कन्यादान एक महत्वपूर्ण प्रश्न

dan ki vastu

– डॉ. अनामिका प्रकाश श्रीवास्तव

पिछले कुछ दशक के दौरान विवाह जैसी संस्था को लेकर औरतों के सोच में मूलाधार परिवर्तन हुए हैं। और यह देखने में आया है कि शिक्षित औरतें अपनी स्वतंत्र सत्ता को लेकर न केवल जागरूक हुई हैं बल्कि अपने निर्णय के अधिकार के प्रति भी उनमें सजगता आई है। ढेर सारे सवाल उठ खड़े हुए हैं और यह बात ज़ोर पकड़ती जा रही है कि क्या विवाह मंडप में कोई माता-पिता अपनी लड़की को किसी चेतना शून्य वस्तु की तरह दान कर सकता है अथवा क्या किसी को यह अधिकार है कि वह किसी लड़की को दान में स्वीकार करे। सोचने पर यह बड़ा अमानवीय लगता है। कोई माता-पिता वेद सम्मत अधिकारों के तहत अपने परलोक को सुधारने के लिए जीती जागती लड़की को दान करने का अधिकार कैसे पा जाते है? बावजूद इस सोच के आज भी कन्यादान मनुष्य की मुक्‍त‍ि का सबसे बड़ा दान स्वीकारा जा रहा है।

कन्या को दान में देने की कल्पना ही भयावह

कन्यादान को लेकर अब वे महिलाएं भी विचलित दिखाई दे रही हैं जिन्हें अपनी लड़की का ब्याह करना है और वे भी इस अपराध बोध से ग्रसित हैं जो अपनी लड़की का विवाह कर चुकी हैं। उनके मन में यह भावना बैठ चुकी है कि विवाह के बाद लड़की के साथ उनका सम्बन्ध टूट जाता है और वह जिन पराए हाथों में सौंप दी जाती है उन्हीं के बंधन में बंध जाती है। आज भी बहुत से हिन्दू ख़ानदानों में रिवाज़ है कि शादी के समय मां-बाप के अलावा चाची, ताई, भाभी और सभी करीबी रिश्तेदार औरतें पूरे-पूरे दिन का उपवास करती हैं और रात को विवाह मण्डप में जब लड़की के पैर पूज कर वेद मंत्रों के साथ लड़के वालों को उसका दान दे देती हैं तब भोजन ग्रहण करती हैं। यह पूरी प्रक्रिया भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार स्वीकारी गई है लेकिन समझदार लड़की उस संस्कार को मन से नहीं स्वीकार पाती और उन्हें लगता है कि उन्हें भी गाय बछड़े की तरह दान में देकर चंद लोगों ने अपनी मुक्‍त‍ि की कामना की है। वास्तव में कन्या को दान में देने की कल्पना ही भयावह है और इस दान से स्वयं की मुक्‍त‍ि की कामना धर्म सम्मत हो सकती है लेकिन मानवीय आधार पर न तो यह स्वाभाविक है और न मनोवैज्ञानिक।

यह कल्पना ही झूठी और बेमानी

जिस लड़की को मां-बाप २० साल तक सारी सुख-सुविधाओं के बीच अपने कलेजे से लगाकर रखते हैं और जिसके पालन-पोषण में वे कभी कोई कमी नहीं करते अपने बेटों जैसी ही उसे शिक्षा देते हैं उस बेटी के साथ अचानक मां-बाप का रिश्ता टूट जाएगा। यह कल्पना ही झूठी और बेमानी है। मां-बाप  अपने कलेजे के उस टुकड़े को जब दान का बहाना लेकर अपने से अलग करते हैं तब उनकी तकलीफ़ को उनकी ही आत्मा से पूछा जा सकता है। वह सब कुछ इतना दुख भरा सच होता है कि जैसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, इसलिए कन्या को सुखी और सुरक्षित ज़िंदगी सौंपने का मतलब यह कतई नहीं है कि उसे दान जैसे शब्द की सीमाओं में बांध कर उसकी गरिमा को कम किया जाए।

मनुष्य के दान का अधिकार मनुष्य को नहीं

किसी भी लड़की के विवाह का मतलब होता है उसे एक ऐसी संस्था को सौंप देना जो सामाजिक स्तर पर सुरक्षित है और जिसे केवल सम्मान प्राप्‍त है बल्कि जिसे मज़बूत दीवारों का सम्बल भी मिला हुआ है। कन्या के दान को लेकर वैचारिक स्तर पर पिछले कई सौ वर्षों में बराबर अंतर हुए हैं। यह शब्द संप्रदान शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है। वास्तव में एक कन्या के दान की कल्पना पूर्वजों ने भी नहीं की थी। उन्होंने हमेशा औरत की एक अलग स्वाभिमानी स्वतंत्र सत्ता को स्वीकार किया था। वे घर और घर के बाहर औरत की सक्रियता के पक्षधर थे। संप्रदान की कल्पनाओं में जो बिगाड़ आया है वह शादी कराने वाले पंडितों की अपनी सुविधा की वज़ह से आया है। शास्त्रों में विद्या, बुद्धि और विवेक के स्तर पर औरत की स्वतंत्र छवि को मान्यता दी गई है परन्तु ऐसी स्त्री का पति उसका पति होने के लायक ही नहीं है जो यह मानता है कि वह अपनी पत्नी की न तो गहराई को समझा है और न ही उसकी भावना को। विशेष रूप से पुरुषों को लगा कि वे दान दहेज की तरह किसी लड़की को भी दान में पाने के अधिकारी हैं। इससे पुरुष के अहंकार की ही पुष्ट‍ि होती है। दूसरी तरफ़ यह भी पता चलता है कि पुरुष अपनी मानसिकता में बड़ा ही उदार है जबकि ऐसा कहीं कुछ नहीं है। मनुष्य को मनुष्य के दान का कोई अधिकार नहीं। दानी की भावना ही दो आत्मीय संबंधों के बीच कड़वाहट भर देती है। शास्त्रों की ही बात करें तो विवाह में पुरुष को कर्त्ता के रूप में स्वीकार किया गया है और कन्या को कर्म के रूप में। संप्रदान कार्य को सम्पन्न करने वाला कन्या पक्ष होता है। विवाह में वर कन्या को पत्‍नी के रूप में ग्रहण करता है इसीलिए इस संस्कार को पाणिग्रहण संस्कार कहते हैं। फिर इस संस्कार में कन्या के दान की बात कहां उठती है?

कन्यादान की रस्म न तो सनातन है न ही वैदिक

सच्चाई तो यह है कि अगर कोई लड़का किसी लड़की की सुरक्षा और सुख का दायित्व लेता है तो उसे इसे उठाने में गर्व का अनुभव होना चाहिए। यह सोचना उचित नहीं है कि वह किसी की उदारता की वजह से दान दक्षिणा में एक कन्या को मुफ़्त में पा गया है। दान शब्द के भीतर किसी चीज़ को मुफ़्त में पा जाने की जो खुशी है वह कन्या की गरिमा को कम करती है और उस संवेदनशीलता को धक्का पहुंचाती है जिसमें दो शरीर दो आत्माएं सारे बंधन तोड़ कर एक होना चाहती है। दरअसल इस कन्या के दान की सोच से मुक्‍त‍ि पाने में कुछ कठिनाइयां हैं। जैसे मर्द अभी तक मानसिक स्तर पर यह नहीं स्वीकार पाएं हैं कि औरतें और अधिक समझदार हों। वे औरत के गुणों की कद्र करने में हिचकते हैं और उन्हें बराबर का सम्मान, स्थान और आदर देने में संकोच का अनुभव करते हैं। यदि ऐसा न होता तो वर कन्या को दान में स्वीकारने का विरोध करता हालांकि कन्या भी कभी अपने दान किए जाने का विरोध नहीं करती। यानी सुधार की ज़रूरत दोनों की मानसिक स्थिति में है और फिर आज हिन्दू विवाह संस्कारों में कन्या के दान की जो रस्म है वह न तो सनातन है और न वैदिक ही। इन दोनों ही स्थानों पर कन्या संप्रदान को स्वीकृति दी गई है लेकिन कन्या के दान को तर्कसंगत और विवेकपूर्ण नहीं बताया गया है। बावजूद इसके पुरानी परम्पराएं बदल रही हैं। और कहीं-कहीं इस दान का विरोध भी दिखाई दे रहा है। पढ़ी-लिखी महिलाएं अब यह कहने लगी हैं कि मैं अपनी पुत्री को सुरक्षित हाथों में सौंप रही हूँ। मैं उसका दान नहीं कर रही हूँ। कन्या के दान की बात करने का अर्थ है उसे निरीह बना देना, माता-पिता के समक्ष उसके अस्तित्त्व को छोटा कर देना। यह बात तब तक समाज में रहेगी जब तक औरत स्वयं नहीं जागती। उसे समझना होगा कि उसका अपना अस्तित्त्व है, उसकी अपनी सत्ता है और वह हर क्षण अपनी सांस पर ज़िंदा है।

यह प्रथा कन्या के वजूद की रक्षा करे

कन्यादान को दान कहकर उन संबंधों की गरिमा को कम नहीं करना चाहिए जो दो ख़ानदान के बीच होती है। पूरे समाज को कोशिश करनी चाहिए कि यह प्रथा व्यक्तिगत मुक्‍त‍ि के स्वार्थ से निकलकर व्यापक फ़लक पर स्थान पाए और कन्या के वजूद की रक्षा करे। उसे तमाम हीन भावनाओं से मुक्‍त करे और यह सब तभी होगा जब आधारभूत सोच में परिवर्तन होंगे। फ़िलहाल कन्यादान की रस्म दान से मुक्‍त होनी चाहिए क्योंकि यह लड़की के अंदर हीनभावना पैदा करती है और किसी एक ख़ानदान को श्रेष्ठता और उच्चता के अहंकार से भरती है। जब भी विवाह हो लड़की की इच्छा को प्रमुखता दी जानी चाहिए क्योंकि जीवन के सबसे संवेदनशील हिस्सों में उसे अकेले ही मुक़ाबला करना है।

 

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