फ़िल्म इंडस्ट्री की परिवर्तित रूपरेखा

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बदलते समय के साथ फ़िल्म इंडस्ट्री में भी परिवर्तन आने लाज़िम हैं। धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलने के कारण उनका नज़रिया भी काफ़ी हद तक बदल गया। पर फिर भी 1950-60-70 की पुरानी फ़िल्मों की छवि जो लोगों के दिल पर बन गई थी उसे समय भी धो नहीं पाया। 1950-60-70 में ऐसी फ़िल्में बनीं जिन्होंने अपना एक अलग ही मुक़ाम बना लिया जैसे काग़ज़ के फूल, मदर इन्डिया, पाकीज़ा, मेरा साया और पड़ोसन आदि। इनमें अदाकारी जितनी मज़बूत थी, वैसा ही कवितामयी-सा संगीत का प्रवाह था, कॉमेडी ऐसी कि आप हँसे बिना रह ही न पाएं और फ़िल्मी स्टाइल तकनीकी होते हुए भी साधारण-सा प्रतीत होता था। यह था बॉलीवुड का सुनहरी युग जो शायद ही कभी वापिस आ सके।

धीरे-धीरे परिवर्तनों का सिलसिला जारी सा हो गया। अगर आप बॉलीवुड के बदलते दौर को दृष्‍ट‍िगोचर करें तो आप इसमें बहुत परिवर्तन पाएंगे। जैसे पहले तो सारा गाना एक पेड़ की टहनी को पकड़े ही ख़त्म हो जाता था और अब अगर गाने का एक सीन भारत में होता है तो दूसरा स्विट्ज़रलैण्ड या पैरिस में। इससे जहां फ़िल्म की टी.आर.पी. बढ़ती है वहीं उसका बजट भी आसमान को छू जाता है।

अब जहां नायक और डायरेक्टर एक समय में एक ही फ़िल्म करना पसन्द करते हैं जो मुश्किल से 3-4 महीनों में पूरी होती है और उसके  सफल होने के आसार भी 50-50 ही होते हैं। जबकि पहले 8-9 फ़िल्मों का काम एक साथ जारी होता था जिनमें से लगभग सभी ब्लॉक बास्टर पर धमाका बोलती थीं।

1980 में एक्शन का युग शुरू हुआ जो काफ़ी बरस ज़ोर शोर से चला। उसके बाद लगातार परिवर्तन आते रहे पर एक्शन का दौर पूरी तरह से समाप्‍त नहीं हो पाया। अब ज़रा पुरानी फ़िल्मों की कहानियों को याद करें। फ़िल्मों की कहानी की रूपरेखा का केन्द्र लगभग एक जैसा लगता था। नायिका का खून होना, अपहरण होना या कोई अन्य बड़ी मुसीबत पड़ने पर उसका बदला लेने के लिए नायक हमेशा तैयार रहता था। सब कुछ सम्भव था। नायक एक साथ 20-30 खलनायकों से लड़ सकता था, वो दसवीं मंज़िल से कूद सकता था और गोला बारूद  के धमाकों के बीच में से निकल कर भी अपनी माँ या प्रेमिका को बचा लेता था और उसे कुछ भी नहीं होता था। कई बार तो इतना ज़ख़मी  हो जाने के बाद भी वह बच जाता था। यही चलन लम्बे समय तक चलता रहा। अब तो एक्सपेरिमेंट ज़्यादा होने लगे हैं। आज ज़रूरी नहीं है कि अंत में हीरो की ही जीत हो हालांकि आज स्टन्ट ज़्यादा होते हैं। कहीं नायक उड़ते हुए दिखते हैं और कहीं ऊँची-ऊँची इमारतों से लटकते हुए। ये सब हॉलीवुड की ही नक़ल है क्योंकि हॉलीवुड फ़िल्में ही ज़्यादा स्टन्टयुक्त होती हैं। आज की फ़िल्में तो एक्शन और सेक्स से भरपूर होती हैं। हालांकि गिनी चुनी अच्छी और साफ़-सुथरी फ़िल्में भी आई हैं और सफल भी हुई हैं पर अधिकतर फ़िल्मों में किसिंग सीन्ज़ और अश्‍लीलता की भरमार दिखती है। प्रत्येक  हीरोइन बोल्ड से बोल्ड सीन करने को तैयार रहती है। पहले पहल तो ऐसे-ऐसे सीन्ज़ को देख कर सभी दाँतों तले उँगली दबा लेते थे पर धीरे-धीरे जैसे यह सब देखने की हमने भी आदत ही डाल ली है अब तो हमारी भी पेशानी में बल नहीं पड़ते। अजी क्या कहें…. सब कुछ ही हज़म। इस दौर के कुछ कलाकारों के तो नाम ही काफ़ी हैं ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं, यहां मैं नाम लेना चाहूँगी इमरान हाशमी और मल्लिका शेरावत के।

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अगर हम 1950 की नायिकाओं को ध्यान में लाएं तो उनका एक अलग ही अन्दाज़ था। उनका रूप, उनकी नज़ाकत, उनकी अदाएं सब कुछ हटकर था। जहां उनकी एक्टिंग का डंका बोलता था वहीं उनके स्टाइल के चाहने वालों की संख्या भी कम नहीं थी। स्टाइल ऐसा कि सब कॉपी करने को बेताब रहते थे। यदि पुरानी हीरोइनों को याद करें तो मधुबाला, मीना कुमारी, नूतन, साधना हर किसी का एक अपना स्टाइल। हर कोई एक दूसरे से अलग नज़र आती है। उनको आप एक पैमाने में रखकर नहीं माप सकते। लेकिन यदि आप आज की हीरोइनों को अलग स्टाइल में बांधना चाहें तो ऐसा नहीं कर पाएंगे। आज तो हर हीरोइन एक सी है बस सब की सब ग्लैमरस डॉल्स हैं। बढ़िया मेकअॅप, बढ़िया हेयर स्टाइल, ग्लैमरस ड्रैसिज़ और सभी का एक सा अंदाज़। कभी-कभी तो उनको पहचानना ही मुश्किल हो जाता है। पुरानी नायिकाओं ने अपने स्टाइल के साथ-साथ अपनी गरिमा को भी बरकरार रखा। ‘लज्जा स्त्री का आभूषण होता है’ यह उक्‍त‍ि उन पर बिल्कुल सही बैठती थी। यूं तो 1980 की नायिकाएं भी रूप सौन्दर्य से परिपूर्ण हैं अदाएं भी हटकर हैं पर वैस्टर्न कपड़ों के साथ वे अपनी गरिमा को बरकरार रखने में चूक गई हैं। इसके बाद के दशकों में नायिकाओं ने तो जैसे बोल्ड दिखने की होड़ सी लगा ली। आज तो हॉट दिखने की होड़ में वे कुछ ज़्यादा ही आगे निकल आई हैं उनके कपड़े बदन ढकने के लिए नहीं होते। उनकी देखा-देखी अधिकतर लड़कियां इसी तरह के कपड़ों के फ़ैशन के प्रवाह में बह रही हैं। युवा पीढ़ी लगातार उनसे प्रभावित हो रही है।

अब बात आती है पुराने गानों की। पुराने गाने जब प्यार किया तो डरना क्या, चलते-चलते, किसी नज़र को तेरा इन्तज़ार, मेरे पिया गए रंगून आदि आज भी सदाबहार हैं। आज भी इन्हें सुनकर एक सुकून सा मिलता है जहां इन गानों का एक-एक शब्द दिल के तार छेड़ता था वहीं इनका संगीत भी उत्तम होता था। लेकिन आजकल के गाने तो सिर्फ़ शोरगुल से परिपूर्ण ही होते हैं और शब्द ऐसे जिनका कोई सही अर्थ स्पष्ट नहीं होता जैसे-तोता मिर्ची खा गया, काँटा लगा आदि। क्या हैं ये गाने कुछ समझ नहीं आते हालांकि पीछे कुछ अरसे में कई अच्छे गाने भी आए हैं परन्तु ये पुराने गानों से मुक़ाबला नहीं कर सकते। अब तो कई कम्पनियों ने पुराने गानों के ही रिमिक्स बना दिए हैं और पुराने गानों की कमर ही तोड़ दी है पर इन गानों को सुनकर भी ज़हन में तसव्वुर तो पुराने गाने का ही होता है।

चाहे फ़िल्म इन्डस्ट्री ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पुरानी रूपरेखा बिल्कुल बदल दी है पर ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अब अच्छी फ़िल्में नहीं बनती। पीछे कई अच्छी फ़िल्में आई हैं जैसे-हम आपके हैं कौन, वीर ज़ारा, खुदा गवाह, चाँदनी, हिना, दिल तो पागल है, 1942-एक लव स्टोरी आदि ये फ़िल्में यह साबित करने को काफ़ी हैं कि यदि अच्छा दिखाया जाए तो दर्शक स्वीकार करते हैं और सिर्फ़ बिज़नेस को ध्यान में रख कर सफलता प्राप्‍त नहीं की जा सकती।

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लेकिन यदि आज के बदलते हुए समय की फ़िल्मों की हीरोइन्ज़ की बात करें तो प्रिटी ज़िंटा, रानी मुख़र्जी, ऐश्‍वर्या और सुष्मिता को पछाड़ती कैटरीना, करीना और कंगना एवं साथ ही साथ दीपिका पादूकोण, अनुष्का शर्मा, सोनाक्षी सिन्हा और सोनम कपूर जैसी हीरोइन्ज़ के स्टाइल की, उनके अंदाज़ की बात करेंगे।

हालांकि यहां मल्लिका शेरावत और सन्नी लियोनी सरीखी हीरोइन्ज़ की बोल्ड फ़िल्मों और उनकी बोल्डनैस की बात करना न्यायसंगत नहीं होगा क्यूंकि पुरानी फ़िल्मों को आंकते वक़्त हमने ज़ीनत अमान जैसी हीरोइन्ज़ की बोल्ड फ़िल्मों को नज़र अंदाज़ किया है। आज के समय की मेन स्ट्रीम की हीरोइन्ज़ की ही बात करें तो भी उनकी बेबाकी और उनकी बोल्डनैस की बात अदाकारी और फ़िल्मों की कहानी और स्टाइल के पहले आती है। हालांकि हेल्थ क्लबों और विशेष व्यायाम आदि की मदद से उनके तराशे बदन बोल्ड रोल्ज़ और छोटे कपड़ों यानी पश्‍चिमी पहरावे के साथ न्याय करने के पूर्ण रूपेण योग्य हैं। लेकिन कहीं भारतीय सभ्यता के अनुरूप न होने के कारण यदा कदा उंगलियां इन पर उठती ही हैं। अब अगर इनसे भी आगे बढ़कर इन हीरोइन्ज़ के साथ मुक़ाबला करने वाली नई पीढ़ी जो तैयार हो रही है उनके स्टाइल की बात करेें तो उनमें आलिया भट्ट, श्रद्धा कपूर और जैकलीन फरनांडिस जैसी हीरोइन्ज़ शामिल हैं। अब बेहद ओपन और बोल्ड हो चुके सिनेमा में से बोल्डनैस को मन्फी करके तो नहीें देखा जा सकता यह लगभग तय है। इसकी आदत डालते हुए ही शायद हमें नई एक्सपेरिमेंटल और क्रिएटिव सिनेमा की आशा रखनी चाहिए। आगे क्या दिशाएं तय होंगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा। शायद आगे इंडस्ट्री में और परिवर्तन आएं और अच्छी फ़िल्में आएं।

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