एक टांग वाला मुर्गा

वह पैटून पुल आस-पास के छ: गांवों को जोड़ता था। जब से उज्ज दरिया पर यह पुल बनाया गया था लोगों को बड़ी राहत मिली थी। बॉर्डर पर बसे गांव सकोल के लिये यह पुल बड़ा उपयोगी सिद्ध हुआ था। इस गांव और समीप के लगते गांवों की ज़रूरतों को देखते हुये गांव का माध्यमिक विद्यालय हाई स्कूल में तबदील हो गया था। सरकार के इस आदेश के साथ गांव में खुशियां आ गई थी। अब उनके बच्चे मैट्रिक तक आसानी से शिक्षा ग्रहण कर सकते थे। स्कूल में हैडमास्टर की नियुक्‍त‍ि के साथ नवीन असामियों को भी भरा गया था।

जब से पैटून पुल बना था विद्यार्थियों को आने जाने की सुविधा हो गई थी। इससे पहले बच्चों को दरिया के पानी में से गुज़रना पड़ता था। बरसात के दिनों में बाढ़ का खतरा बना रहता था। जान जोखिम में डालकर बच्चे स्कूल पहुंचते थे। पानी का तेज़ बहाव कई अड़चने पैदा कर देता था। जब तक बच्चे स्कूल से घर न पहुंच जायें माता-पिता के दिल की धड़कन रुकी रहती थी।

पिछले वर्ष से इस पैटून पुल की हालत भी बड़ी ख़स्ता हो गई थी। लकड़ी से निर्मित इस पुल की कई कड़ियां टूट गई थी। मोटर साईकिल या स्कूटर पर सवार होकर इस पुल को लांघना मुश्किल था। पैदल चलने वाले भी बड़ी सतर्कता से आर-पार का सफ़र तय करते थे। पिछले दो दिन की बरसात ने इस पुल का हुलिया और बिगाड़ दिया था। दरिया उज्ज ठाठें मार रहा था। हैडमास्टर ने अपनी मर्ज़ी से दो दिन के लिए स्कूल बन्द कर दिया था। कई अध्यापक पहले ही बरसात के कारण छुट्टियां मना रहे थे। यह बॉर्डर का वह स्कूल था जहां फरलो-लीव प्रचलित थी। अध्यापक कई-कई दिन गैर-हाज़िर रहते थे। जब वे स्कूल आते तो हाज़री लगा लेते थे। बारी-बारी रोटेशन के मुताबिक़ सारा खेल हैडमास्टर और अध्यापकों के ताल-मेल से चल रहा था। बॉर्डर और दुर्गम यात्रा के कारण शिक्षा अधिकारी कभी-कभार ही चैकिंग करने आते थे बच्चों की पढ़ाई पिछड़ रही थी परन्तु इसकी चिन्ता अध्यापकों को नहीं थी। वे तो पहले ही शिकायती आधार पर यहां तबदील होकर आये थे। ऊपर से सरपंच तेजा सिंह की कृपा उन पर बनी हुई थी। तेजा सिंह के ट्यूब-वेल पर शराब और कबाब का सेवन खूब चलता था। तेजा सिंह का अपना कोई बच्चा सरकारी स्कूल में नहीं पढ़ता था। उसके दोनों बच्चे डलहौज़ी के कान्वैंट स्कूल में पढ़ते थे। इसलिये वह लापरवाह था। गांव वाले दुखी थे। कई बार तेजा सिंह से शिकायत भी की थी परन्तु तेजा सिंह अध्यापकों का ही पक्ष लेता था।

गांव के विद्यालय का वातावरण बच्चों के अनुकूल नहीं था। इस को-ऐजुकेशन स्कूल में छात्र-छात्राओं के आचरण पर बुरा प्रभाव पड़ रहा था। गांव के लोगों ने कई बार लिखित शिकायत ज़िला-शिक्षा अधिकारी से की थी परन्तु दफ़तर का डीलिंग क्लर्क हैडमास्टर का घनिष्‍ट मित्र था। महीने में एक व्हिस्की की बोतल उसे भी मिल जाती थी। वह शिकायती चिट्ठियों को अपने पास दबाये रखता था।

तंग आकर गांव वाले शिकायत लेकर शिक्षा अधिकारी के दफ़तर में पहुंच गये थे। शिक्षा अधिकारी ने उनकी शिकायत को बड़ी ग़ौर से सुना था। शिक्षा अधिकारी ने गांव वालों को छापा मारने का आश्‍वासन दिया था। गांव वालों को पक्का किया गया था कि सूचना गुप्‍त रखनी है। गांव वाले खुश होकर लौट आये थे।

उस दिन आकाश पर घने काले बादल छाये हुये थे। सुबह-सुबह ही बूंदाबांदी होने लगी थी। भारी बारिश होने का अनुमान था। इस अवसर पर बॉर्डर के स्कूल सकोल में छापा मारने का उचित समय था। प्रात:काल का समय चैक करने का समय शिक्षा-अधिकारी के लिये कठिन था अलबत्ता छुट्टी करने के समय चैक किया जा सकता था। गांव वालों ने शिकायत में कहा था कि शनिवार को सारा स्टाफ़ जल्दी छुट्टी करके घरों को चला जाता है और सोमवार को 11 बजे से पहले कोई भी कर्मचारी विद्यालय में पहुंचता नहीं है।

गांव वालों की शिकायत के निवारण हेतु अध्यापकों की लेट-लतीफ़ी पकड़ने के लिए ज़िला शिक्षा-अधिकारी तैयार हो गया था। ड्राईवर ने जीप बाहर निकाली थी। स्टैनो अधिकारी का बैग रखकर स्वयं भी जीप में बैठ गया था। तीनों मंज़िल की ओर चल पड़े थे। इस स्कूल की दूरी दफ़तर से कोई 70 कि.मीटर बनती थी।

जीप तेज़ रफ़्तार से दौड़ रही थी। अभी उन्होंने मुश्किल से 15 कि. मीटर का सफ़र तय किया था कि जीप का पिछला टायर पंचर हो गया था। गनीमत थी कि पंचर लगाने की दुकान पास ही सड़क के किनारे स्थित थी। मकैनिक अपने काम में व्यस्त था। वह जैक लगाकर ट्रक का टायर खोल रहा था। जब वह पहिया उतारकर निबटा तब स्टैनों ने विनय की कि पहले उनकी जीप का पंचर लगाया जाये।

मकैनिक ने स्टैनों के आग्रह को मान लिया था। फिर भी इस क्रिया में पौने घंटे का समय बर्बाद हो गया था।

हल्की-हल्की वर्षा में जीप आगे बढ़ रही थी। गांव के पैटून पुल से जीप नहीं गुज़र सकती थी। इसलिये तीनों उस पुल से पैदल जाने लगे थे। यह भी संयोग था कि स्टैनों ने बरसात को देखते हुये एक छाता जीप में रख लिया था। साहब छाता लेकर बड़ी सावधानी से क़दम रख रहे थे। ड्राइवर और स्टैनों बिना छाते के चल रहे थे। उनका अनुमान था कि आज अप्रत्याशित छापे में अध्यापक पकड़े जायेंगे। वे आश्‍वस्त होकर सफ़र तय कर रहे थे।

शैतान से भगवान भी डरता है। शैतान काले इल्म का ज्ञाता होता है। यह काले जादू का चमत्कार ही था कि उस दिन सारे अध्यापक बरसात के मौसम में भी हाज़िर थे। परन्तु इस बात से भी बेख़बर थे कि इस बर्बर मौसम में कोई अधिकारी छापा मार सकता है। इसलिये हांडी पर तीन किलो का मुर्गा पकाया जा रहा था। पी. टी. आई. बलबीर सिंह मीट पकाने में बड़ा माहिर था। आज भी मुर्गा बनाते-बनाते नमक का स्वाद चखता जा रहा था। इस स्वाद-स्वाद में मुर्गे की एक टांग का मांस पकाते-पकाते निगल गया था।

जब शिक्षा अधिकारी स्कूल में पहुंचा तो उस समय दोपहर का एक बज रहा था। वह बुरी तरह से थका हुआ था। स्टैनों और ड्राइवर भी थोड़ी-बहुत थकावट महसूस कर रहे थे। परन्तु ज़िला शिक्षा अधिकारी कुछ ज़्यादा ही टूटा हुआ था। हैडमास्टर नेत्र सिंह ने समय की नज़ाकत को देखते हुये चपरासी पवन कुमार को आंख मारी थी। चपरासी हैडमास्टर का आशय समझ गया था। वह चार कोका कोला की बोतलें फ्रिज से निकाल लाया था।

“नहीं हम नहीं पीयेंगे, पहले हाज़िरी रजिस्टर दिखाओ।” शिक्षा अधिकारी ने रोबीले स्वर में कहा।

“अभी लो साहब” हैडमास्टर ने हाज़िरी रजिस्टर आगे कर दिया था।

 शिक्षा अधिकारी मधुसूदन को यह देखकर हैरानी हुई कि सारा स्टाफ़ हाज़िर था।

“महिला अध्यापिका में सरला और विमला कहां है। शिक्षा अधिकारी ने प्रश्‍न किया।”

“वे कमरे में बैठकर लंच ले रही हैं।” हैडमास्टर ने उत्तर दिया।

“उन्हें बुलाओ।”

शीघ्र ही विमला और सरला हाज़िर हो गई थी।

शिक्षा अधिकारी ने पूछा, “क्या स्कूल में फरलो लीव चलती है?”

“नहीं साहब, हैडमास्टर साहब बहुत अनुशासन के पक्के हैं,” दस मिनट लेट आने पर डांट पिलाते हैं। दोनों ने एक साथ उत्तर दिया था।

“सुना है कि यहां स्कूल टाईम में ही शराब पी जाती है, कौन-कौन अध्यापक शराब पीता है क्या आप मुझे बतायेंगी।”

“नहीं साहब यहां कोई शराब नहीं पीता। ये गांव वाले बिना वजह शिकायतें करते रहते हैं। नहीं तो आप बच्चों से पूछ सकते हैं इस बार सरला ने सफ़ाई दी थी।”

तुरंत ही दसवीं श्रेणी की छात्रा प्रिया को बुलाया गया था।

शिक्षा-अधिकारी ने प्रिया से कहा, “बेटी डरो नहीं सच-सच बताओ कि आपका कौन-कौन अध्यापक गैर-हाज़िर रहता है और कौन स्कूल में शराब पीता है।”

पहले प्रिया कुछ देर चुप रही थी फिर बोली, “सर शराब तो कोई नहीं पीता परन्तु कभी-कभी दूर से आने वाले अध्यापक सोमवार को लेट हो जाते हैं।”

शिक्षा-अधिकारी भड़क उठा था, “मैं लेट आने वाले अध्यापकों की तीन-तीन इन्क्रीमैन्ट्स काट लूंगा। शराब पीने वाले अध्यापकों को सॅसपैंड कर दूंगा। जो अध्यापक पढ़ाते नहीं हैं, गप्पें हांकते हैं उनकी दूर दराज ट्रांसफर कर दूंगा।”

इतने में छुट्टी का टाईम हो गया था। बच्चे स्कूल से चले गये थे। अध्यापिकायें भी अपनी स्कूटी स्टार्ट करके निकल गई थी।

मांस पकने की दुर्गन्ध और बासमती के चावलों की सुगन्ध नाक में घुस रही थी।

“यह मांस पकने की दुर्गन्ध कहां से आ रही है?” शिक्षा अधिकारी ने पूछा।

“खाना परोसा जा रहा है हज़ूर,” हैडमास्टर ने उत्तर दिया।

“स्कूल में मांस क्यूं पकाया जा रहा है?”

“खाने के लिये हज़ूर, यह एक तरह की सब्ज़ी है। मांस हमारे भोजन का हिस्सा है। यह मैं नहीं कहता विज्ञान कहता है।”

“अब तू हमें विज्ञान पढ़ायेगा क्या?” हैडमास्टर की हाज़िर जवाबी पर शिक्षा अधिकारी खिन्न होकर बोला था।

“नहीं हज़ूर, अगर मेरे शब्द आपको बुरे लगे हों तो मैं वापिस लेता हूं और क्षमा मांगता हूं।”

शिक्षा अधिकारी का चढ़ा हुआ पारा नीचे उतर गया था।

हैडमास्टर ने हाथ जोड़ते हुए कहा, “खाना तैयार है साहब, लंच लेकर जाईये आपकी बड़ी मेहरबानी होगी।”

पेट में चूहे कूद रहे थे परन्तु होंठों पर इन्कार के भाव थे। जिस पर स्टैनों ने कहा, “मान जाईये सर, भोजन की तौहीन धर्मशास्त्र के विरुद्ध है।” स्टैनों को स्वयं भी भूख ने सताया हुआ था।

बड़ी सी मेज़ पर खाना लगाया गया था। हैडमास्टर, तीन अध्यापक और तीन दफ़तरी कर्मचारी मेज़ के गिर्द बैठ गये थे। थकान से शिक्षा अधिकारी का शरीर टूट रहा था। हैडमास्टर ने साहस बटोर कर कहा, “साहब बुरा न मानें तो एक-एक पैग व्हिस्की, देख रहा हूं कि आपकी तबीयत थकावट के कारण नासाज़ हो गई है।”

“तू बड़ा गुस्ताख है, निकाल तेरे पास क्या है,” शिक्षा अधिकारी ने ही-ही करके दांत निकाल दिये थे।

बस फिर भोजन से पहले जाम से जाम टकराये गये थे।

जब थालियों में पका हुआ मांस परोसा गया तो उसके ज़ायके ने तबीयत हरी कर दी थी।

शिक्षा अधिकारी मुर्गे की टांग का मांस खाने का शौक़ीन था। उसने मुर्गे की टांग खाने का आदेश दिया। पतीले में से टांग के मोटे मांस का टुकड़ा थाली में डाला गया। जब शिक्षा अधिकारी ने दूसरी टांग के मांस की मांग की तो पतीले के मांस में वह कहीं नहीं थी। वह तो बलवीर सिंह स्वाद-स्वाद में निगल गया था।

शिक्षा अधिकारी क्रोध में उबल पड़ा था, “मुर्गे की दूसरी टांग डालो, तुमने सुना नहीं क्या?”

मुर्गे की एक टांग जब बलवीर रगड़ गया था तो अब कहां से पैदा होती। हैडमास्टर अनजान था।

हैडमास्टर ने कहा, “बलवीर सिंह दूसरी टांग कहां है। उसका मीट परोसो।”

बलवीर सिंह ने अपने दिमाग़ में इस प्रश्‍न का उत्तर पाल लिया था। वह बोला, “साहब यह लंगड़ा मुर्गा था। उसकी एक ही टांग थी।”
गुस्से के माहौल में हंसी का फव्वारा छूट गया था।

हाथ साफ़ करते हुए शिक्षा अधिकारी ने कहा, “शराब पीनी हो तो स्कूल टाईम के बाद पिया करो, स्कूल टाईम शराब पीने से डिपार्टमैंट की बदनामी होती है।”

समझ गये जनाब सब ने हाथ जोड़ते हुए कहा था।

बच्चों ने घर जाकर ख़बर फ़ैला दी थी कि ज़िला शिक्षा-अधिकारी ने अध्यापकों की खूब खिंचाई की है। गांव वासी सुनकर खुश हो गये थे।

इन्क्वायरी करके शिक्षा अधिकारी लौट आये थे। एक टांग वाले मुर्गे का स्वाद अभी भी सिर चढ़कर उनमें बोल रहा था।

One comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*