त्याग

-विनोद ध्रब्याल ‘राही’

पूरा हॉल ठहाकों से गूंज रहा था। करीब दो महीने बाद वर्मा और खन्ना परिवार इक्ट्ठे हुए थे।

“मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था कि हम दोनों समधि बन जाएंगे। राजीव और काजल की सगाई ने हमारी बचपन की दोस्ती को रिश्तेदारी में बदल दिया।” राजीव के पिता खन्ना जी बोले।

“सच कह रहा हूँ, मुझसे तो खुशी संभाले नहीं संभलती। इस रिश्ते ने हमारी दोस्ती में नई उमंग भर दी है। राजीव जैसा गुणी दामाद पाकर मेरी सारी चिंताएं मिट गई।” काजल के पिता वर्मा जी ने अपनी खुशी ज़ाहिर की।

“वर्मा भाई साहब, काजल बेटी भी तो लाखों में एक है। ऐसी ही बहू चाहिए थी हमें। आपने अपनी बेटी सौंपकर हमारे ऊपर बहुत बड़ा एहसान किया है।” कहते हुए राजीव की माँ लता ने पास बैठी काजल के सिर पर स्नेहिल हाथ फेरा। काजल की गर्दन झुक गई। लज्जा गहरा गई। “यह सब बातें बाद में होती रहेंगी। पहले कुछ खा पी लें तो ठीक रहेगा। काजल जाओ, शंकर और तुम खाने के लिए कुछ ले आओ।” काजल की माँ रमा बोली!

नौकर शंकर पास ही दीवार के साथ पीठ टिकाए खड़ा सबकी बातें सुन रहा था। काजल के साथ रसोई में चला गया। रसोई में मिठाइयां प्लेटों में सजी तैयार थी। नौकरानी गर्मागर्म पकौड़े बना रही थी। हाल में बैठे सब लोगों के ठहाके सुनाई पड़ रहे थे। कुछ ही देर में मिठाइयां, पकौड़े और चाय टेबल पर सज गई। काफ़ी देर की गप्पबाज़ी के बाद सब को भूख सताने लगी थी। सभी चाय की चुस्कियों का आनंद लेने लग पड़े। राजीव गद्-गद् था। नज़रें काजल पर टिकी हुई थी। काजल भी बीच-बीच में पलकें उठा कर उसे देख लेती तो वह खुशी से खिल जाता। अपने जीवन का हर सुख उसे काजल की कजरारी आँखों में नज़र आ रहा था।

काजल अपने माता-पिता के साथ राजीव के घर दो तीन महीने में एकाध बार आ जाती थी। राजीव भी उनके घर आता-जाता रहता था। कभी किसी काम की वजह से तो कभी किसी दूसरे बहाने से काजल से मिलने पहुँच जाता था। काजल को चाहने लगा था परन्तु कभी खुले मुँह बात नहीं कर पाया। रिश्ते की बात चलने के बाद भी दोनों आपस में खुल नहीं पाए थे। काजल को अपनी दुलहन बनाने का उसका सपना अब साकार होने जा रहा था।

“अब राजीव और काजल हम बूढ़ों को कुछ देर के लिए अपने हाल पर छोड़ दें तो ठीक रहेगा। मेरे ख्याल से इन्हें गार्डन में चले जाना चाहिए। फिर हमें घर पहुंचने में भी तो दो घंटे लग जाएंगे। क्यों वर्मा, क्या कहते हो?” चाय का कप ख़ाली करके टेबल पर रखते हुए खन्ना जी ने कहा तो सब हँस पड़े।”

“हां-हां, जाओ काजल बेटी। राजीव को अपना गार्डन दिखाओ।” कह कर वर्मा जी ने सिगरेट सुलगा ली। धुएं के उड़ते छल्लों को फूंक मार कर मिटा दिया। फिर टांग पर टांग चढ़ा कर बैठ गए।

राजीव और काजल उठकर गार्डन में चले गए। गार्डन के चारों ओर विरले पेड़ थे। पूर्व की ओर दिखते सफ़ेद पर्वत धरती पर स्वर्ग का आभास करवा रहे थे। मंद शीतल पवन बह रही थी। भंवरे अपनी वीणा की तान से रंग-बिरंगे फूलों को रिझाने की पुरज़ोर कोशिश में थे। दोनों फ़व्वारे के पास बैंच पर बैठ गए।

“काजल, तुम इस रिश्ते से खुश तो हो न?” कहते हुए राजीव ने काजल का हाथ थाम लिया तो वह छुईमुई-सी शर्मा गई।

“बहुत खुश हूँ। आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?” मन में हाथ छुड़ाने का ख्याल तो आया पर कोशिश न कर पाई। एक आकर्षक दिव्य-सी चमक समेटे उसके चेहरे पर लज्जा और गहरा गई। गुलाब की पंखुड़ियों से होंठ कुछ कहने के लिए खुलना चाहते थे पर फड़-फड़ा कर रह गए। हल्की-सी मृदुल मुस्कान में गम्भीरता का दुर्लभ सुमेल था। हल्के गुलाबी रंग के सूट में से गोरी कसावदार संगमरमरी काया अपनी झलक देने पर मजबूर थी।

“माना कि शर्म लड़कियों का गहना है परन्तु मेरे ख्याल से अब शरमाना नहीं चाहिए।” काजल को शरमाते देख राजीव बोला। “मैं कहां शरमा रही हूँ? आप बात कीजिए न।” काजल ने अपने तन मन में हरियाली भरते हुए कहा। ”इस साल तुम्हारी बी.ए. हो जाएगी। उसके बाद क्या करने की सोची है?” राजीव ने पूछा। काजल की नज़र ज़मीन पर टिकी हुई थी। राजीव उठ कर ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया।

“आपकी सेवा करूंगी। आगे पढ़ने का मन नहीं है।”

“कॉलेज लेक्चरार के साथ खुश रह पाओगी? ऊपर से कहानियां लिखने का शौक़ भी है मुझे। वो भी पढ़नी पड़ेंगी।”

“मुझे मंज़ूर है। दिन में एकाध घंटा निकाल लिया करूंगी इस सिर खपाई के लिए।” काजल ने कहा तो दोनों खिल-खिला उठे।

‘खुशी के मौक़े पर काजल के चेहरे की बेरौनकी उसे तरह-तरह के ख़्यालों की गहरी खाई में धकेल रही थी। काजल के इन शब्दों ने जैसे उसे जीवन दान दे दिया। वह पूरी तन्मयता से काजल को निहार रहा था। दिल तो चाह रहा था कि आज ही उसे अपने साथ ले चले परन्तु यह उसके लिए असम्भव था। कार में बैठ कर उसकी काया तो दूर जा रही थी परन्तु आत्मा वहीं काजल के साथ आलिंग्नबद्ध थी।’

दूसरे दिन कॉलेज में शीतल ने राजीव को कार से उतरते ही घेर लिया। शीतल को देखकर वह चौंक पड़ा। उसके चेहरे का उड़ा रंग देखकर शीतल की अनचाही हँसी निकल गई। इलाके के समृद्ध व्यक्तियों में से एक गणपत सहाय की इकलौती संतान शीतल कई बार राजीव को अपने दिल में मचलती भावनाओं से अवगत करवा चुकी थी। राजीव हमेशा कन्नी काट जाता। गणपत सहाय और राजीव के पिता खन्ना जी व्यापार में साझीदार थे इस लिए राजीव और शीतल की एक दूसरे के परिवार में अच्छी पहचान थी।

शीतल बी.एस.सी. द्वितीय वर्ष की छात्रा थी। राजीव कैमिस्ट्री का पीरियड लेने शीतल की क्लास में जाता तो शीतल की नज़रें राजीव पर ही टिकी रहती। कभी-कभी तो वह हद से गुज़र जाती। राजीव के समझाने पर भी कोई असर न होता। राजीव के प्रति उसका प्यार पागलपन की हद तक पहुंच चुका था। बात-बात पर जान देने की धमकी दे डालती। उसके स्वभाव को देखते हुए राजीव उसके साथ गुस्से से पेश नहीं आता था। इसमें कोई शक नहीं था कि वह काजल से कहीं अधिक खूबसूरत और चंचल थी। कॉलेज के अनेकों लड़के उसके दीवाने थे। सैंकड़ों निगाहें उसे ढूंढती थी।

स्टैंड पर कार लगाने के बाद, किसी तरह शीतल से पीछा छुड़ा कर अपनी लैब में पहुंचा। लेक्चर की तैयारी के लिए किताब खोली ही थी कि शीतल भी वहां आ पहुंची। सामने की कुर्सी पर बैठ गई। राजीव ने किताब पर सिर झुकाए हुए ही पलकें उठा कर उसे आते देख लिया था परन्तु अनजान बना किताब में डटा रहा। शीतल के चेहरे की बढ़ी हुई लाली और हाव-भाव से साफ ज़ाहिर था कि वह गुस्से में है।

“मेरे बार-बार कहने पर भी आप नहीं माने। सगाई कर ही ली। क्या कमी है मुझमें?” शीतल की बात सुनकर किताब पर टिकी राजीव की नज़रें उठकर शीतल की आँखों पर ठहर गई। वह यह सोचकर हैरान था कि सगाई की ख़बर शीतल तक कैसे पहुंची? सगाई काजल के घर में हुई जो यहां से पचहत्तर किलोमीटर दूर है।

“मेरे ख़्याल से इस वक़्त तुम्हारा फिज़िक्स का पीरियड चल रहा है। मिस क्यों कर दिया?” राजीव ने शीतल को विषय से हटाने की कोशिश की।

“मैं पाँच साल की बच्ची नहीं हूँ जो आप बात से भटका लेंगे। जितना मैं आपको चाहती हूँ, उतना कोई और लड़की नहीं चाह सकती।” शीतल की वाणी में दृढ़ विश्‍वास था और एक चेतावनी भी…. “मैं तुम्हें बात से नहीं भटका रहा और तुमसे किसने कह दिया के मेरी सगाई हो चुकी है?”

“मैं कुछ भी नहीं सुनना चाहती। एक बार फिर कह देती हूँ, उस लड़की से शादी की तो मैं अपनी जान दे दूंगी या उसकी जान ले लूंगी।” गुस्से में लाल शीतल आँसू पोंछती हुई बाहर चली गई। राजीव ने सिर हिलाते हुए मुँह से गहरा श्‍वास खींचकर छोड़ा। कोहनियां टेबल पर टिका कर हाथ गालों पर रख लिए और आँखें बंद कर ली। यह उसके लिए नई बात नहीं थी। शीतल भले ही उसे बहुत चाहती हो परन्तु वह काजल से बेपनाह प्यार करता था। वह इस बात से भी अनजान नहीं था कि यह शीतल की कोरी धमकी नहीं। वह कुछ भी कर सकती है।

एक तरफ़ शीतल की धमकियां थी तो दूसरी तरफ़ काजल के प्रति प्यार की तड़प। भावुक राजीव के लिए उलझी मानसिकता के वेग को नियंत्रित करना मुश्किल था। सगाई हुए एक सप्‍ताह बीत चुका था। काजल से दूर रह पाना उसके लिए मुश्किल हो रहा था। कार स्टार्ट की, काजल से मिलने उसके कॉलेज के लिए निकल पड़ा। काजल और उसके बीच की दूरी जितनी कम हो रही थी, मिलने की बेचैनी उतनी बढ़ती चली जा रही थी। काजल की बड़ी कजरारी कंचन आँखों में सजीवता थी।

कॉलेज में पहुँच कर कार पार्क की। काजल के लिए मैसेज भेजकर कैन्टीन में बैठ गया। इंतज़ार भारी पड़ रहा था। नज़र बार-बार घड़ी पर जा टिकती। करीब पन्द्रह मिनट के बाद काजल आई। दोनों के चेहरे मुस्कान में फैल गए। “गुड मॉर्निंग सर!” कहते  हुए काजल कुर्सी पर बैठ गई। दो कोल्ड ड्रिंक अॉर्डर किए। “सर की उपाधि से कब रिटायर करोगी मुझे? इसका मतलब तुमने अभी तक मुझे अपना मंगेतर नहीं माना है।” राजीव ने कहा तो काजल की हँसी छूट गई। फूलों-सी झर-झर झरती हँसी राजीव के तन-मन को गुदगुदा रही थी। “मैं समझ गया। तुम मुझे प्राणपति, नाथ, स्वामी, प्रिय… जैसी कोई भी उपाधि नहीं देना चाहती।”

“सोचना पड़ेगा…..।” काजल ने कृत्रिम अक्खड़पन में कहा। वेटर कोल्ड ड्रिंक रख गया। काजल ने एक कोल्ड ड्रिंक राजीव की तरफ़ बढ़ा दिया। राजीव काजल को ऐसे देखे जा रहा था जैसे बरसों बाद मिला हो। काजल शर्म के मारे सिमटी जा रही थी।

“तुम से दूर रह कर जीना मुश्किल हो रहा है। अब और इंतज़ार नहीं होता।” राजीव ने काजल को अपनी बेचैनी बताई।

“इंतज़ार तो करना ही पडे़गा और इंतज़ार का फल भी तो मीठा होता है।” काजल ने कोल्ड ड्रिंक उठाकर मुँह से लगा लिया।

राजीव की नज़र काजल की अंगूठी पर पड़ी। एक विद्युत से झटके ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। मुस्कुराहट में फैले होंठ सिकुड़ गए। उसे याद हो आया- यह तो वही अंगूठी है जो उसके दोस्त कमल ने अपने नाम का पहला अक्षर ‘के’ लिखवाकर अपनी प्रेमिका को दी थी….. तो क्या काजल ही कमल की प्रेमिका?….. नहीं-नहीं, यह कैसे हो सकता है…. हो भी सकता है…. आस्ट्रेलिया जाने से पहले कमल एक वर्ष तक काजल के कॉलेज में लेक्चरार था…. अंगूठी काजल की अपनी भी हो सकती है…. उसके नाम का पहला अक्षर भी तो ‘के’ है… पर डिज़ाईन्?…. डिज़ाईन् भी तो वैसा ही है… हो भी सकता है….। किसी तरह कोल्ड ड्रिंक का गिलास ख़ाली करके टेबल पर रख दिया। वेटर से सिगरेट मंगवा कर सुलगा लिया। उसका चेहरा सफेद पड़ चुका था।

“क्या बात है? आप चुप क्यों हो गए?” राजीव को चुप देखकर काजल ने पूछा।”काजल, अब मैं जाना चाहूंगा।” राजीव के शब्दों के साथ निकल आए धुएं के गुब्बार ने दोनों के बीच एक परत-सी बना ली।

“इतनी भी क्या जल्दी है? अभी तो आए थे।” काजल ने हैरानी से पूछा। “कुछ ज़रूरी काम है। घर जल्दी पहुँचना है।” राजीव के लिए वहां बैठना मुश्किल हो रहा था। सांस पर दबाव बढ़ता जा रहा था।” मेरी किसी बात का बुरा मान गए?”

“अरे नहीं! दरअसल मम्मी-पापा शाम को कहीं बाहर जाने वाले हैं। उनके जाने से पहले घर पहुँचना है। तुम फ़ोन करती रहना।” राजीव उठकर कार में बैठ गया। काजल उसकी कार को आँखों से ओझल होने तक देखती रही। घर पहुँच कर वह सीधा अपने कमरे में गया। हॉल में बैठकर चाय पी रहे माँ-पिता जी की ओर उसका ध्यान नहीं गया। खन्ना जी ने आवाज़ लगाई पर उसके कानों से टकरा कर लौट गई। जूते पहने ही बिस्तर पर लेट गया। बंद आँखों से भी अंगूठी पर लिखा ‘के’ स्‍पष्‍ट दिख रहा था।

“क्या बात है, बेटा? तबीयत ठीक नहीं है?” माँ ने माथे की तपन परखते हुए पूछा। “तबीयत ठीक है, सफ़र में थक गया हूँ।” कहते हुए वह जूते उतारने लग पड़ा। “काजल से मुलाक़ात हुई ?” तकिया ठीक करते हुए माँ ने पूछा। “हाँ, हुई। वह ठीक है।” कह कर फिर लेट गया। एक बार फिर माथे और गले की तपन परख कर माँ चली गई।

दो तीन करवटें बदलने के बाद वह उठा। मन में आया कि कमल को आस्ट्रेलिया फ़ोन करके काजल के बारे में पूछे परन्तु रिसीवर से हाथ हटा लिया। सपनों की ऊँची इमारतें रेत के घरों-सी ढहती दिख रही थी। दिमाग़ी उपजों का बोझ सीने पर भारी पड़ रहा था। रह-रह कर कमल की सूरत आँखों पर छा रही थी। बिस्तर पर लेट गया 

परन्तु ज़्यादा देर सोते न बना उठकर काजल का फ़ोन नम्बर डायल किया। ‘हैलो!’ सुनते ही रिसीवर रख दिया। सच क्या है?…यह सुनने की उसमें हिम्मत नहीं थी। टेबल के दराज़ में से सिगरेट का पैकेट निकाला। दरवाज़े की चिटकनी बंद करके पीछे की खिड़की खोल दी। सिगरेट सुलगा कर खिड़की के पास खड़ा हो गया। धुआँ बाहर जाकर बिखरने लगा।

दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनकर सिगरेट बाहर फेंक दिया। टेबल पर रखे जग में से दो घूंट पानी मुँह में उड़ेला। दरवाज़ा खोला। बाहर माँ खड़ी थी। माँ के ज़ोर डालने पर खाने के टेबल पर बैठा। सोचा, माँ-पिता जी को बता दे कि काजल से शादी नहीं करेगा। कमल के साथ दगा नहीं कर सकता। उसकी खुशियां नहीं लूट सकता। भले ही प्यार को कुर्बान करना पड़े। शायद काजल वह लड़की न हो जिसे कमल ने अंगूठी दी थी, यह सोचकर रुक गया।

थोड़े से दाल-चावल खाकर हाथ पोंछने लगा तो पिता जी(खन्ना जी) ने एक चपाती उसकी प्लेट में डाल दी। उसे लगा जैसे बहुत बड़ा बोझ उस पर लाद दिया हो। मजबूरन चपाती उसे खानी पड़ी। पिता जी(खन्ना जी) ने पूछा कि क्या बात है? इतना उदास क्यों है? ‘बस कुछ ख़ास नहीं।’ कहकर अपने कमरे में चला गया। दो तीन सिगरेट फूंके। सपनों का संसार सिमट कर स्याह बिन्दु न बन जाए, यह सोचकर हृदय कांप जाता। काफ़ी करवटें बदलने के बाद ही नींद आ पायी।

सुबह हल्का-सा नाश्ता करने के बाद वह कॉलेज के लिए निकल पड़ा। चौंक पर कार रोक कर कुछ देर सोचता रहा। कशमकश में उलझा रहा। कार अपने कॉलेज की तरफ़ न घुमा कर काजल के कॉलेज की तरफ़ घुमा ली। अंतर्मन की कशमकश को शांत कर लेना चाहता था। किसी भी परिस्थिति का सामना करने के लिए अपने आप को मानसिक रूप से तैयार कर लिया। कार तेज़ रफ्तार से दौड़ती जा रही थी। कॉलेज के गेट के पास कार खड़ी करके उतरा ही था कि काजल भी वहां आ पहुँची।

“आप!…….आज यहां कैसे?” पीछे से काजल ने पूछा।

“क्यों?…….नहीं आना चाहिए था?” काजल की तरफ़ मुड़ते हुए राजीव ने पूछा।

“नहीं-नहीं, मेरा कहने का मतलब यह नहीं था।”

“तुमसे मिलने आ गया। चलो पार्क में चलते हैं।” कहते हुए राजीव ने कार का दरवाज़ा खोलकर काजल को बैठने के लिए इशारा किया। कार हाइवे पर दौड़ने लगी। पांच मिनट में दोनों पार्क में पहुँच गए। शांत कोने में गलीचे-सी फैली घास पर बैठ गए।

“काजल, मैं तुम से कुछ पूछना चाहता हूँ।” राजीव बोला। तेज़ हो चुकी धड़कन उसका सीना फाड़ने के लिए व्याकुल थी। दिल बैठा जा रहा था।

“हां-हां, पूछिए।”

“सच-सच बताना पड़ेगा।”

“आप पूछिए तो।”

“तुम…. कमल….को…..जानती हो?” राजीव के यह शब्द सुनते ही काजल की पूरी देह में कंपकंपी फैल गई। राजीव की आँखों में झांकने की कोशिश की परन्तु उसकी प्रश्‍नवाची  नज़रों का सामना नहीं कर पाई।

“कौन कमल?…….मैं नहीं जानती।” काजल के हड़बड़ाहट भरे शब्दों ने राजीव को सुन्न-सा कर दिया।

“यह अंगूठी तुम्हें कमल ने ही दी है न?” राजीव ने पूछा। काजल का रंग सफेद पड़ गया। तिरछी नज़र कर अपनी अंगूठी की तरफ़ देखा। हाथ छुपाने की कोशिश की। माथे पर पसीने की बूंदे तैर आई। सामान्य दिखने की कोशिश करने लगी।

“नहीं, यह तो मेरी……मैंने ख़रीदी है…..पांच हज़ार रूपये में।”

“काजल, तुम झूठ बोल रही हो। यह अंगूठी कमल और मैं ख़रीद कर लाए थे।” राजीव ने कहा तो काजल निरुत्तर हो गई। आँखों में आँसू चमकने लगे जो गालों से सरकते हुए हरी घास पर गिरने लगे। राजीव को उसके प्रश्‍न का जवाब मिल चुका था। वह काजल के आँसू पोंछकर उसे बांहों में भर लेना चाहता था। संस्कारवश ऐसा नहीं कर पाया। जान चुका था कि काजल उसके जिगरी दोस्त की अमानत है। फिर भी जब तक काजल के मुँह से सच नहीं सुन लेता तब तक आशा की हल्की-सी किरण शेष थी।

“काजल, प्लीज़!” राजीव ने घुटते हुए कहा।

“यह अंगूठी कमल ने ही दी है। मैं उनसे बहुत प्यार करती हूँ और वह मुझसे। हम दोनों शादी करना चाहते थे।” काजल ने आँसू पोंछते हुए कहा। राजीव की दुनिया जैसे थम गई। कुछ देर के लिए आँखों के आगे अंधेरा छा गया। ” मेरे साथ सगाई क्यों की? क्यों कमल को धोखा देने जा रही थी?”

” मैं मजबूर थी। मम्मी-पापा की ज़िद्द के आगे झुकना पड़ा। पापा दिल के मरीज़ हैं। मैं मना कर देती तो……..।” आगे के शब्द काजल की ज़ुबान से नहीं निकल पाए। “सगाई के बारे में कमल को बताया?”

“नहीं।”

“तुमने मजबूरी में सगाई की थी परन्तु मैं मजबूर नहीं। मैं जानता हूँ कमल तुम्हें चाहता है। मैं उसे धोखा नहीं दे सकता।” दिल पर पत्थर रख कर राजीव ने कहा।

“मगर मम्मी-पापा…”

“बस करो काजल! तुम लड़कियां अपने आप को समझती क्या हो? सारी मजबूरियां भगवान् ने तुम्हारे ही पल्ले बांध दी हैं?” राजीव गुस्से से बोला।

“…………..”

“तुम्हें अपने मम्मी-पापा को लेकर घबराने की ज़रूरत नहीं। मैं ही सगाई तोड़ दूंगा और सगाई के बारे में तुम कमल से कुछ नहीं कहोगी तुम्हें कमल की कसम।”

काजल को कॉलेज के गेट पर उतारने के बाद राजीव घर के लिए निकल पड़ा। सब कुछ लुट चुका था। ज़िंदा लाश से बढ़कर कुछ भी नहीं था। आज तक, सच्चा दोस्त होने का फर्ज़ बखूबी निभाया था। अब भी निभाना चाहता था। अंतिम सांस तक। भले ही काजल का प्यार उसका एकमात्र सपना था जिसे हर हाल में साकार करना चाहता था। इसके सिवाए भगवान् से आज तक कुछ भी नहीं मांगा था। कमल की जगह कोई दूसरा लड़का काजल का प्रेमी होता तब वह काजल से ही शादी करता। सब जान चुका था तो ऐसा सोचने मात्र से ही उसका हृदय कांप जाता। वह इस बात से भी अनजान नहीं था कि काजल के साथ शादी करके वह वो प्यार नहीं पा सकेगा जिसकी कामना करता है।

मानसिक उथल-पुथल में फंसा वह कब अपने कॉलेज के चौंक पर पहुँच गया, पता ही नहीं चला। कार रोक दी। घड़ी देखी। कॉलेज ऑफ होने को अभी एक घंटा शेष था। कॉलेज की तरफ़ कार घुमा ली फिर कुछ देर रुक कर सोचने के बाद रिवर्स करके घर की तरफ़ दौड़ा ली।

घर पहुँच कर हॉल में सोफे पर बैठ गया। माँ अकसर इस समय हॉल में बैठकर टी.वी. देख रही होती थी। आज नज़र नहीं आई। खन्ना जी शायद अॉफिस से नहीं लौटे थे। सोफे के साथ पीठ टिका कर आँखें बंद कर ली। शून्य में चला गया। शून्य से उभरती काजल की तस्वीर बंद आँखों में तैरने लगी। उसकी पुष्प झरती हँसी, संगीतमय वाणी कानों में गूंजने लगी। शून्य से उभरी काजल की तस्वीर शून्य में ही समा गई। कमल के शब्द याद हो आए, …… यार वो लड़की नहीं स्वर्ग से उतरी अप्सरा है। जो उसे देख लेता है, उसकी सांस थम जाती है। धड़कन बढ़ जाती है…..। मानसिक सैलाब सब कुछ बहा ले जाने के लिए तैयार था। “बेटा, क्या बात है?” पूछते हुए माँ ने उसे हिलाया तो झटके के साथ चौंक पड़ा। उसके इस तरह चौंकने से माँ घबरा गई। ‘माँ, एक कप चाय मेरे कमरे में भेज देना।’ कहकर वह अपने कमरे में चला गया। पीछे की खिड़की खोलकर खड़ा हो गया। दाएं हाथ के नाखुनों पर नज़र टिकाई फिर दांतों से नाखुन कुतरने लगा। तभी फ़ोन की घंटी बजी।

“हैलो!” उसने रिसीवर कान से लगाकर कहा। “हैलो राजीव ! मैं कमल…….।” हमेशा की तरह कमल की आवाज़ में तेज़ी थी।

“अरे कमल कैसा है तू?” कमल की आवाज़ सुनकर उसके चेहरे की थोड़ी-सी रौनक लौट आई।

“मैं ठीक हूँ। वहां पर सब कैसा चल रहा है?”

“सब ठीक है। तू कब आ रहा है?”

“बस, दो तीन महीनों में आ रहा हूँ।”

“तू सच कह रहा था, यार। जो उसे देख लेता है, उसकी सांस थम जाती है। धड़कनें बढ़ जाती हैं।”

“तू किस की बात कर रहा है?”

“काजल की।”

“अच्छा, तो तू मिल चुका है उससे। लट्टू तो नहीं हो गया? मार डालूंगा, हां।” कमल का स्वर हँसी में झूल गया।

“…………” राजीव के होंठ नीरस मुस्कान में फैल गए। गला रुंध गया।

“हैलो! …. राजीव…. तू बुरा तो नहीं मान गया….. हैलो!”

राजीव ने रिसीवर नीचे रख दिया। कमल के साथ बहुत-सी बातें करके दिल के बोझ से पार पाना चाहता था पर ज़ुबान साथ छोड़ गई। आंसू बह निकले। आँसू पोंछता वह अपनी भावुकता पर मुस्कुरा उठा। एक बार फिर फ़ोन की घंटी बजी परन्तु रिसीवर उठाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया।

नौकरानी चाय रख गई।

अंधेरा घिर रहा था। राजीव वहीं खिड़की के पास खड़ा सिगरेट को धुएं में बदल रहा था। खिड़की से दिखने वाली श्‍वेत पर्वत चोटियां अलौकिक सुख देती थी, अब खाने को आती प्रतीत हो रही थी। बहती नदिया का शोर संगीत की तरह मन को तरंगित करता था, अब कानों के परदे फाड़ रहा था। सुगंधित मीठी वायु उमंग भर देती थी, अब दम घोंटने लगी थी। सामने पहाड़ी पर बसे गांव के घरों की रौशनी ज़िंदगी में उजाला भरती दिखती थी, अब पूरे वजूद को अंधेरे में डुबोती प्रतीत हो रही थी।

माँ काफ़ी देर से डिनर के लिए आवाज़ें लगा रही थी। माँ ने आवाज़ें लगानी बंद नहीं की तो उसे डायनिंग हॉल में जाना ही पड़ा।

“क्या बात है राजीव? कुछ बात हुई?” राजीव को बे मन से खाते देख माँ ने पूछा। “माँ मैं काजल से शादी नहीं करना चाहता।”

निवाला मुँह में डालने के लिए बढ़ा खन्ना जी का हाथ राजीव की बात सुनकर रुक गया। मुँह खुला रह गया। पत्‍नी की तरफ़ देखने लगे। वह भी राजीव को हैरानी से देख रही थी।

“बेटा, यह क्या कह रहे हो तुम? क्या हुआ? काजल के साथ कोई बात हुई?” खन्ना जी ने चेतनता में लौटते हुए प्रश्‍नों की झड़ी लगा दी।

“नहीं, ऐसी कोई बात नहीं।” गर्दन झुकाए बैठे राजीव ने कहा।

“फिर क्या बात है?” माँ ने पूछा।

“मुझे काजल पसंद नहीं। मैं उससे शादी नहीं कर सकता। इससे अधिक मुझसे कुछ मत पूछिए। यह मेरा आख़िरी फ़ैसला है।”

“तो मेरा आख़िरी फै़सला भी सुन लो। तुम्हारी शादी काजल के साथ ही होगी। मैंने वर्मा को ज़ुबान दी है। वह मेरा जिगरी दोस्त है।” खन्ना जी गुस्से में गरजे। राजीव की माँ दोनों को अवाक् देख रही थी। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है। पास खड़ी नौकरानी भी सहम गई थी।

“कुछ भी हो जाए, मैं काजल के साथ शादी नहीं करूंगा।” कहते हुए राजीव उठकर अपने कमरे में आ गया। माँ भी उसके पीछे-पीछे कमरे में आ पहुँची। माँ के बार-बार समझाने पर भी वह नहीं माना। एक ही रट लगाए रहा ‘मैं काजल के साथ शादी नहीं करूंगा।’ पन्द्रह मिनट सिर खपाने के बाद माँ मजबूर होकर चली गई। अगले दिन रविवार था। सुबह जागने के बाद राजीव काफ़ी देर तक बिस्तर पर बैठा रहा। माँ चाय दे गई। राजीव ने उठकर दरवाज़े की चिटकनी बंद कर दी। पीछे की खिड़की खोल दी। बिस्तर पर बैठ गया। तकिए के नीचे से सिगरेट का पैकेट निकाल कर आख़िरी बचा सिगरेट सुलगा लिया। चाय का एक घूंट भरा। आँख खुलते ही कल की सारी घटनाएं ताज़ा हो उठी थीं। आँखों में नींद अभी तक शेष थी। खुली खिड़की से अंदर आ रही धूप नर्म क्रीम रंग की दीवार के एक हिस्से को चमकाए हुए थी।

माँ ने बाहर से आवाज़ लगाई, ‘बेटा, आठ बज रहे हैं बिस्तर छोड़ दो।’ माँ की आवाज़ सुनकर चाय का घूंट भरा। चाय ठंडी हो चुकी थी। एक ही लम्बे घूंट में गटक गया। टेबल पर रखी काजल की तस्वीर उठाई। कुछ देर ध्यान से देखने के बाद प्यार से हाथ फेरा। न जाने कहां से मधुर मुस्कान आ कर  उसके मुरझाए चेहरे पर छा गई। तस्वीर टेबल पर रख दी। उठकर बाथरूम में चला गया। नहा-धोकर हॉल में बैठ गया। कुछ देर बाद नौकरानी ने नाश्ता लगा दिया। नाश्ते के दौरान चुप्पी छाई रही।

“राजीव बेटा, आज हम वर्मा के घर जा रहे हैं। काजल के साथ तुम्हारी शादी का दिन पक्का करने। तुम तैयार हो जाओ।” खन्ना जी ने नाश्ता करने के बाद कहा।

“………….”

“बेटा, तुम सुन रहे हो न?” राजीव के जवाब न देने पर खन्ना जी ने पूछा

“बेटा, तुम बोलते क्यों नहीं? चुप बैठने से कुछ न होगा। बताओ, क्या बात है ? अचानक ऐसा क्या हो गया?” माँ ने राजीव के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा। राजीव ने गर्दन उठाकर लाचार नज़रों से माँ की ओर देखा।

“माँ, काजल मुझे पसंद नहीं।” राजीव के शब्दों में लड़खड़ाहट थी। उसके अपने ही शब्द दिल पर छुरी-सा वार कर रहे थे। उसके अपने ही शब्द उसका सब कुछ लूट रहे थे। “तुम्हारी शादी काजल के साथ ही होगी। जल्दी से चलने की तैयारी करो।” खन्ना जी ने कड़ा रुख अपना लिया।

राजीव उठकर कमरे में चला गया।वह जानता था कि पिता जी ज़िद्द के पक्के हैं। अपनी बात मनवा कर ही दम लेंगे और वह ज़्यादा विरोध भी नहीं कर पाएगा। कुछ देर कमरे में टहलने के बाद बैड पर बैठ गया। कुछ दिनों के लिए घर से बाहर चले जाने का विचार मन में आया। अलमारी में रखी अपनी फाइल और सिगरेट के दो पैकेट निकाले।  टेबल पर रखी कार की चाबी भी जेब में डाल ली। माँ ने रोकने की लाख कोशिश की पर न रुका। गेट के पास खड़ी अपनी कार के पास रुककर घड़ी देखी। सवा नौ बजा रही थी। नदी की ओर जाने वाली पगडंडी पर निकल पड़ा। घर के पीछे दो छोटी-छोटी पहाड़ियों के बीच बहने वाली नदी का साथ उसे खूब भाता था। कमल और वह छुटि्टयों में नदी के किनारे बड़े-बड़े पत्थरों पर बैठकर पढ़ाई किया करते थे। हल्का-सा नाश्ता लेकर ही घर से निकलते थे। पढ़ाई के साथ खूब मौज मस्ती भी हो जाती थी। नदी के किनारे बड़े से चपटे पत्थर पर बैठ गया।

वह एक ऐसे दोराहे पर खड़ा था जहां से कोई भी राह चुनना उसके अपने या अपनों के हित में नहीं था। उस दोराहे से तीसरी राह ढूंढ निकालना असम्भव-सा लग रहा था। माँ-पिता जी के कहे अनुसार काजल से शादी कर ले तो बचपन की दोस्ती के साथ अन्याय होगा। काजल के साथ शादी न करे तो माँ-पिता जी के बरसों के संजोए सपने मात्र सपने ही रह जाएंगे। कभी भी हक़ीक़त में नहीं बदल पाएंगे। इससे बड़ा दु:ख उनके लिए कोई और न होगा।

पैकेट में से सिगरेट निकाल कर सुलगा लिया। खन्ना जी के शब्द कानों में गूंज रहे थे, ‘……..तो मेरा आख़िरी फ़ैसला भी सुन लो। तुम्हारी शादी काजल के साथ ही होगी । मैंने वर्मा को ज़ुबान दी है। वह मेरा जिगरी दोस्त है……’ माँ की लाचार नज़रें उसे पुकारती दिख रही थी। सुनहरा अतीत घावों का रूप ले रहा था। पूरे वजूद को कुरेदने लगा था निर्जीवता में सिगरेट हाथ से छूट कर नदी की धारा में बह गया। पल भर के लिए उसके मन में आया कि सिगरेट की तरह नदी की धारा में समा जाए परन्तु यह सोचकर मजबूर हो गया कि उसके बाद माँ-पिता जी का क्या होगा? उनके सैंकड़ों सपनों का क्या होगा? उस सुख का क्या होगा जिसके इंतज़ार में वे आँखें बिछाए बैठे हैं ? ……. और वह इतना कमज़ोर भी तो कभी नहीं रहा कि कायरता का लिबास ओढ़कर अपना जीवन मौत के आगे हार दे।

वह तरह-तरह के ख़्यालों के चक्रव्यूह में फंसता ही चला गया…… काजल के साथ शादी करने की अब सोच भी नहीं सकता….. कमल तो काजल को बहुत चाहता है…….. काजल उसे नहीं मिली तो कैसे जी पाएगा?…. पहली ही नज़र में वो काजल को चाहने लगा था…. कितना खुश था जब पहली बार काजल से मिल कर आया था……कभी उसका नाम नहीं बताया…….. पूछने पर कहता कि मिलने पर उससे खुद ही पूछ लेना……… उसने कहा था, ‘ ………. सचमुच यार, उस लड़की का प्यार मुझे न मिला तो मैं मर जाऊंगा। उसके लिए मैं किसी भी हद से गुज़र सकता हूँ। शादी उसी के साथ करूंगा वरना पूरी उम्र कुंवारा ही रह जाऊंगा’…. यह भी कैसे भुलाया जा सकता है कि वह जो ठान लेता है पूरा करके ही दम लेता है……… उसकी शादी काजल के साथ न हुई तो वह कुंवारा ही रह जाएगा, इसमें कोई शक़ नहीं…….

दो बज रहे थे। उसे प्यास सताने लगी थी। नदी का पानी पीने लायक नहीं था। वर्षा के दिनों में नदी का पानी पीने योग्य नहीं होता था तो वे आंवले खाकर प्यास बुझा लेते थे। पीछे मुड़कर देखा। पेड़ आंवलों से लदा था। मन किया कि उठकर जाए और पत्थर मारकर आंवले गिराए ताकि उन्हें खाकर प्यास थोड़ी कम हो परन्तु अपने आप को लाचार-सा महसूस किया। जब कमल के साथ यहाँ पढ़ने आता था तब भी कमल ही आंवले उतारता था। वह न तो पत्थर मार कर आंवले गिरा पाता था और न ही पेड़ पर चढ़ पाता था। यही सोचते हुए उसने उठकर कोशिश करना व्यर्थ समझा। शरारत करके डांट के डर से घर से भागे बच्चे की तरह मजबूर-सा वहाँ बैठा रहा।

सूर्य ने रात भर के लिए विदा ले ली थी। पश्‍चि‍म की ओर आकाश में बिखरी सूर्यास्ती लालिमा अब कालिमा में बदलने लगी थी। राजीव उसी पत्थर पर बैठा दाँतों से नाखून कुतर रहा था। उसने वहां से उठकर चलना ही उचित समझा। फाइल उठाकर पगडंडी से होता हुआ सड़क पर पहुँचा। उसे पूरा विश्‍वास था कि घर जाने पर पिता जी फिर उसी विषय पर आ जाएंगे। घर से अपनी कार लाने के सिवाए कोई दूसरा चारा भी नहीं था। कार स्टार्ट होने की आवाज़ सुनकर उस की माँ बाहर निकली परंतु तब तक वह कार लेकर निकल चुका था। कार को आँखों से ओझल होने तक देखने के बाद माँ अन्दर चली गई।

कार मुख्य शहर की तरफ दौड़ने लगी। मुख्य शहर उसके घर से पच्चीस किलोमीटर दूर था। करीब आधे घंटे के सफ़र के बाद कार शहर के प्रसिद्ध मणीमहेश होटल की पार्किंग में रुकी। अंधेरा हो चुका था। कमरा किराए पर लेने के बाद उसने कार लॉक की और कमरे में आकर लेट गया।

आख़िर कब तक यूं ही भागेगा?……..यह सोचते हुए वह जल्दी से जल्दी सब परेशानियों से छूटना चाहता था। दिल का दिमाग़ से सम्बंध टूटने लगा था। हताशा हावी होती चली जा रही थी। बचपन से आज तक कभी भी माँ-पिता जी के कहे से बाहर नहीं गया था।  उनकी हर इच्छा को सम्मान देना, हर आज्ञा का पालन करना हमेशा अपना प्रथम कर्त्तव्य जाना। हर परिस्थिति को अपने पक्ष में ढालने की अदभुत क्षमता थी उसमें परन्तु आज विपरीत परिस्थितियां अपनी पकड़ मज़बूत किए जा रही थी। वह लाचार-सा छटपटा रहा था।

अचानक उसकी बंद आँखें खुल गई। चेहरे पर हल्का-सा निश्‍चि‍ंत भाव उभर आया शायद मन ही मन में अपनी परेशानियों का हल ढूंढ निकाला था। निश्‍चि‍ंत भाव को दृढ़ करते हुए पैकैट में बचा आख़िरी सिगरेट सुलगा लिया। रूम बॉय को रिंग करके एक पैकेट सिगरेट और दो ड्रिंक व्हिस्की ऑर्डर किए। शराब पीने का आदी नहीं था। कभी-कभी किसी समारोह या उत्सव के दिन कमल के साथ मिलकर पी लेता था परन्तु आज तक कभी भी अकेले नहीं पी थी। शायद अनिश्‍चि‍ंतता में निश्‍चि‍ंता के समावेश ने पीने के लिए बाध्य कर दिया था। दो ड्रिंक पीने के बाद सोने के इरादे से आँखें बंद करके लेट गया।

ग्यारह बज चुके थे। राजीव की माँ ने काफ़ी देर से टेबल पर डिनर लगवा दिया था। खन्ना जी सोफे से उठने का नाम नहीं ले रहे थे। कुछ भी खाने का मन नहीं था। भले ही राजीव के साथ कड़े शब्दों में बात की हो परन्तु अन्दर ही अन्दर अपने जिगर के टुकड़े को लेकर गहरी चिंता में थे। अपने आप को कोस रहे थे। पत्‍नी के ज़ोर डालने पर डिनर के लिए आए। चपाती का छोटा-सा टुकड़ा दाल में भिगोकर मुँह में डाला।

“कहां चला गया होगा, राजीव? कुछ खाया भी होगा या नहीं?” राजीव की माँ ने कहा तो खन्ना जी ने चबाना छोड़ कर उसकी ओर देखा… फिर चबाना शुरू कर दिया।

“सब जगह फ़ोन करके पता कर लिया। न जाने कहां चला गया?” “तुम फ़िक्र मत करो। खाना खाओ। अब वह बच्चा नहीं है। किसी दोस्त के घर पर टिक गया होगा। कल आ जाएगा।” परेशान खन्ना जी ने पत्‍नी को हौसला देने की कोशिश की।

“आपको इतनी सख़्ती से पेश नहीं आना चाहिए था। प्यार से समझाते तो मान जाता।” कहते हुए राजीव की माँ ने बाहरी मन से निवाला मुँह में डाला। खन्ना जी ने उसकी आँखों में देखा फिर नज़र ऐसे झुका ली जैसे अपनी ग़लती स्वीकार कर ली हो। “कितना खुश था काजल के साथ सगाई होने के बाद। कहीं काजल के साथ कहा-सुनी तो नहीं हो गई ?” कुछ देर चुप्पी तोड़ते राजीव की माँ बोली। आँखों से अश्रुधारा फूट पड़ी।

“पर काजल ने तो फ़ोन पर कहा कि उनके बीच ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।” खन्ना जी ने दाल का चम्मच भर कर मुँह में उड़ेलते हुए कहा। दो निवाले निगल कर राजीव की माँ बस कर चुकी थी।

“राजीव की शादी काजल के साथ करना ठीक रहेगा?” राजीव की माँ ने सहमे हुए स्वर में पूछा।

“तुम कैसी बातें कर रही हो? उन दोनों की सगाई हो चुकी है। चलो, आराम कर लो।” कहते हुए खन्ना जी बैडरूम में चले गए। नौकरानी को बर्तन समेटने के लिए कहकर राजीव की माँ भी उनके पीछे बैडरूम में चली गई।

रात को नींद देरी से आने के कारण खन्ना जी की आँख सुबह देरी से खुली। बिस्तर पर बैठे-बैठे तीन चार जगह फ़ोन करके राजीव का पता किया परन्तु कहीं से कोई भी ख़बर नहीं मिली। पूरी काया दुखने लगी थी। हॉल में जाकर अख़बार की सुर्खियों पर उड़ती नज़र डाली। अॉफिस जाने का मन नहीं था। चार पाँच जगह फिर फोन करके पता किया। कॉलेज फ़ोन करने पर भी मायूसी ही हाथ लगी। मन में समाया हल्का-सा डर विराटता पाने लगा था। रह-रह कर बुरे विचार मन में झुरझुरी पैदा कर रहे थे। कोई भी ऐसा परिचित नहीं बचा था जिसे फ़ोन न किया हो। राजीव की माँ ने सुबह से चाय भी नहीं पी थी। कई बार रो चुकी थी।

एक बज चुका था। खन्ना जी राजीव को ढूंढने के लिए निकलने वाले थे। तभी फ़ोन की घंटी बजी। राजीव की माँ दौड़ी-दौड़ी टेबल के पास पहुँची और इस आशा के साथ रिसीवर कान से सटा लिया के कहीं राजीव का फ़ोन तो नहीं। “हैलो!” राजीव की माँ ने कहा।

“आंटी, मैं कमल बोल रहा हूँ। आप कैसी हैं?”

“मैं ठीक हूँ। तू कैसा है, बेटा ?”

“मैं भी ठीक हूँ।”

“घर कब आ रहा है?”

“दो महीने बाद, अंकल कैसे हैं?”

“वे भी ठीक हैं बेटा, पर राजीव……।” राजीव की माँ की आवाज़ गले में ही अटक कर रह गई। रुलाई फिर फूट पड़ी।

“आंटी आप रो रही हैं? आप राजीव की फ़िक्र न करें। मैं जानता हूँ कि वह किसी बात पर नाराज़ होकर घर से चला गया है। कुछ देर पहले मुझे उसका फ़ोन आया था। वह घर के लिए निकल पड़ा है। अब पहुंचने ही वाला है।” कमल की बात सुनकर राजीव की माँ की आँखें खुशी से चमक उठीं।

“सच बेटा!” वह आँसू पोंछते हुए बोली।

“हां, आंटी।”

बात करके राजीव की माँ ने रिसीवर रख दिया। चेहरे पर खुशी की झलक पाते ही खन्ना जी के चेहरे से चिंता की लकीरें काफ़ी हद तक मिट चुकी थी। कुछ पूछने के लिए उन्होंने मुँह खोला ही था कि दरवाज़े की घंटी बज उठी। राजीव की माँ ने दरवाज़ा खोला। देखकर उसकी आँखें फटने को हो गई। बाहर राजीव के साथ दुलहन का लिबास पहने, सिर पर चुनरी ओढ़े शीतल खड़ी थी। माथे पर सजी बिंदिया और होंठों की लाली उसकी खूबसूरती को चार चाँद लगा रही थी।

“माँ, हमने कोर्ट में शादी कर ली।” राजीव ने कहा, फिर दोनों माँ के चरण छूने के लिए झुके। माँ के हाथ स्वत: ही आशीष बन कर दोनों के सिर पर फिर गए। खन्ना जी अन्दर खड़े अवाक् सब देख रहे थे।

4 comments

  1. Vinod Dhrabial Rahi

    Meri kahani prakashit karne ke liye aapka aabhar Simran ji

    • बहुत ही रोचक और भाव – विभोर कर देने वाली कहानी है राही जी …अंत तक कहानी पाठक को बंधे रखती है l

      • बहुत ही रोचक और भाव – विभोर कर देने वाली कहानी है राही जी …अंत तक कहानी पाठक को बांधे रखती है l

  2. बहुत सुंदर कहानी

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