर नहीं चलती, मैं चलती हूं तो राह बनते हैं।”

          किरन बेदी का टी.वी.चैनल पर आप की कचहरी कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हुआ। जिसमें किरन बेदी बतौर जज विशेष रूप से पीड़ित महिलाओं की व्यथा सुनती फिर दोनों पक्षों को आमने-सामने खड़ा करके उनसे जिरह करती। दोषी को उसकी ग़लती का एहसास करा कर भविष्य में पुन: न दोहराने का संकल्प बुलवाती और कानून की दृष्टि से उन्हें नफा नुकसान समझाती तथा ज्‍़यादातर लोगों की आपसी सुलह करा कर महिलाओं को आत्मनिर्भर हो कर जीने का रास्ता दिखाती। महिलाओं को विपरीत परिस्थितियों में हालात का मुक़ाबला करने की प्रेरणा दिलाती। कई बार अपनी स्वयं सेवी संस्था द्वारा उनकी आर्थिक सहायता भी करती।

          गत वर्षों में किरन बेदी अन्ना हज़ारे द्वारा संचालित एंटी करॅप्शन सोसायटी टीम की प्रमुख सदस्य बनी और उन्होंने पूर्ण सक्रियता दिखाते हए जन लोकपाल बिल आने हेतु जी जान से स्वयं को समर्पित किया। हालांकि इस महत्वपूर्ण कार्य को अन्जाम देने के बदले उन पर विरोधियों द्वारा अनेक प्रकार के हमले भी हुए, उन पर दोष भी लगाए जाते रहे। पर वह हमेशा की भांति अग्निपरीक्षा से गुज़र कर स्वयं को खरा सोना सिद्ध करती रहीं तथा अन्ना टीम की प्रमुख सदस्य होने के नाते आम लोगों का ध्यान आकिर्षत करके चर्चा में रही।

          परन्तु राजनीती में आकर किरन बेदी को हार का मुंह देखना पड़ा। राजनीति में आना उनकी ग़लती रही या अभी उनकी उपलब्धियों में एक और अध्याय जुड़ना अभी शेष है, यह तो समय ही बताएगा।

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