नारी एक कविता या व्यथा

                                                                                                                                -रमेश सोबती

चुप कर कुड़िये, क़तरा-क़तरा न रो
इन मोटी-मोटी खूबसूरत आंखों से
झड़ते मोतियों को
ऐसे मत खो

                              दर्द का इतिहास

फ़ीजी के सुविख्यात कवि जोगिंदर कंवल की कविता का यह अंश है। वैदिक साहित्य से नारी की स्वतंत्रता के चाहे हम कितने ही उदाहरण व दृष्‍टांत ढूंढ़ लें इस तथ्य को कोई भी नकार नहीं सकता कि हमारी पुरातन संस्कृति कितनी भी उदार रही हो पर अपने दृष्‍टिकोण में वह थी और आज भी है पितृसत्तात्मक ही। यह सत्ता ही नारी को गौण व दूसरे दर्ज़े में डालने वाली निर्दय व्यवस्था है, नारी के अचेतन मन में पुरुष की पराधीनता प्रत्यक्ष या परोक्ष समाई हुई रहती है।

मेरी बेटी
अपनी गुड़िया से कहती है
मर जाती तो अच्छा था
मुझे कितना परेशान करती है
ठीक यही बात मेरी नानी ने
मेरी मां से कही थी
और मां ने मुझ से कही थी।

                                     -जयंती रथ

मनु आदि स्मृतिकारों ने भी प्रतिपादित कर दिया कि स्त्रियां स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं हैं, पुरुषों को चाहिये कि वे उन्हें अपने अधिकार में रखें, बचपन में वह पिता के अधिकार में, यौवनावस्था में पति के आधिपत्य में और पति की मृत्यु के बाद पुत्र के संरक्षण में रहें, मेरी मां की मां अपनी बेटी को कहानी सुनाते हुए बताती है कि बच्चे पालना बहुत कठिन काम है, पहले भगवान शंकर जी यह काम किया करते थे, जब वे यह कार्य करते थक गए तो उमा जी से कहा अब यह काम वे संभालें, जब से यह दायित्व पार्वती जी ने अपने ऊपर लिया उन के गले ही पड़ गया, इसलिए उन्हें गृहकार्य में प्रवीण होना पड़ा और वह घर की चारदीवारी के भीतर सीमित हो गई और इसी कारण नारी का अपना अलग एक स्वतंत्र व्यक्‍तित्व ख़त्म हो गया उसकी अपनी सोच मर गई।

बचपन में ही
भाई के हाथ में थमा दी गई
जीवन-विधायिनी क़लम
मेरी हाथ में झाडू़
………जब बड़ी हुई…………….
पुरुष के पांव की जूती
या शैय्या का सिंगार
गालियां खाती और पांव दबाती मैं

                                   -डॉ.सावित्री डागा

आज भी नारी रूढ़ियों, कुपरंपराओं की दासी बनी हुई है आज भी समाज में ऐसे बहुतेरे परिवार हैं जहां पारंपरिक धार्मिक रू‍ढ़िवादिता के कारण दमघोंटू वातावरण है, जहां अभी भी लड़का यानी सौ नम्बरी शुद्ध सोना और लड़की खोट मानी जाती है, आज भी ऐसे दृश्य देखने में आते हैं जब विवाह के अवसर पर शहनाई के स्वर सिंगार की जगह विराग गाने लगते हैं जब हंसी व कहकहों का माहौल बदल जाता है और उसका स्थान ले लेती हैं सिसकियां और आहें :

बेटियां
मां के आंगन में
बासमती के चावल-सी महकती हैं
और जब
लांघ जाती हैं घर की दहलीज़
आंगन अचानक
खाली हो जाता है
और खुशबू गुम हो जाती है

                            -रमेश सोबती

इस विराट आकाश के ग्रहमंडल के बीच क्या नारी का वांछित स्थान यही है। नारी लेखिकाओं ने अपनी लेखनी द्वारा वही लिखा जो जहां समाज पीड़ित था। क्योंकि वे उस व्यवस्था की अंग थी या हैं। साहित्यिक गलियारों से निकलने और गुज़रने से शायद यही उद्देश्य निकलता है कि भारतीय परिवेश में हर काल, हर प्रांत और भाषा में नारी ने अपने को व्‍यक्‍त किया है। उन के तीखे स्वर, विद्रोह मुद्रा, विद्रोही स्वर सदा से उनके पास थे। इस देश में क़लम तथा ज़बान की आज़ादी रही है, भले ही सामाजिक जकड़न हो मगर उस जकड़न को सृजन ने हमेशा खंडित किया है। उस खामोश पीड़ा को सहती नारी में सृजन के प्रवाह ने वह साहस प्रदान किया जिस ने उनकी संवेदना को अभिव्यक्‍ति और विचार की विभिन्न विधाओं के स्वरूप में बांधकर उन्हें पहनाया।

आतिशदान की आग और
गर्म चाय से उठती भाप के बीच
घर की दीवारों से घिरी,
पेड़ों की छतनार साए के नीचे
मैं चुपचाप आहिस्ता-आहिस्ता
सुलग रही हूं।

                             -साजदा, अरबी कवयित्री

हमारे पड़ोसी देशों में भी नारी की स्थिति कमोवेश वही है जो भारत में है। बांग्‍ला देश की तस्लीमा नसरीन, पाकिस्तान की फहमीदा रियाज़, किश्‍वर नाहिद ऐसे नाम हैं इन लेखिकाओं ने राजनीति एवं विचारधारा के स्तर पर क्या-क्या बर्दाशत किया लेकिन लिखना नहीं छोड़ा अपनी तंगहाली से तंग आकर आत्महत्या तक कर ली लेकिन अंतिम सांस तक लिखती रहीं।

अमरता में मेरा विश्‍वास नहीं है
तब वे मुझे दफ़नाएंगे क्यों ?
इस हसीन धरती को छोड़ कर
मैंने नहीं चाहा
क़ब्र के अंधेरे में समा जाऊं।

                              -मरीना, रूसी कवयित्री

भारतीय नारी लेखिकाओं ने अपने व्यक्‍तिगत दु:खों से हट कर दूसरों की समस्याओं को भी अपने लेखन का विषय बनाया और गु़लाम भारत के स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। सुभद्रा कुमारी चौहान, महादेवी वर्मा, रानी चूड़ावत, आशापूर्ण देवी तथा महाश्‍वेता देवी लेखन में विचार के साथ-साथ सामाजिक मिशन लेकर दाख़िल हुई सरोजिनी नायडू, रूकइया शेखावत, सुगरा हुमायूं मिर्ज़ा आदि कितने ही नाम हैं जिन्होंने साहित्य के साथ समाज के उत्थान के लिए भी बहुत योगदान किया।

औरत का हंसना-सृजन
विहंसना-विलास
विलखना-सर्वनाश
औरत : एक जन्म, एक कर्म, एक मृत्यु
औरत : जन्म से जन्म की संपूर्ण यात्रा

डॉ.सत्यनारायण व्यास अपने एक आलेख में लिखते हुए कहते हैं कि ‘सीमोन’ ने यह ठीक आकलन किया कि ‘पुरुष के मुहं से’ ‘औरत’ शब्द एक अपमान-जनक ध्वनि रखता है उसको इस बात का अभिमान होता है कि वह एक पुरुष है’ वह भूल जाता है कि औरत एक जन्म है, एक कर्म है और एक मृत्यु और यही औरत जन्म से जन्म की संपूर्ण यात्रा है, मां है, स्वामिनी है ताकि संसार पीड़ा के दिनों में उसे याद कर सके, फ़रियाद कर सके, उसके सामने आंसू बहा सके, हंस सके, रो सके, औरत…………उसे स्वयं से घृणा का अहसास किस ने करवाया ? पुरुष ने, ऐसा क्यों ? नारी सभी व्यवहार में, जीवन के प्रत्येक मोड़ पर पवित्रता की धूल झाड़ते ही चित्त क्यों हो जाती है ? एकदम से चित्त हारी हुई…..पुरुष गर्व से जीतता है क्यों ? नारी कितनी बड़ी ही क्यों न हो जाए उसकी महानता कहां सो जाती है ? नारी किन-किन ढंगों से अपने आप को जांच सकती है यह एक विचार का विषय है लेकिन उसकी व्यथा एक कथा है पुरातन, उस की व्यथा एक कविता है। युगों-युगों से अब तक नारी के प्रति पुरुष ने जो कुछ भी लिखा है उसको संशय की दृष्‍टि से देखना होगा। क्यों वह एक मुजरिम भी है और न्यायधीश भी।

एक मुजरिम
न्यायधीश कैसे बन सकता है
उसके हर फै़सले को संशय की दृष्‍टि से
देखना होगा।

                                                                                                             -रमेश सोबती

सारे विवेचन का निष्कर्ष यह है कि पीड़ा आत्मा का परिष्कार करती है, पीड़ा या संवेदनाएं जीवन का एक ऐसा काव्य है जो सारी जाति को एक सूत्र में बांधने का प्रयास करता है, नारी चाहे भारत की हो, रूस की हो, जापान की या किसी भी अन्य देश की उस की सतत् जागरूकता और संघर्ष ही उसे समाज में वांछित बराबरी दिला पाएगा, पुरुष अधीनता के कारण उस की मनोवृत्ति पिंजरबद्ध पक्षी की तरह मुक्‍त आसमान में उड़ने की इच्छा उदासीनता में ग्रस्त हो गई है।

एक धर्मात्मा ने तो अपनी पत्‍नी को
शाप देकर पत्थर ही बना दिया था
एक और महापुरुष ने
अपनी अर्धांगिनी की
अग्नि-परीक्षा लेकर भी
उसे क्षमा नहीं किया था।

                                   दर्द का इतिहास

या
बिना सीता के राम कैसे ?
राम का यश सीता पर निर्भर है
सीता का राम पर नहीं

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