मेरे तुम्हारे हमारे मां-बाप

-दीप ज़ीरवी

मानव सामाजिक जीव है। परिवार की सबसे छोटी इकाई है मानव। परिवार, जो समाज की सब से छोटी इकाई है। इस समाज को अनेक संस्थाएं संचालित करती हैं इन अनेक संस्थाओं में से एक संस्था है ‘शादी’।

जब शबनमी यौवन की पुरवाई, अल्हड़ता को झंकृत करने को आतुर होती है, ऐसे मौसमों में शहनाइयां मनों को बाग-बाग कर देती हैं। नए-नए रिश्तों की कोंपलें फूटती हैं।

लड़की, जो पहले बेटी, बहन रही होती है, शादी के बाद नए रिश्तों द्वारा पहचानी जाने लगती है, जैसे बहू, भाभी, देवरानी, जेठानी इत्यादि। यही सब लड़कों के साथ भी होता है।

मियां-बीवी के नातेदारों की संख्या दोगुणी हो जाती है। प्रायः वर पक्ष वाले वधू के घरवालों से अधिक ध्यान की अपेक्षा करते हैंः वे लड़के वाले जो ठहरे!? किन्तु मन ही मन वधू पक्ष वाले भी योग्य सम्मान के अधिकारी होना चाहते हैं।

वर-वधू के मध्य सहयोग दांपत्य की गाड़ी का ईंधन होता है और परस्पर मतभेद इस ईंधन का कचरा।

प्रायः यह देखने को मिलता है वर-वधू दोनों ही अपने-अपने मां-बाप को ही अधिक विशेष मान कर चलते हैं।

अपने पीहर की तरफ़ से आने वाले काग को भी चूरी खिलाने की बात करने वाली वधुएं अपने ससुराल वालों को ( कई जगह ) पानी तक नहीं पूछती।

अपनी पत्‍नी से अपने मां-बाप की अत्यधिक अपेक्षा रखने वाले पति अपने सास-ससुर पर रौब डालना अपना अधिकार समझते हैं।

बेशक पांचों उंगलियां एक-सी नहीं होती और यह भी सत्य है कि अपने मां-बाप की ओर  खिचाव एक नैसर्गिक अनुभूति है।

यदि देखा जाए तो वधू अपने मां-बाप, बहन-भाई छोड़ कर ससुराल आती है तो उसका ध्यान अपने मां-बाप में रहना क़ुदरती है किन्तु वर के मां-बाप ने भी अपने लाल का लालन-पालन किया होता है। वधू अपने मां-बाप के प्रेम में अपने ‘उनको’ इस हद तक रंग लेना चाहे कि ‘वर’ अपने मां-बाप तक को भुला बैठे यह भी सर्वथा अनुचित ही कहा जाएगा न।

उचित यह भी नहीं है कि वधू अपने पीहर को भूलकर केवल ससुराल में ही रम जाए। यह बात ध्यान रहे कि कोई भी ‘दुलहन’ ससुराल जाने से पहले जिस बगिया में 18-20 बरस महकती रही है, जिस बगिया में उसकी जड़ें हैं वह उसका पीहर ही होता है। उसके पीहर वालों को योग्य आदर-सत्कार मिलना आवश्यक है। ( कुछ ) दामाद भी बेटे से ही होते हैं ( अधिकतर तो दामाद बनकर रहते हैं)।

यह ‘दामाद’ और ‘वधुएं’ जब अपने-अपने मां-बाप के लिए अलग और उनके-उनके मां-बाप के लिए अलग दृष्‍ट‍िकोण अपना लेते हैं तो गृह कलह का श्री गणेश होता है। (कैसे?)…. ।

– तुम्हारी मां की चख-चख अब बर्दाश्त नहीं होती।

– और तुम्हारी मां जो आए दिन यहां आ धमकती है जैसे उनकी बेटी का ससुराल न हो धर्मशाला हो।

– नानी के पास जाएंगे, नानी अच्छे-अच्छे खिलौने देती है न।

– तुम्हारी दादी जब देखो मुझसे लड़ती रहती है।

ऐसी बातें गृह कलह की नींव डालती हैं।

निःसंदेह पति-पत्‍नी गृहस्थी की गाड़ी के दो पहिए होते हैं, जो एक दूसरे पर आश्रित होते हैं। यदि दोनों अपने-अपने मां-बाप को ‘मेरे मां-बाप’, ‘तेरे मां-बाप’ मान कर चलेंगे, चलते रहेंगे तो परस्पर दूरी पनपेगी और यह दूरी वैवाहिक जीवन के छायादार पेड़ की जड़ में मट्ठे का काम करती है।

एक ओर एकल परिवारों का बढ़ता चलन बच्चों को उनकी नानियों, दादियों से अलग किए जा रहा है। मम्मी+पापा+बच्चेनुमा छोटे परिवारों के बढ़ते मायाजाल ने संयुक्‍त परिवार की अवधारणा को ही धूमिल-सा कर डाला है।

संयुक्‍त परिवार में पलने वाले बच्चे सामंजस्य बनाना अपने आप सीख जाया करते थे। आज इस चीज़ की बहुत कमी है। आज के ‘एकल परिवार युग’ में देखें तो वर-वधू दोनों की प्रतिक्रिया अपने-अपने दृष्‍ट‍िकोण से सही होने पर ( भी ) अपने से भिन्न दृष्‍ट‍िकोण के ठीक विपरीत होती है।

अपने-अपने मम्मी-पापा की बढ़ाई करनी, कोई बुराई नहीं है किन्तु उन धर्म के मां-बाप की किसी बात की अवहेलना करनी जिनसे आपका नाता विवाह के बाद बना है किसी भी प्रकार से उचित नहीं कहा जा सकता।

यह तो शाश्‍वत सत्य है कि मां कोई भी हो बुरी नहीं होती जो यह शाश्‍वत सत्य मानते हैं तो फिर सास बुरी क्यों होगी?? सास भी किसी की मां तो है न। और हां अगर ‘सासें’ बुरी हैं तो सभी मांएं किसी न किसी की सासें भी तो हैं न??…

मां सिर्फ़ मां होती है, बाप सिर्फ़ बाप होता है, यदि इतनी बात जान ली जाए तो यह बात भी जान ही ली जाएगी कि मां-बाप सिर्फ़ मां-बाप होते हैं।

मेरे मां-बाप / तुम्हारे मां-बाप नहीं / हमारे मां-बाप।

 

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