यह दुनिया एक सर्कस है

yeh duniya ek circus hai

-प्रो. शामलाल कौशल

अंग्रेज़ी के प्रख्यात लेखक शेक्सपीयर ने अपने एक नाटक ‘As you like it’ में यह कहा है कि यह दुनिया एक रंगमंच है जहां सभी लोग बचपन से मृत्यु तक अपना अपना रोल प्ले करके चले जाते हैं। लेकिन प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर ने अपनी एक फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में एक गाने में कहा है कि “यह दुनिया एक सर्कस है जहां बड़े को भी, छोटे को भी, खरे को भी, खोटे को भी नाच कर दिखाना पड़ता है, हंसना और गाना पड़ता है, रो कर दिखाना पड़ता है” और बात भी सच है। इस सर्कस रूपी दुनिया में सभी अपने अपने तरीके से अपना स्वार्थ साधने के लिए अपने-अपने दाव पेच लगा रहे हैं। अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए कोई साम, दण्ड तथा भेद का तरीक़ा इस्तेमाल कर रहा है, कोई ऊपर से हंसने वाले अच्छे व्यवहार तथा सज्जन पुरुष का मुखौटा ओढ़ रहा है, कोई चालबाज़ या चलता पुर्ज़ा बनकर लोगों को अंधेरे में रखकर तथा बेवकूफ़ बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। कोई अपने खोखलेपन के ऊपर विद्वता, समझदारी तथा दूरदर्शिता का रंग रोगन लगाकर लोगों को भरमा रहा है, किसी के पास अपार पैसा है जिसके बलबूते पर ‘पैसा फेंक तमाशा देख’ की कहावत पर लोगों में अपनी पोज़ीशन बना रहा है। कोई खिलाड़ी तो कोई अनाड़ी बनकर अपने बिगड़े भाग्य को संवार रहा है। कोई बेचारा महंगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी तथा अभावों का सामना करते हुए घर गृहस्थी की गाड़ी खींचने में ऐड़ियां रगड़ रहा है। इस दुनिया में सभी लोग सर्कस में काम करने वाले रिंग मास्टर, जोकर, ऊंचे-ऊंचे झूलों से नीचे बिछे जाल में कूदने वाली बालाओं की तरह काम कर रहे हैं। बेचारा जोकर जिस तरह हंस कर, कभी रोकर, कभी बहुत ही अद्भुत मुद्रा बनाकर, कभी एक पहिये वाली yeh duniya ek circus hai4साईकिल पर हंसने वाले करतब दिखाकर अपनी भूमिका औचित्य को साबित करने की कोशिश करता है, उसी तरह दुनिया में हर आदमी, औरत, बच्चा, बूढ़ा और जवान अपनी भूमिका में अपने को ठीक समझ रहा है। सभी जानते हैं कि चोरी, डकैती, राहजनी, बलात्कार, झूठ, पाखंड, मदिरापान, फिजूलखर्ची आदि बातें गलत हैं, फिर भी इन सब अनैतिक बातों में संलिप्‍त लोग अपने आपको ठीक ही समझते हैं। इस दुनिया रूपी सर्कस में साधु, संत, महंत, गुरू, स्वामी, वेदाचार्य, कर्मचारी, व्यापारी, दुकानदार, मज़दूर आदि सभी अपने कर्तबों के द्वारा अपनी भूमिका के औचित्य को सही ठहराने में लगे हैं। कभी अरविंद केजरीवाल, सुश्री किरण बेदी, सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की अग्रणी भूमिका निभाते हुए जनलोकपाल बिल पास कराने में भरसक प्रयत्‍न कर रहे थे। लेकिन फिर राजनीति नाम की देवी ने इन पर ऐसे डोरे डाले कि वे अन्ना हज़ारे का साथ छोड़ ‘आप’ तथा भाजपा के माध्यम से ही अपना भाग्य चमकाने में लग गये। कभी शत्रुघन सिन्हा, राज बब्बर, जयाप्रदा, जया बच्चन फिल्मों के माध्यम से दर्शकों के दिलों पर राज किया करते थे लेकिन सियासी मैदान में अपनी-अपनी कलाकारी दिखा कर भी उन्होंने अपनी धाक जमाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले तथा भारत रत्‍न से सम्मानित किये गये, सचिन तेंदुलकर ने नये-नये रिकॉर्ड बनाकर लोगों का दिल जीता लेकिन फिर राज्यसभा के सदस्य के तौर पर मनोनीत होकर अलग प्रकार का सार्वजनिक जीवन शुरू किया। जिस तरह सर्कस में काम करने वाला हर शख्स कुछ करता है, दुनिया रूपी सर्कस का भी हर शख्स कुछ ना कुछ काम करता है। काम करते-करते कभी सफलता तो कभी असफलता, कभी हँek circusसी तो कभी गमी, कभी स्मृद्धि तो कभी निर्धनता, कभी प्रशंसा तो कभी बुराई, कभी दोस्ती तो कभी दुश्मनी, कभी मालिक तो कभी नौकर के तौर की स्थिति में से गुज़रना पड़ता है। तभी तो राजकपूर ने कहा था ‘ऐ, भाई ज़रा देख के चलो, ऊपर ही नहीं, नीचे भी, बाएं ही नहीं, दाएं भी।’ जो भी व्यक्‍त‍ि इस सर्कस में सोच समझकर, देखभाल, मापतोल, सतर्कता के मुताबिक़ नहीं चलता धड़ाम से बदकिस्मती के अंधे कुएं में जा गिरता है। और लोग उसे गिरा हुआ देखकर हंसते हैं, मज़ाक करते हैं, तालियां बजाते हैं। सर्कस में ऐसा ही तो होता है।

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