बलबीर

एक थी नर्स बलबीर। अब आप गुस्सा न करें कि कहानी की शुरूआत अजीब है। अब आप ही कहिए जब राजा-रानी होते थे तो कहानी की शुरूआत बड़ी आसान थी। कोई रोकने-टोकने वाला नहीं था। बस क़लम उठाई और शुरू कर दी कहानी, एक थी रानी या फिर एक था राजा या फिर एक था राजा, एक थी रानी। अब माहौल बदल गए हैं। अगर दफ्‍़तर में कहानी लिखी जाएगी तो शुरूआत होगी एक थी टाइपिस्ट, एक था क्लर्क या फिर कुछ फ़‍िल्मी स्टाइल अपनाना हो तो कहानी यूं शुरू होगी- एक था अफ़सर एक थी सुन्दर सी स्टैनो। अफ़सर, कलक्टर, जज, आदि कुछ भी हो सकता है। लेकिन स्टैनो, बस सुन्दर सी स्टैनो रहेगी। इसी तरह अस्पताली कहानी की शुरूआत भी कुछ ऐसे होगी जैसे एक थी नर्स या फिर एक था डॉक्टर या फिर एक था डॉक्टर और एक थी नर्स या फिर कुछ नर्सें और कुछ थे डॉक्टर। कभी-कभार एक था मरीज़ से भी कहानी शुरू की जा सकती है। यूं तो अस्पताली कहानी लिखने में शुरूआत में कई नए प्रयोग किए जा सकते हैं जैसे एक था फ्रैक्चॅर, एक था अबॉर्शन, एक थी डिलवरी, एक था ऑप्रेशन। कई बार तो कहानी की शुरूआत ज़िंदगी के अन्त से शुरू करने की सुविधा रहती है जैसे एक थी मौत। मौत यानी चार नम्बर बिस्तर की मौत। कभी-कभार भूतहा कहानी की शुरूआत करनी हो तो यह जुमला काम आ सकता है कि एक था पोस्टमार्टम। हां अगर अस्पताल मैडिकल कॉलेज से जुड़ा हो तो कहानी मैडिकल विद्यार्थी तथा नर्स स्टूडेन्ट से शुरू की जा सकती है। परन्तु आम तौर पर ऐसे अस्पताल में कहानियां जन्म लेती हैं एक थी नर्स और ख़त्म होती है एक था हाउस सर्जन पर जो अब हाउस सर्जन से अगली मंज़िल पर पहुंच गया होता है। तो वास्तव में हमारी कहानी की शुरूआत थी, एक नर्स थी बलबीर। अब बलबीर इसलिए कि वह वास्तव में ही बलबीर थी जिसने उस वक्‍़त हमारे अस्पताल की नर्सों के ज़िक्र को सिफ़र बना दिया था और सारे हाउस सर्जनों को कार्तिक के कुत्ते।

असल कहानी शुरू करने से पहले मैं एक बात और अर्ज़ करना चाहूंगा कि बलबीर कौर की कहानी या उसके बारे में कुछ भी लिखना बड़ा कठिन काम है। वह थी ही ऐसी औरत कि उसके बारे में जो जाना जाता था वह सच नहीं था और जो सच था उसके बारे में जान पाना कठिन था और फिर मैं खुद इस काम के क़ाबिल अपने को नहीं समझता। क्योंकि मैं कोई पेशेवर क़िस्सागो तो हूं नहीं कि एक आध बात इधर-उधर से देखूं-सुनूं और कुछ कल्पना से जोड़कर कहानी बना डालूं। आप कहेंगे….. शायद न भी कहें कि मुझे किसी पागल कुत्ते ने काटा है जो मैं यह कहानी लिखने बैठ गया। दरअसल यह मेरी मजबूरी है कि मैं यह कहानी लिखूं क्योंकि कल जब बलबीर कौर मुझसे मिली थी तो उसके बाद से मेरी खोपड़ी में एक टाइम बम सा टिक-टिक कर रहा है और मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि अगर मैंने जल्दी से बलबीर कौर की कहानी नहीं लिखी तो वह टाइम बम फट जाएगा और मैं या तो पागल हो जाऊंगा या फिर मेरे चीथड़े उड़ जाएंगे। इसलिए आप मेरी मजबूरी समझें और कुछ देर और मुझे सहन करें क्योंकि यह मेरे वजूद का यानी आप जैसे ही एक जीते-जागते आदमी के वजूद का सवाल है।

बलबीर कौर के बारे में इतने अधिक क़‍िस्से अस्पताल तथा हाउस सर्जन होस्टल में फैले हुए थे कि जब मेरी इन्टरनल मेडिसन में ड्यूटी लगी तथा मुझे पता लगा कि बलबीर कौर भी इसी वार्ड में है तो उसे देखने की कितनी उत्सुकता मुझमें थी इसका ब्यान करना लगभग असम्भव है। अब मैं सबसे जूनियर था और कुछ ऐसे माहौल का रहने वाला था जहां औरतों के बारे में जिज्ञासा ज़ाहिर करना अश्‍लील माना जाता था। दो दिन तक मुझे यही पता लगा कि जितनी भी नर्सों का सामना अब तक हुआ है उनमें से बलबीर तो कोई भी नहीं थी। ऐसा इसलिए था कि इन दिनों बलबीर की महीने भर की नाइट ड्यूटी चल रही थी और जिस दिन मेरी नाइट ड्यूटी थी उस दिन बलबीर की छुट्टी थी। खैर दो सप्‍ताह बीत गए। उस दिन जब वार्ड में पहुंचा तो सारा माहौल ही अलग था। स्टुडेन्ट नर्सें और दिनों की तरह बेवकूफ़ बकरियों की तरहमिनमिना नहीं रही थीं। बल्कि चुपचाप किसी न किसी बिस्तर पर नब्‍ज़ या बुख़ार देखने में लगी हुई थीं और उधर से सैन्डिल बजाती सधी-तनी क़लफ़ लगी बेदाग़ श्‍वेत वर्दी में सुन्दरता की प्रतिमा सी एक नर्स आ रही थी। मुझे पता लग गया कि हो न हो यह बलबीर कौर है। वह कब मेरे सामने आ खड़ी हुई पता ही नहीं लगा। ‘‘हैलो डॉक्टर, आज बॉस का बड़ा राउण्ड है सब फ़ाइलें तो ठीक हैं ?’’ मुझे लगा बॉस डॉक्टर गुप्‍ता न होकर बलबीर कौर ही है। उस दिन राउण्‍ड के बाद बलबीर चली गई थी।

बलबीर से मेरी अगली मुलाक़ात नाइट ड्यूटी वाले दिन हुई। क्या मुलाक़ात थी, मैं खाना खाकर घूमता फिरता वार्ड में पहुंचा। वार्ड के दूसरे छोर पर ड्यूटी केबिन था। उसमें एक नर्स के साथ बैठे थे डॉक्टर सुनील। वे मुझसे एक साल सीनियर थे। उनके अंदाज़ से लग रहा था कि वे दोनों बातचीत में मशग़ूल हैं। अचानक ऐसा लगा कि डॉक्टर सुनील कुछ उठाने के लिए नीचे झुके। फिर नर्स की हल्की सी चीख की आवाज़ आई फिर तो सब कुछ एक लम्हे में घट गया। नर्स कुर्सी से उठ खड़ी हुई और उसने डॉक्टर सुनील के गाल पर कसकर एक तमाचा जड़ दिया। सारा वार्ड तमाचे की आवाज़ से गूंज उठा। डॉक्टर सुनील एक दम से उठकर वार्ड से बाहर चले गए और उस दिन के बाद कभी दिखाई नहीं दिए।

वह नर्स बलबीर थी। उसने बिना कोई इमोशन दिखाए नाइट ड्यूटी की थी। न तो किसी मरीज़ ने कुछ पूछा, स्टुडेन्ट नर्सों की तो हिम्मत ही क्या थी ? मैं स्वयं चाहकर भी कुछ पूछ नहीं पाया था। बहुत दिनों बाद जब बलबीर से मेरी घनिष्‍टता हुई तो पता लगा था कि डॉक्टर सुनील ने मेज़ के नीचे से उसकी जांघ पर चुटकी काट ली थी। पर यह बतलाते हुए बलबीर के चेहरे पर कोई तनाव या गुस्सा नहीं था उसके लिए तो जैसे बात वहीं ख़त्म हो गई थी।

बलबीर कौर के बारे में जो क़िस्सा सबसे अधिक प्रचलित था वह यह था कि वह अपनी मर्ज़ी से ही किसी के साथ हमबिस्तर होती थी और दोबारा किसी के साथ हमबिस्तर नहीं होती थी। मुझे दोनों ही बातें अविश्‍वसनीय लगी थीं। हमारे अस्पताल में उन दिनों अधिकतर नर्सें केरल की तरफ़ की थी। नर्सें ग़रीब परिवारों से आती थी। इस प्रदेश की लड़कियों में से अधिकतर विधवा या परित्यक्‍ताएं थी। शुरूआत में ये लड़कियां बड़ी उमंग के साथ अपने ग़रीब परिवार की सहायता में जुट जाती थीं भाइयों को पढ़ाना, बहनों की शादी, पिता का मकान, मां का इलाज आदि। आरम्भ में मां-बाप इनकी बलैयां लेते हैं कि यह तो बेटी होकर भी हमारा बेटा है और वे बेचारी फूली नहीं समातीं।

मरीज़ व उनके अभिभावक भी अपने स्वार्थ हेतु इन बेचारियों की लल्लो-चप्पो करके इनके अहम को भड़का देते हैं। रही-सही कसर लंपट परन्तु अपनी वासनापूर्ति हेतु विनम्र बने डॉक्टर पूरी कर देते थे।

इस उम्र में उनका उफान बरसाती नदी का सा होता है। जो कभी किनारे की अवहेलना करती है तो कभी खेतों को तबाह कर अपनी शक्‍ति पे इठलाती है। जबकि अन्त मरुस्थल में पहुंचकर होता है। मां-बाप दुधारू गाय के छिन जाने के डर से विवाह वक्‍़त पर नहीं करते तथा उम्र निकल जाने पर या तो उम्र भर का एकाकीपन या बेमेल विवाह उनका भाग्य होता है।

पर बलबीर मुझे आरम्भ से ही और नर्सों से अलग लगी किसी झील सी ठहरी हुई पर लुभावनी मानो निमन्त्रण दे रही हो अपने गहरे नीले जल में डुबकी लगाने का। अब पूरा महीना बलबीर की रात की पारी थी और मेरी एक सप्‍ताह की रात की पारी थी। जहां हर हाउस सर्जन उससे बात करने को लालायित रहता था मैं उससे कटने लगा था। शायद पहले दिन का प्रभाव रहा होगा। डॉक्टर सुनील की याद रही होगी इसके पीछे। नाइट ड्यूटी पर नर्सें अपना खाना साथ लेकर आती हैं और अक्सर हाउस सर्जन भी उनके साथ खाना खाने बैठ जाते हैं। बलबीर ने कई बार खाना खाने का न्यौता दिया। पर मैं यह कहकर टाल जाता था कि मैं होस्टल से खाकर आया हूं।

उपेक्षा शायद नारी सहन नहीं कर सकती और पुरुष द्वारा उपेक्षा तो शायद कभी नहीं। ऐसे में नारी का हृदय पुरुष को जीतने तथा जीतकर अपने सम्मुख नतमस्तक हुआ देखने का प्रयास करने लगता है। इस प्रयास में नारी सब कुछ दांव पर लगाने से भी नहीं चूकती। मैं बलबीर की उपेक्षा तो नहीं कर रहा था क्योंकि उसकी उपेक्षा तो सम्भव ही नहीं थी। हां पहले दिन की घटना ने अजीब वितृष्णा अवश्य भर दी थी उसके प्रति और फिर कहीं दिल के किसी कोने में नाहक़ अपमानित होने का डर भी अवश्य रहा होगा। परन्तु बलबीर ने शायद इसे उपेक्षा ही जाना। अत: वह मुझे जीतने के प्रयास में ही लगी रही। सब बातें भी उसकी बतलाईं हैं। वरना उस ज़माने में नारी चरित्रा के बारे में इतना गुणी नहीं था मैं।

अब एक रात इसी तरह खाना खाने से मना करने पर बलबीर ने मेरा हाथ पकड़ा तथा ले गई सीधे साइड रूम में जहां नर्सें खाना खाती थीं। वहां दो टिफ़िन रखे थे। शायद स्टुडेन्ट नर्सों को उसने पहले ही खाना खिला दिया था। कमरे का दरवाज़ा बलबीर ने कब बन्द कर दिया मुझे पता ही नहीं लगा। क्योंकि उसके हाथ के स्पर्श ने मुझे मदहोश सा कर दिया था। मुझपर एक खुशगवार तन्द्रा ने क़ाबू कर लिया था। उसकी अलौकिक मादक छुअन, उसके मोहक रंग-रुप के आगे मेरी क्या बिसात थी? पर मैं जैसे ही खुद को उस अविस्मरणीय झील के बदन में डुबोने जा रहा था तो मुझे उसकी आंखों में एक अजीब दर्प भरी मुस्कान दिखाई पड़ी। मुझे उसकी दृष्‍टि में एक चुनौती नज़र आई। चुनौती इस बात की कि अब देखूं कैसे बचोगे? अब करो उपेक्षा मेरी! क्षण भर के लिए मुझे पूरा कमरा घूमता सा लगा। सामने मेनका सी बलबीर का निर्वस्‍त्र शरीर निमन्त्रण दे रहा था और उधर उसकी आंखों में शरारत भरी विजय की मुस्कान थी। मैं एक झटके से उठ खड़ा हुआ और मैंने हाथ पकड़कर बलबीर को खड़ा कर दिया। उसे कपड़े थमाकर अपने कपड़े पहनने लग गया। बलबीर कुछ देर पत्थर की मूर्त-सी कपड़े हाथ में लिए खड़ी रही। फिर उसने चुप-चाप कपड़े पहन लिए। वह बिना बोले टिफ़िन खोलकर ऐसे खाना लगाने लग गई जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

मेरा सिर ख़ाली सा हो गया। एक बार तो पश्‍चाताप भी हुआ कि जिस मौक़े के लिए जाने कितने लोग तरसते हैं मैंने नाहक़ खो दिया। पर फिर उसकी विजय दर्प से मुसकुराती आंखें याद करके संयत हो गया। मैं बिना खाना खाए बाहर जाने लगा तो बलबीर ने हाथ पकड़कर कुर्सी पर बैठा दिया और खाने की थाली मेरे सामने रख दी। मैंने बलबीर की तरफ़ देखा उसकी आंखें मेरी आंखों से मिलीं मुझे उनमें कोई विषाद, वितृष्णा, क्रोध अथवा तिरस्कार का भाव नहीं मिला। उन आंखों की ज्वालामयी वासना जाने कहां लुप्‍त हो गई थी? उसकी जगह मैंने पाया कि वहां थी एक अधिकार भरी याचना। बलबीर ने रोटी का कौर तोड़कर सब्‍ज़ी लगाकर मेरे मुंह में डाल दिया। मैं ना नहीं कर सका। बलबीर कौर पर कौर खिलाती रही और मैं खाता गया। फिर मुझे ध्यान आया कि वह खुद तो खा ही नहीं रही थी और खाना लगभग तीन-चौथाई मैं ही खा चुका था। मैंने कहा ‘‘बस अब तुम खाओ।’’ बचा हुआ मेरी जूठी प्लेट में डालकर वह खाना खाने लगी।

मुझे स्‍त्री का इस तरह दूसरों का जूठा खाना खाना बहुत बुरा लगता रहा है। मां भी कभी-कभार हम भाई-बहनों की छोड़ी हुई थाली में खाना खाने लगती तो मैं उसे टोक देता था। परन्तु भारतीय स्‍त्री को जाने परमात्मा ने क्या दिल दिया है कि वह पति, पुत्र, पौत्रों की जूठन को अमृत मानकर खाती रहती है। शायद इस तरह का व्यवहार स्‍त्री के अनेक अमोघ बाणों में से एक होता है। जाने क्यों बलबीर का इस तरह खाना खाना मुझे भा गया?

खाना खाने के बाद बलबीर ने हीटर पर चाय बनाई। एक प्याला मुझे देकर दूसरा खुद ले लिया। इस वक्‍़त बलबीर का रूप एकदम अलग ही हो गया था। चाय पीते हुए उसने मुझ से कहा ‘मेरी नाइट ड्यूटी होने पर आप होस्टल से खाना खाकर नहीं आएंगे समझे?’ मैं चुप रहा तभी दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। बलबीर बोली, अन्दर आ जाओ। एक स्टुडेन्ट नर्स ने अन्दर आकर कहा, ‘‘स्टाफ़, तीन नम्बर को खून की उल्टी आ रही है।’’ हम दोनों उठकर वार्ड की ओर चल दिए।

अगले दिन सवेरे सारे होस्टल में मेरे शहीद हो जाने की ख़बर हवा में उड़ रही थी। दोस्तों ने बहुत कुछ कहा-पूछा उस सुबह। पर मैं क्या कहता, क्या बतलाता जो मैं बतलाता क्या वे सच मानते और जो वे सुनना चाह रहे थे क्या वह सच था? मैं खुद अजीब सा हो चला था उन दिनों। समझ में नहीं आ रहा था कि यह क्या हो गया है? हां इतना अवश्य हुआ कि उस रात, उस पल बलबीर के प्रति जो वितृष्णा मन में हुई थी वह कहीं गायब हो गई थी। उसके बारे में उत्सुकता कम तो हुई पर मन से गई नहीं।

बलबीर तो जैसी थी, वैसी ही थी। उस पर इन बातों का क्या असर पड़ने वाला था? पर शायद ऐसा नहीं था क्योंकि कुछ दिन बाद बलबीर अस्पताल छोड़कर चली गई। धीरे-धीरे उसकी याद भी मन से जाती रही। आज लगभग बीस साल बाद यहां टरान्टों में हम भारतीय एन.आर.आई. लोग इकट्ठे हुए थे होली मनाने के लिए तो बलबीर मुझे मिल गई। पर वह तो बिल्कुल बदली हुई बलबीर थी। मांग में सिन्दूर, माथे पर चौड़ा सा टीका, लहम-फ़हम लपेटी सी साड़ी। अगर बोलती नहीं तो शायद पहचान नहीं पाता। उसके पति व्यस्तता के कारण पार्टी में शामिल नहीं हो पाए और दोनों बच्चे होस्टल में थे।

आज बलबीर से खुलकर बात हुई तो उसने बतलाया कि उसे पहली बार एक डॉक्टर ने विवाह का वायदा करके अपनी वासना का शिकार बनाया था और लगभग दो साल तक उसे खिलौना बनाकर फैंक दिया था अपने क़ाबिल न होने की कहकर।

उसके बाद तो उसे पुरुषों से घृणा हो गई थी जिसकी वजह से उसका व्यवहार ऐसा हो गया था और वह डॉक्टरों को तरसाने लगी थी। इसमें उसे मज़ा आने लगा था। फिर मेरे साथ बीती रात ने उसकी ग़ैरत को जगा दिया था और उसने नौकरी छोड़कर जा पकड़ा था उस डॉक्टर को और अपनी किरपान के बल पर आनन्द कारज रचा डाला था और अब वही डॉक्टर उसका पति है।

उसकी आंखों में एक पुरानी चमक आ गई। वह कहने लगी जानते हो मेरे पति कौन हैं ? वे हैं तुम्हारे पुराने बॉस डॉक्टर गुप्‍ता। फिर उसने मेरे गाल पर हल्के से गुलाल लगाया और चली गई। 

 

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