दांव

                               

छोटे भाई पटाखे लेने की ज़िद्द कर रहे थे। माँ ने बापू का गुस्सा छोटे बच्चों को झापड़ लगा कर निकाल लिया, और बोली जाकर अपने बाप से मांगो, मेरे पास तो ज़हर खाने को भी पैसे नहीं। थोड़ी देर बाद बापू फिर आ गया था ख़ाली हाथ और माँ को घसीटते हुए कहने लगा था, चल मेरे साथ। माँ ने पूछा था कहां?

 “आंटी मुझे बचा लो,” कहती हुई रूपा, श्रीमती दास के घर में तीर की भांति प्रवेश कर गई।

“रूपा क्या बात है, तू इतनी घबराई हुई क्यों है?” श्रीमती दास ने हतप्रभ होकर पूछा।

“आंटी, वे मुझे मार डालेंगे, मुझे ज़बरदस्ती ज़हर पिला रहे थे, मैं बड़ी मुश्किल से जान बचा कर आई हूँ, वे इधर ही आ रहे हैं, मुझे बचा लो आंटी।”

“रूपा ये क्या कहे जा रही है तू, कौन हैं वे, जो तुझे मार डालना चाहते हैं?” श्रीमती दास भी रूपा की बात सुन कर घबरा गई थी।

  “आंटी, मेरी माँ और बापू, और कोई नहीं, मुझे बचा लो उन से।” रूपा की मोटी सुर्ख आंखों से निकले आंसुओं से उसका तांबे रंगा चेहरा भीग गया। श्रीमती दास की कुछ समझ में नहीं आ सका कि यह सब अचानक क्या हो गया है। उन्होंने प्रश्‍न-सूचक निगाहों से रूपा को घूरते हुए पुन: पूछा, “आख़िर क्यों मार डालेंगे वे तुझे, ऐसा क्या कर दिया है तूने?”

 “आंटी, वह सब फिर बताऊँगी, पहले मुझे कहीं छिपा लो उनके आने से पहले।” लेकिन इस से पहले कि श्रीमती दास कुछ समझ पाती या कर पाती, रूपा ने स्वयं दायें-बाएं कमरों में झांका और शिकारियों से जान बचाती हुई सहमी हिरनी की तरह खुद ही स्टोर में घुस गई और अन्दर से चिटकनी लगा ली। इधर श्रीमती दास उलझन में फंस गई।

 रूपा निकट की ग़रीब बस्ती में बसे एक ग़रीब परिवार के छ: भाई-बहनों में सबसे बड़ी बेटी थी। मोटे सुर्ख होंठ, मोटी-मोटी बिल्लौरी आँखे, गोल-मटोल हँसमुख चेहरा, चौड़े माथे पर झूलती भूरी लटें, सोहलवें साल की दहलीज़ पर खड़ी रूपा स्त्री सुलभ पुष्‍ट‍ अंगों के कारण आकर्षक दिखाई देती। उस का रूप यौवन एकदम अपनी माँ पर गया था। ३५-३६ वर्षीया उस की माँ बेशक बीमार रहती लेकिन शारीरिक सुन्दरता में वह छ: बच्चों की माँ होकर भी बस्ती की अन्य औरतों से इक्कीस थी। रूपा शायद ही दो-चार जमात तक स्कूल गई हो। सुबह उठते ही वह बस्ती के एक मात्र सांझे नल से बाल्टियों द्वारा पानी ढोती, अंदर-बाहर बुहार कर रसोई में जुट जाती। छोटे भाई-बहनों को नहला-धुला कर स्कूल भेजती। बाप मज़दूरी के लिए निकल जाता, रूपा मां के साथ कोठियों में काम पर चली जाती।

रूपा जिस बस्ती में रहती थी वह अत्यन्त पिछड़ी हुई थी। गरीबी के कारण अनपढ़ता थी और अनपढ़ता की वजह से कई बुराइयों से अभिशप्‍त थे वहां के निवासी। रिक्शा, रेहड़ी चलाना, गधों पर माल ढोना, सूअर पालना व अन्य छोटे-मोटे काम करते वहां के लोग या फिर युवा होते लड़के घटिया किस्म के नशे करते, ऊँची-ऊँची आवाज़ में चालू गीत गाते, बच्चे स्कूल जाने की बजाए वहीं गंदगी में खेलते रहते।

कई मर्द दिन भर की कमाई से शराब पी कर बस्ती में आते। आपस में झगड़ते या फिर घर पर बीवी-बच्चों पर हाथ आज़माइश कर लेते। गंदी-गंदी गालियों से बस्ती गुंजा देते। रूपा का बापू भी इन अलामतों का शिकार था। जितना कमाता उतना नशे-पत्ते और जुए-सट्टे में उड़ा देता। मां बेटी की कमाई से घर का ख़र्च चल रहा था।

रूपा की मां रूपा को अकेले काम पर उन्हीं घरों में भेजती जो उसे शरीफ़ लगते। श्रीमती दास का घर उन्हीं में से एक था, और था भी रूपा की बस्ती के एकदम निकट। रूपा श्रीमती दास के घर विशेष बुलावे पर ही आती मसलन गेहूं पिसावन बनाने, कपड़े धोने अथवा मेहमानों के आने पर ही बुलाया जाता।श्री मती दास बे-औलाद थी। इस लिए काम ही कितना होता जो उसे रोज़ बुलाया जाता। रूपा के काम करने की लगन, मेहनत व बुद्धिमता से श्रीमती दास काफ़ी प्रभावित थी। वह अक्सर सोचती, यही लड़की किसी खाते-पीते घर पैदा हुई होती, चार अक्षर पढ़ जाती तो इसका जीवन ही संवर जाता। श्रीमती दास कई बार तो यहां तक सोच जाती कि काश! रूपा उसकी कोख़ से जन्मी होती अथवा उसे गोद ही ले लेती। वह अकसर रूपा से बातों में मशग़ूल हो जाती। रूपा उन्हें कीचड़ में खिला कमल प्रतीत होती।

कॉल बैल की संगीतमयी ध्वनि ने श्रीमती दास की तन्द्रा भंग की। दरवाज़े पर रूपा के मां-बाप खड़े थे।

“दीदी, हमारी रूपा तो नहीं आई आप के यहां?” रूपा की मां के स्वर में गुस्से की लहर थी।

“नहीं तो, मैंने उसे आज काम पर नहीं बुलाया था। अन्दर आ जाओ क्या बात है? काफ़ी परेशान नज़र आ रहे हो।” श्रीमती दास ने अनभिज्ञ होने का नाटक करते हुए प्रश्‍न किया।

“बस वैसे ही दीदी…..काफ़ी देर से घर नहीं लौटी इसीलिए।” श्रीमती दास ने उनकी मन:स्थिति को भाँपते हुए सवाल किया, “लगता है कुछ गड़बड़ है, तुम लोग काफ़ी परेशान लग रहे हो….भीतर आकर बताओ ना…।”

“क्या बताएं दीदी….,” रूपा के माँ-बाप ने अन्दर आते हुए क्रोध व दु:ख मिश्रित स्वर में कहा।      

“तुम बेझिझक हो कर मुझे बताओ अपनी समस्या, शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं।” श्रीमती दास ने उनकी दुखती रग पर उंगुली रखने की कोशिश की। “दीदी, रूपा ने हमें कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं छोड़ा है। उसके सभी चाव पूरे किए। लेकिन हमें क्या पता था कि वह हमें ऐसे ज़लील करेगी। पैदा होते ही मर गयी होती तो कोई दु:ख न होता।” रूपा की माँ पूरे आक्रोश में बोली। “देखो, इस उम्र में बच्चे अक्सर भूल कर जाते हैं, यह उम्र ही बहकने की होती है, अगर रूपा ने कोई गल्ती कर दी है तो उसे सुधारा भी जा सकता है, लेकिन तुम कुछ बताओ तो सही रूपा ने किया क्या है?” “दीदी, रूपा बहुत ज़िद्दी है। कहना नहीं मानती। रूठ कर घर-बाहर का कामकाज छोड़ कर बैठी है। न खाना न पीना। चुपचाप चारपाई तोड़ती रहती है। ऐसे में मैं अकेली ही मरती-खपती हूँ।”

  “रूपा की मां बच्चों की यह शिकायतें आम होती हैं। ये ऐसे न करें तो इन्हें बच्चे कौन कहे। धीरे-धीरे बड़े होकर खुद ही समझ आ जाएगी। मेरे ख्याल में यह कोई बड़ी बात नहीं लगती, जिस के लिए तुम लोग रूपा से इतने नाराज़ व परेशान हो।”

  “नहीं बहन जी, आप को नहीं मालूम, रूपा ने जो किया है उस के लिए मैं उसे कभी माफ़ नहीं कर सकता। मैं उसे मार कर हमेशा-हमेशा के लिए क्लेश खत्म कर दूँगा।” काफ़ी देर से चुप रूपा का बाप, मुर्दे के कफ़न फाड़ने के अन्दाज़ में बोला। श्रीमती दास के हृदय में टीस-सी उठी, ममता ने अंगड़ाई ली, “अरे, तुम क्या जानो बे-औलाद होने का दर्द। भगवान की लीला भी अपरम्पार है, जहाँ ज़रूरत होती है वहां एक भी नहीं और जहां सम्भाले न जाएं वहां कई-कई।” बीड़ी सिगरेट के धुएँ से काले स्याह होते, लगातार नशे से खुमार भरी आंखें, धंसी गालों, उभरी हड्डियों वाले रूपा के बापू का कुरूप चेहरा काफ़ी डरावना लग रहा था। उस की फटे बांस जैसी आवाज़ में इतने सख़्त बोल सुन कर श्रीमती दास तो डर ही गई थी। उन्होंने सोचा, बात गम्भीर ही लगती है। वरना छोटी-मोटी गल्ती के लिए कोई मां-बाप अपने बच्चों को खुद मार डालने का निर्णय नहीं लेते।

  “भाई साहिब, रूपा का कसूर भी बताएंगे या बस मरने–मारने की बातें ही किए जाएंगे – मैं तो रूपा को बहुत सयानी व शरीफ़ लड़की समझती हूँ।” श्रीमती दास ने उकसाया तो रूपा का बापू बिफर पड़ा, “बस यही भूल तो हम करते रहे बहन जी, हमें क्या पता था कि ये हमारी शराफ़त का नाजायज़ फायदा उठाएगी। हमें धोखा देगी।” वे थोड़ा-थोड़ा खुलने लगे थे। लेकिन असल बात पर आने में झिझक रहे थे।

“क्या धोखा दिया है रूपा ने, यही तो मैं जानना चाहती हूं, तुम बेझिझक होकर मुझ से कहो न। मैं किसी को नहीं बताऊंगी, मुझे अपना ही समझो।” श्रीमती दास ने उन्हें विश्‍वास में लेने की कोशिश की।

“दीदी, मैंने जब रूपा से पूछा कि तू ऐसे….किस का सोग मना रही है, मैं तेरी माँ हूँ, मुझे बता तेरे दिल में क्या है, अगर मां से नहीं कहेगी तो किस से कहेगी….फिर मेरे बहुत पूछने पर बोली….।” इतना कह कर शब्द जैसे उस के गले में अटक गये।

“हाँ-हाँ- बता रूपा की मां-क्या बोली रूपा तुम से?”

“दीदी … वह कलमुँही कहती है – कोठी वाले, जिनके यहां काम पर जावे है न, उनके इकलौते लौंडे से ब्याह कराएगी।”

“रूपा की मां यह तो टी.वी. फिल्मों का असर है। आजकल पढ़े-लिखे और अनपढ़ सभी बच्चे बिना शर्म-हया के मां बाप के सामने मुंह खोलने लगे हैं। उसे समझा देना था नहीं मानती तो मैं समझा दूंगी।”

“नहीं दीदी, बात यहीं तक नहीं है ना, पेट में उसका पाप लिए घूमती है। हे भगवान, ये धरती फट जाए, उसमें समा जाऊँ मैं,” रूपा की मां बिलखी। रूपा की मां के अन्तिम शब्द सुन कर तो श्रीमती दास का हृदय ही कांप गया। ऊपर से कितनी शरीफ़ लगती थी और भीतर से कितनी खोटी निकली। बित्ते भर की छोकरी और ये करतूत। उनके हृदय में रूपा के प्रति नफ़रत पैदा हो गई।

“चल, कहीं और चल कर ढूंढते हैं उस कुलटा को, मैं उसे पाताल से भी खोज निकालूँगा और हमारी इज़्ज़त को ख़ाक में मिलाने वालों का नामो निशान मिटा दूँगा,” रूपा के बाप ने कर्कश स्वर में क्रोध का लावा उगला। उसके मुंह से शराब की दुर्गन्ध का झोंका श्रीमती दास को उसके शराबी होने का अहसास करा गया।

तभी स्टोर की चिटकनी खुलने की आवाज़ आई और रूपा चट्टान की भांति उनके सामने आकर खड़ी हो गई। उसे अचानक देख कर सभी भौचक्के रह गये। “मुझे मारना है तो मार डालो – लेकिन आंटी पहले मेरी बात सुन लो। मैं बताती हूँ इनकी असलीयत,” रूपा का चेहरा बेख़ौफ़ था और आवाज़ में उत्तेजना। वे तीनों उसे घृणा भरी नज़रों से घूर रहे थे। रूपा के बाप ने उसे एकदम पकड़ कर बाहर ले जाना चाहा लेकिन श्रीमती दास ने रूपा के प्रति उपजी घृणा के बावजूद रूपा को देखते हुए कहा, “रुको .. रूपा को अपनी बात भी कहने दो – मैं भी तो जानूं उसकी क्या मजबूरी थी जो रूपा ने ऐसा कदम उठाया,” श्रीमती दास की ओर मुख़ातिब होकर रूपा ने कहना शुरू किया, “आंटी, बापू को शराब और जुए की आदत है। शराब तो इसने अब भी पी रखी है। पी कर हम भाई-बहनों और मां को पीटना इसका रोज़ का काम है। दो-अढ़ाई महीने पहले दीवाली वाले दिन की बात है आंटी। बस्ती में सुबह से ही जुआ चल रहा था। बापू दीवाली वाले दिन जुआ ज़रूर खेलता है। उस दिन पहले अपने पैसे हारा, फिर साइकिल, घड़ी और मां के गहने भी हार गया।

 छोटे भाई पटाखे लेने की ज़िद्द कर रहे थे। माँ ने बाप का गुस्सा छोटे बच्चों को झापड़ लगा कर निकाल लिया और बोली, जाकर अपने बाप से मांगो, मेरे पास तो ज़हर खाने को भी पैसे नहीं। थोड़ी देर बाद बापू फिर आ गया था ख़ाली हाथ और मां को घसीटते हुए कहने लगा था, चल मेरे साथ। माँ ने पूछा था कहां? तब ये बोला था, आज ऐसा मनहूस दिन चढ़ा है कि एक भी बाज़ी नहीं जीत पाया, चल अब तुझे दांव पर लगाऊंगा,” रूपा बिना झिझके, बिना रुके बोले जा रही थी। श्रीमती दास ने पूछा, “फिर क्या हुआ?” “आंटी, मां चारपाई का पाया पकड़ कर ज़मीन पर बैठ गयी थी और बापू उसे दोनों हाथों से घसीट रहा था नशे के ज़ोर में। मां कह रही थी, “सभी कुछ तो हरा दिया है जुए में। अब घर की इज़्ज़त भी दांव पर लगा रहा है तू। नहीं, मैं नहीं जाऊँगी।”

“किसकी इज़्ज़त, कैसी इज़्ज़त, और लोग भी तो अपनी बीवियाँ दांव पर लगा रहे हैं …. तू भी चल।” आंटी मुझे याद आया पिछले साल भी हमारे पड़ोस के एक मर्द ने अपनी औरत को जुए में दांव पर लगाया था एक रात के लिए। दूसरे दिन जब वह लौटी थी तो उसने चारपाई पकड़ ली थी। घर में खाने को दो दाने नहीं थे, इलाज कहां से होता। कुछ दिनों बाद वह औरत मर गई थी। लोगों से सुना था कि उसकी कोख में बच्चा मर गया था। उसका ज़हर सारे शरीर में फैल गया था। उस औरत की याद आते ही मैं बहुत डर गई थी।

 बापू कपड़े धोने वाली थपकी उठा लाया था और मां से कह रहा था चल चुपचाप नहीं तो तुम्हारी हड्डियां तोड़ डालूँगा। मुझ से मां की यह हालत देखी न गई। मैंने कहा, बापू, मां को छोड़ दे, तुझे पैसे चाहिए न जुए के लिए, मैं ला देती हूं …. बापू ने हाथ की थपकी ज़मीन पर फेंकते हुए कहा था, तो पहले क्यों नहीं बोली, ला-ला दे पैसे।

  “कहां से लाएगी तू पैसे?” मां ने पूछा था।

 “कोठी वालों से एडवांस मांग लाती हूँ, जिन के यहां काम पर जाती हूँ।” “ठीक है – ठीक है, शाबाश जा दौड़कर और जल्दी पैसे लेकर आ। बेवकूफ़ तुझसे तो मेरी बेटी ही समझदार है।” मां को दांव पर लगने से बचाने की चिन्ता में, मैं सभी कुछ भूल कर कोठी वालों के यहां पहुँच गई थी।

  कोठी वालों का लड़का मुझे देखते ही खुश हो गया था। मैं जब काम पर जाती मेरे पीछे पड़ा रहता। तोहफे़ लाकर देता। मुझ से शादी करके उस घर की बहू बनाने को ज़ोर डालता। लेकिन मैंने मां की सीख पल्ले बांध रखी थी कि बड़े लोगों के झांसे में मत आना। नाली की ईंट कभी चौबारे पर नहीं लगती। ये लोग गरीबों से खिलौने की तरह खेल कर गन्दगी के ढेर में फेंक देते हैं। इस लिए मैं उसके सारे तोहफ़े-ठुकरा देती। उस की शादी करने की बात पर ध्यान न देती।

  लेकिन उस दिन जब मैंने उस से एडवांस की मांग की तो वह एक दम खुश होकर बोला था। “बोल कितने रूपए चाहिए?” उस ने मुझे रूपए इस शर्त पर दिए थे कि मैं उस से शादी के लिए हां कर दूं। ज़िन्दगी भर उसकी होने का वचन लिया था उसने। बस मां की नसीहत भूल कर मैं वचन देकर पैसे ले आई थी, कोठी वाले लड़के पर विश्‍वास करके।

 आंटी, मैंने तो उस कोठी वाले लड़के से अपना वचन निभा दिया, लेकिन अब वह अपनी ज़ुबान से फिर गया है। बताओ मैं क्या करूँ?”

   इतना कह कर रूपा कुछ देर के लिए ख़ामोश होकर जैसे कुछ सोचने लगी थी। फिर वह मां-बापू की ओर मुंह घुमाकर बोली, “बस मैंने तो इतना ही कहना था अब मुझे ले चलो। दे दो ज़हर। मैं खुद ही पी लूंगी। मार डालो मुझे।”

 श्रीमती दास ने रूपा की मां और बाप की ओर देखा शायद वे कोई प्रत्युत्तर देंगे रूपा की बातों का, लेकिन वे दोनों फांसी पर लटके शवों की भांति सिर झुकाए खड़े थे।     

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